वाह रे…..बागेश्वर की पुलिस

Bageshwar Police‘‘ससुर पर लगे बहू की हत्या के आरोपों के पाप को मैं धोना चाहता हूँ…यही मेरी मृतात्मा को श्रद्धांजलि होगी। मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। मेरा काम बस सच को सामने लाना है…मैं तथ्यों की कड़ी जोड़ रहा हूँ….उत्तराखंड तो देव भूमि हुई…देवता भी यहाँ न्याय करने वाले हुए।’’ ‘नैनीताल समाचार’ के 1 से 14 अगस्त 2012 के अंक में हमने बागेश्वर के वकील चन्दन सिंह रौतेला का यह वक्तव्य प्रकाशित किया था। खुशी की बात है कि रौतेला ने अन्ततः अपनी लड़ाई जीत ली है। बागेश्वर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नीलम रात्रा ने उनके मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया है। एडवोकेट चन्दन सिंह की लड़ाई का अगला चरण अब उन रिश्वतखोर पुलिस वालों को सजा दिलवाने के लिये चल रहा है, जिन्होंने एक निर्दोष ग्रामीण को फँसाने का षड़यंत्र रचा।

28 सितंबर 2011 को बागेश्वर की उप तहसील काफलीगैर के कठानी गाँव की भगवती देवी अपनी सास आनुली देवी के साथ एक पारिवारिक समारोह में भाग लेने अपनी ननद के ससुराल सुनोली गाँव़ गई थी। सास वहीं रुक गई और भगवती अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों के कारण घर वापस लौटी, मगर घर नहीं पहुँच सकी। अधबीच में पड़ने वाले बोहाला तक भगवती के सकुशल पहुँचने के प्रमाण हैं। मगर जब बहुत देर तक वह घर नहीं पहुँची तो उसके ससुर, रिटायर्ड फौजी मोहन सिंह उसे ढूँढने चल पड़े। जंगल में उन्हें खून से लथपथ बहू की लाश मिली। उसके शरीर से सोने के करीब साढ़े छह तोले के जेवरात गायब थे।

पटवारी को लिखाई प्राथमिकी में मोहन सिंह ने गोपाल सिंह, गोविंद सिंह, बहादुर सिंह, आशा देवी तथा हरीश सिंह को नामजद किया। कुछ दिनों बाद पटवारी द्वारा हाथ खड़े कर दिये जाने पर मामला रेगुलर पुलिस के पास पहुँचा। 14 अक्टूबर 2011 को सीओ पीसी पंत व थानेदार कुशवाहा ने कठानी गाँव पहुँच कर मोहन सिंह के घर की तलाशी ली और उसकी पेंट, कमीज, एक जंग लगा बड़्याठ उठा ले गए। अगले दिन उन्होंने मोहन सिंह को गिरफ्तार कर उसके पैसे लूट लिये। उसे भगवती के साथ अवैध सम्बन्धों के चलते उसकी हत्या कबूल करने के लिए दो दिन तक उसका थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया। 56 घंटे की अवैध हिरासत के बाद सीजेएम के सामने पेश कर मोहन सिंह को जेल भेज दिया गया। मोहन सिंह द्वारा नामजद आशा देवी को पुलिस ने अपना गवाह बना लिया। बागेश्वर के विवादास्पद पुलिस अधीक्षक मोहसिन खान ने हत्याकांड को सुलझाने वाली पुलिस टीम को चटपट अढ़ाई हजार रुपये का ईनाम भी दे डाला। स्थानीय मीडिया ने भी आदतन पुलिस का खूब जय-जयकार किया। हालाँकि इस दरमियान ग्रामीणों ने कई बार प्रदर्शन कर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। मामले की जाँच सीबीसीआईडी से कराने की भी माँग की। मगर प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। तीन नवंबर को मोहन सिंह को अदालत से जमानत मिल गई। मुकदमे में एडवोकेट चन्दन सिंह रौतेला द्वारा पुलिस के झूठे गवाहों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर देने के बाद अन्ततः 19 सितम्बर 2013 को अदालत ने मोहन सिंह को बरी कर दिया।

क्षेत्र के ग्रामीणों की तरह एडवोकेट चन्दन सिंह रौतेला का भी मानना कहना है कि अपराधी मोहन सिंह द्वारा नामजद व्यक्ति ही हैं। यदि नामजद व्यक्तियों व उनके तमाम रिश्तेदारों के काफलीगैर, कठपुडि़या आदि के पोस्ट आफिस व बैंकों के खातों से सितंबर-अक्टूबर 2011 में हुए लेन-देन की जाँच की जाये तो यह सच्चाई सामने आ जायेगी कि इन लोगों ने पुलिस-प्रशासन को कितना पैसा खिलाया। मृतका भगवती देवी के साढ़े छः तोले के जेवरात तो हत्यारों के साथ मिल कर पुलिस वालों ने डकार ही डाले। 21 मई 2012 को आशा देवी के पति आनन्द सिंह की संदिग्धावस्था में मौत हो गई थी, जिसका शक ग्रामीणों को आशा देवी के साथियों पर ही है।

इस मामले में मुकदमे के दौरान भी पुलिस की भूमिका की शिकायत करते हुए गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक व आईजी नैनीताल को पत्र लिखे जाते रहे। न्यायिक मजिस्ट्रेट बागेश्वर की अदालत में पुलिस उपाधीक्षक बागेश्वर, थानाध्यक्ष झिरौली तथा चार कांस्टेबिलों के खिलाफ 420, 330, 340, 323, 324, 504 व 506 के तहत मुकद्मा दर्ज कराया गया। अब जबकि मुकदमे का फैसला आ गया है, एडवाकेट रौतेला को मुकदमा जीतने की खुशी में फूल कर कुप्पा हो जाना चाहिये था। मगर उन्हें यह कसक रह गई है कि अदालत ने सीओ पीसी पंत व विवेचनाधिकारी थानेदार कुशवाहा के खिलाफ कठोर प्रतिकूल टिप्पणी क्यों नहीं की होगी। उससे उनका रास्ता आसान हो गया होता। बहरहाल वे इन समाजद्रोही, रिश्वतखोर पुलिसकर्मियों को दंडित करवाने के लिये कानूनी रास्ते तलाश रहे हैं।

पूरे देश की तरह उत्तराखंड में भी पुलिस का चेहरा उजला नहीं है। अन्यत्र की तरह उत्तराखंड में भी अपराधियों से पुलिसकर्मियों के रिश्ते होने की खबरें मिलती रहती हैं। जनान्दोलनों का दमन करने में भी उसका उत्साह देखते ही बनता है। कालाढूँगी कांड के बाद उत्तराखंड पुलिस का मनोबल भी इतना टूट गया है कि भाजपा और कांग्रेस से जुड़े छोटे-मोटे अपराधियों को देख कर ही अच्छे भले वर्दीधारियों की कँपकँपी छूटने लगती है। जिस तरह जोधपुर में आशाराम बापू पर हाथ डालने में पुलिस के छक्के छूट गये, वैसा ही हरिद्वार में कुँवर प्रणव सिंह चैम्पियन द्वारा गोली चलाने के मामले में हुआ। मगर बागेश्वर पुलिस का तो अपराधियों से पैसे खाकर निर्दोशों को फँसाने का रिकॉर्ड तो सचिन तेंदुलकर के रिकॉर्ड जैसा हो गया है। अभी पिछले दिनों ही शराब के खिलाफ आन्दोलन करने वाली बानरी गाँव की आशा कार्यकर्ती संगीता मलड़ा की हत्या के मामले में भाकपा (माले) द्वारा आन्दोलन करने पर बागेश्वर पुलिस ने बेमन से थोड़ी सक्रियता दिखाई थी, मगर उसके बाद फिर वह चुप हो कर बैठ गई। संगीता हत्याकांड में भी अपराधी वे शराब माफिया हैं, जिन्हें दुहने की खूब गुंजाइश है। पिछले साल महिला पुलिसकर्मियों के यौन शोषण की शिकायतें भी बागेश्वर से ही आई थीं।

Leave a Reply

%d bloggers like this: