जानवरों और मनुष्यों के बीच समरसता जरूरी है

leopardतेदुओं और अन्य हिंसक जानवरों ने उत्तराखंड में लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। तेदुओं के आतंक से उत्तराखंड का कोई पहाड़ी गाँव अछूता नहीं है। बाघ और हाथियों के साथ ही गुलदार भी लोगों के लिए बढ़ा खतरा बन गये हैं। दस सालों में 250 लोग गुलदार का निवाला बन चुके हैं और साल दर साल यह खतरा घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। एक माह के भीतर राज्य के विभिन्न भागों में गुलदार ने दस से अधिक बड़े हमले किये हैं। गांवों में तो स्थिति यह है कि गुलदार के डर से महिलाओं का घास लाना, बच्चों का स्कूल जाना ही मुश्किल हो गया है। पहले तो गुलदार केवल मवेशियों और पालतू कुत्तों पर ही हमला बोलते थे लेकिन अब वे गाँवों में घुसकर लोगों पर भी हमला बोल रहे हैं। मानव और गुलदारों के बीच तेज होते संघर्ष के कारण अब लोगों का गुस्सा भी गुलदारों के प्रति बढ़ रहा है। बीते दिनों पौड़ी गढ़वाल जिले के धामधार गाँव में तीन लोगों पर हमला करने से गुस्साये लोगों ने एक गुलदार को जिंदा जला डाला। जबकि इस महीने की पहली तारीख को देहरादून शहर से लगे भाउवाला गाँव में दिनदहाड़े घुस आये एक गुलदार ने खेत में काम कर रहे किसान पूरण दास को बुरी तरह जख्मी कर दिया। कुछ ही दिन पहले हरिद्वार में एक गुलदार शहर के बीचों-बीच घुस आया और पूरा दिन एक पेड़ पर चढ़कर बैठा रहा। अल्मोड़ा जिले के हवालबाग विकासखंड के लोग लम्बे समय से एक आदमखोर गुलदार के आतंक से पीडि़त हैं।

पूर्व मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आनंद सिंह नेगी का कहना है कि बुनियादी बात है खाना और जंगल में गुलदार के लिए खाने की भयंकर कमी हो गई है। जहाँ घने जंगल हैं वहाँ आज भी ऐसी घटनाएँ कम हो रही हैं। जहाँ वन विभाग के कर्मचारी वन क्षेत्रों में तैनात हैं, वहाँ अवैध शिकार की घटनाएँ कम होती हैं और गुलदार को अपना शिकार जंगल में ही मिल जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में वन विभाग की उपस्थिति न होने के कारण भी गुलदार और मानव के संघर्ष को रोकना मुश्किल हो रहा है। गाँवों में लोगों ने अब मवेशी पालने भी कम कर दिये हैं। रोजमर्रा के काम करना भी भारी पड़ रहा है। स्कूल से लौट रहे बच्चे हों या आँगन में खेल रहे नौनिहाल, कोई भी गुलदारों से सुरक्षित नहीं है। घास-लकड़ी के लिए गई महिलाएँ भी आदमखोरों का निवाला बन रही हैं। देहरादून के भाउवाला गाँव में खेत में काम कर रहे पूरणदास पर हुआ गुलदार का हमला साबित करता है कि शहरों से लगे क्षेत्र भी गुलदार से सुरक्षित नहीं हैं।

पिछले सालों में जंगली जानवरों ने हमला कर हजारों लोगों को घायल किया है, जिनमें से सबसे अधिक लोग गुलदार के हमले का शिकार हुए हैं। गुलदार के अलावा बाघ, हाथी और सुअर भी खतरा बने हुए हैं। बीते पाँच सालों में राजाजी नेशनल पार्क और इससे लगे क्षेत्रों में हाथियों ने 15 से अधिक लोगों की जान ली है, जबकि बीते दस सालों के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में सुअरों ने 393 लोगों को घायल किया है। इस दौरान गुलदार के हमले में सर्वाधिक 29 लोग, 2006 में मारे गये हैं। 2010 के जनवरी माह से अब तक गुलदार 35 लोगों को अपना शिकार बना चुके हैं। दस सालों में गुलदार के हमलों में 250 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी है तो इसी अवधि में 544 गुलदार भी अलग-अलग कारणों से मारे गये हैं। उत्तराखंड वन विभाग द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के अनुसार बीते दस सालों में 544 गुलदार भी अलग-अलग कारणों से मारे गये। इनमें से 333 गुलदार प्राकृतिक कारणों से और 157 दुर्घटनाओं में मरे। 54 को अवैध शिकारियों द्वारा मार डाला गया। वन विभाग के मुताबिक उत्तराखंड में गुलदार, हाथियों और बाघों से भी बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। दस सालों के दौरान गुलदार, बाघ और हाथियों के हमलों में लगभग साढ़े तीन सौ लोग मारे गये हैं। जिनमें से सबसे अधिक 250 लोग गुलदार के हमले में मारे गये जबकि इस दौरान हाथियों के हमलों में 77, भालूओं के हमलों में 13 और बाघ के हमले में 10 लोग मारे गये हैं। मानव और वन्यजीव संघर्ष के मामले में हरिद्वार और अल्मोड़ा जिलों को सबसे ऊपर रखा गया है।

पौड़ी जिले के रिखणीखाल प्रखंड के धामधार गाँव में घटी घटना मानव और वन्यजीवों के बीच तेज हो रहे संघर्ष की सबसे ताजा मिसाल है। यहाँ बीते दिनों ग्रामीणों ने वन विभाग के पिंजरे में कैद एक गुलदार को जीवित जलाकर मार डाला। हैरान करने वाली बात यह रही कि मौके पर मौजूद पुलिस, तहसीलदार व वन विभाग के अधिकारी भी ग्रामीणों के आक्रोश को कम कर पाने में नाकाम रहे। 22 मार्च की तड़के गुलदार ने धामधार में तीन व्यक्तियों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। इन लोगों को घायल करने के बाद गुलदार गाँव में ही शेखर चंद्र की गौशाला में घुस गया। इस पर ग्रामीणों ने गुलदार को वहीं कैद कर दिया। ग्रामीणों द्वारा सूचना दिये जाने पर दोपहर बाद पहुँची वन विभाग की टीम ने गौशाला के दरवाजे पर पिंजरा लगाया और कड़ी मशक्कत के बाद गुलदार को कैद कर लिया। लेकिन गुलदार के बार-बार के हमलों से ग्रामीण इतना गुस्से में थे कि उन्होंने कैद किये गये गुलदार के पिंजरे पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी, जिससे जिंदा गुलदार पिंजरे के अंदर ही जलकर मारा गया। घटना के बाद गाँव में ग्रामीणों और प्रशासन के बीच इतना तनाव बढ़ा कि प्रशासन ने गाँव को छावनी में तब्दील कर दिया। अर्द्धसैनिक बल (पीएसी) की टुकड़ी भी तैनात की गई। गुलदार को जलाने के दो आरोपियों, ग्राम धामधार के मनवर और खदरासी गाँव के विजय को, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार कर चौदह दिन की पुलिस हिरासत में पौड़ी जेल भेजा गया है। छह अन्य आरोपियों को पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर पाई है, जबकि गिरफ्तार ग्रामीणों के समर्थन में आंदोलन भी शुरू हो गया है। रिखणीखाल विकासखंड मुख्यालय में प्रदर्शन कर ग्रामीणों ने कहा है कि गुलदार जलाने के आरोपियों के साथ ही मूकदर्शक बने रहे पुलिसकर्मी भी इस मामले के आरोपी हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि गुलदार का पोस्टमार्टम करने वाले पशु चिकित्सकों ने उसे आदमखोर मानने से इंकार कर दिया। कालागढ़ टाइगर रिजर्व फारेस्ट के प्रभागीय वनाधिकारी सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि मारी गई मादा गुलदार की उम्र ढाई साल थी और वह नरभक्षी नहीं थी। लेकिन उसका पेट पूरी तरह से खाली था। संभवतः इस कारण वह भोजन की तलाश में गाँव की ओर आई होगी। कोटद्वार (पौड़ी) के उप जिलाधिकारी अशोक पांडे का कहना है कि वन विभाग और ग्रामीणों के बीच समन्वय की कमी है। घटना के समय धामधार में तीस से अधिक वन विभाग के कर्मचारी मौजूद थे बावजूद इसके गुलदार को जलाने से नहीं रोका जा सका। जितने भी क्षेत्रों में लोग वन्य जंतुओं से पीडि़त हैं उन्हें वनों से होने वाले लाभ में भी शामिल किया जाना चाहिए। धामधार की घटना के बाद वनों में काबिंग में ग्रामीणों को भी साथ लिया जा रहा है ताकि बेहतर तालमेल बनाया जा सके।

जिस दिन पौड़ी में गुलदार को जला डालने की घटना हुई उसी दिन उत्तरकाशी के डूंडा में एक गुलदार मृत अवस्था में पाया गया, जबकि टिहरी के चाका गाँव में एक गुलदार को कैद किया गया। देहरादून के भारूवाला डकोटा में एक अप्रेल को घटी घटना उत्तराखंड में वेखौफ घूमते गुलदारों की एक और बानगी है। आसारोड़ी वन रेंज के भारूवाला गाँव में गुलदार ने हमला कर एक किसान को बुरी तरह घायल कर दिया। दिनदहाडे़ गाँव में घुसे गुलदार को पकड़ने की कोशिश में एक वनकर्मी भी घायल हो गया। सुबह 11 बजे खेत में काम कर रहे पूरण दास पर गुलदार ने अचानक हमला कर दिया। लोगों के शोर मचाने पर गुलदार पूरण को छोड़कर भाग गया। हालाँकि वन विभाग की टीम ने गुलदार को ट्रैंक्वेलाइजेर देने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। उसी दिन आशारोड़ी के रेंजर विनय मोहन रतूड़ी ने इस गुलदार के घायल होने की आशंका जताई थी, जो सच साबित हुई और 3 अप्रैल के दिन यह गुलदार लालढांग में मृत मिला। जाँच के बाद इस गुलदार की गर्दन में गंभीर घाव मिला।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2007 के अंत तक पूरे देश में 11,000 गुलदार थे। जबकि इस वर्ष 168 गुलदार अलग-अलग वजहों से मारे गये। जिनमें से सबसे अधिक 58 गुलदार उत्तराखंड में और 27 गुलदार गुजरात में मारे गये थे। इस गणना के मुताबिक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश- उत्तराखंड और गुजरात में सबसे अधिक गुलदार थे। जिसमें से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2206, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में 2168 और गुजरात में 1070 गुलदार थे। उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश में पाये गये 2168 गुलदारों में से ज्यादातर उत्तराखंड में ही हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और इससे लगे क्षेत्रों में दर्जन भर गुलदारों की मौत हुई है। 7 जनवरी को ऋषिकेश-देहरादून मार्ग में वाहन की चपेट में आने से एक शावक गुलदार की मौत हो गई थी। 22 जनवरी को झाझरा में एक गुलदार को शिकारियों ने मार डाला। 30 जनवरी को एफआरआई के निकट वन विभाग द्वारा पकड़े गये गुलदार को बचाया नहीं जा सका था। जबकि 11 फरवरी को शिकारियों ने आशारोड़ी के झीवरेहाड़ी में स्थित फार्म हाउस में फंदा डालकर एक गुलदार को मौत के घाट उतार दिया। 12 फरवरी को झाझरा के मैदान में ही फंदे के सहारे पेड़ से लटकी एक गुलदार की लाश मिली। जबकि 20 मार्च को शिकारियों ने लच्छीवाला रेंज के माजरीग्रांड स्थित शेरगझ़ में फंदा लगाकर एक गुलदार को मौत के घाट उतार दिया। अगले ही दिन 21 मार्च को बड़ोवाला में फंदे में फँसे एक गुलदार ने दम तोड़ दिया। जबकि 17 अक्टूबर को ओल्ड मसूरी रोड पर गाड़ी की चपेट में आने से गुलदार की मौत हो गई। 25 अक्टूबर को वीरपुर सैन्य क्षेत्र में करंट लगने से एक गुलदार जोड़े की मौत हुई।

‘पीपुल्स फॉर एनिमल्स’ की सदस्य सचिव उत्तराखंड गौरी मुखेजा का कहना है कि जहाँ उत्तराखंड के लोगों में सदियों से संरक्षण की परम्परा रही है वहीं अब लोगों में वन्यजीवों के प्रति रिवेंज किलिंग की प्रवृत्ति बढ़ रही है। राज्य में वन विभाग में आधे से अधिक पद खाली हैं। प्रतिवर्ष दर्जनों गुलदार शिकारियों और फसल सुरक्षा के नाम पर लगाये गये फंदो में फँस कर मारे जा रहे हैं। गुलदार प्रकृतिवश घने जंगलों में नहीं रहता, वह मानव बस्तियों के आसपास ही रहता है। जानकारों का कहना है कि यदि वनों में ऐसे पेड़ होंगे जो शाकाहारी जीवों का भोजन बन पायेंगे तो मासाहारी जीवों को खुद ही वनों में भोजन मिल जायेगा।

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  1. BHATT JI
    ”GULDAR” ke vishay likha gaya aap ka lakh kafi achha laga jankari bhi prapt hui. GULDAR ka es tarah achanak hamlawar ho jana vakai chintajanak hai. shath shath hame unke prakrtik rahvas esthalo me ho rahe privarten ttha unke svbhav me arahe badlav ki pristhitiyo ko bhi samjhna hoga our es hatu vanchhit karya yojna banaker kam karna hoga. ta ki ye GULDAR aapne aavash esthal me hi rahe our vano ke aaspas rahne wale gramidjan bhi surachhit rah sake. GULDAR ki prakritic mrityu to thik hai parantu unka shikar karna galat hai. FOREST DEP. ko chahiye ki gawon me basne wale gramin our vanya privesh ke beech shahi talmal bana kar WARKING PLAN tayar kare our aamal me laye. DHAMDAR gawon ki ghatna durbhagyapurn hai. es prakar ki ghatna ki punravriti nahi hone dene hatu FOREST DEP. harkat me aane ki jarurat hai………………………..
    ASHOK KUMAR BHATT
    Nawapara (Rajim)
    RAIPUR (C.G.)
    Mob. 9754613678

  2. इन पापियों को शर्म नहीं आई एक बेसहारा कैद प्राणी पर मिटटी का तेल छिड़कते हुए?? ???