One Response

Page 1 of 1
  1. avatar
    amita February 22, 2012 at 12:49 PM |

    दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के विकास की जिस मूल अवधारणा को लेकर ये राज्य बना था वो तो न जाने कंहा खो गया. नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने जम कर इसे लूटा और ये प्रक्रिया अब भी जारी है. अब बात करें आन्दोलनकारियों की. जिनके आन्दोलन से अंततः राज्य का गठन हुआ वो चाहते तो इस राज्य को सही दिशा देने में मदद कर सकते थे. कंही कुछ गलत होता दिखता तो एक और आन्दोलन कर उसे ठीक करने को बाध्य करा देने की क्षमता थी उनमे. लेकिन नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया. कोदा झंगोरा खाकर राज्य बनाने का दावा करने वाले भी अंततः इसी बहस में शामिल हुए कि उन्हें क्या मिला? उन्हें राज्य का विकास नहीं बल्कि अपने लिए सम्मान चाहिए, नौकरियों में आरक्षण चाहिए, पेंशन चाहिए, राज्य जाये भाड़ में किसी को भी क्या लेना देना. यंहा के लिए तो एक ही कहावत सटीक बैठती है- “राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट. “

    Reply

Leave a Reply

%d bloggers like this: