वे भुला दिये गये हैं

rain-and-pahadबरसात सिर पर है, लेकिन अभी सितम्बर 2010 की अतिवृष्टि में बर्बाद हुए लोग ही अपने पाँवों पर खड़े नहीं हो पाये हैं। सरकार उन्हें कोरे आश्वासन देकर टरका रही है। कुछ लोग तो भुखमरी की कगार पर हैं।

अल्मोड़ा जिले के भैंसियाछाना ब्लॉक के सल्ला गाँव निवासी नन्दन सिंह ठठोला व ताकुला ब्लॉक के भेटूली गाँव निवासी हयात राम की कहानी इसी तरह की है। सल्ला के सुशील कुमार मेहता बताते हैं कि 18 सितम्बर 2010 को हुई अतिवृष्टि से नन्दन सिंह का घर तबाह हो गया तो वह बीमारी की हालत में परिवार के 6 अन्य सदस्यों के साथ पंचायत घर में रहने लगे। उन्हें देखने मंत्री, विधायक, सांसद सब पहुँचे। ब्लॉक स्तरीय टीम विस्तृत जानकारी लेकर गई। लेकिन मदद किसी ने नहीं की। नन्दन सिंह की बीमारी के कारण उनकी पत्नी मंजू देवी ने मजदूरी कर पति, बूढ़़ी सास और चार बच्चों का भरण-पोषण किया। एक साल के भीतर नन्दन सिंह चल बसे। उनके बड़े भाई भी अच्छी नौकरी में होने के बावजूद इस परिवार की दुर्दशा से मुँह फेरे हुए हैं। असहाय मंजू देवी अभी भी अपने परिवार को जिन्दा रखने की जद्दोजहद में लगी हैं।

भेटूली के हयात राम का मकान व जमीन भी अतिवृष्टि में ध्वस्त हुए। इनका पुत्र हरीश व बहू सोनी दब गये थे। बमुश्किल बहू को बचा लिया गया, लेकिन उसके दोनों पैरों की हड्डियाँ टूट गईं और गर्भ का बच्चा भी नहीं बच पाया। बेटे हरीश राम का शव तीन दिन बाद निकाला जा सका। बाद में बहू के उपचार के लिए आर्थिक सहायता तो मिली, लेकिन वह अपने मायके चली गई। हयात राम की जमीन तबाह हो गई। बाद में सामाजिक संगठनों की पहल पर उसे छत ढकने के लिए टिन तो मिल गये, लेकिन जमीन के अभाव में टिनशेड नहीं बन पाया। प्रशासन ने उसे वन पंचायत भूमि पर टिनशेड ठोंकने की अनुमति दे दी, लेकिन जमीन उसके नाम नहीं की गई।

पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने 5 जुलाई 2011 को सम्पन्न कैबिनेट बैठक में ‘पुनर्वास नीति’ बनाने तथा चिन्हित 233 प्रभावित गाँवों को विस्थापित करने का निर्णय लिया था। उस दिशा में हुई प्रगति की कोई जानकारी नहीं है। आपदा प्रभावितों की समस्याओं को लेकर 20 मई को अल्मोड़ा में ‘हिमालय नीति संवाद समिति’ व कई अन्य स्वैच्छिक संगठनों की ओर से एक बैठक की गई। इस बैठक मे कुमाऊँ मंडल के दूरदराज के क्षेत्रों से आये प्रभावितों ने अपनी व्यथा सुनाई। कहा कि बरसात शुरू होने वाली है, लेकिन उनके विस्थापन की कार्यवाही शुरू नहीं हुई। जो लोग बेघर हो गये और जहाँ भूस्खलन का खतरा बना है, वे क्या करें ?

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