उत्तराखंड पुनर्निर्माण: अब ग्राम गणराज्य ही बचा सकता है इस प्रदेश को

Uttarakhand Punarnirman Srinagarसीताराम बहुगुणा

21 व 22 सितम्बर 2013 को श्रीनगर के हेप्रेक सभागार (हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय) में सम्पन्न ‘उत्तराखंड पुनर्निर्माण’ सम्मेलन में बहुत मेहनत और खासी बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद कुछ अधूरापन रह गया। कार्यक्रम दो दिन का होने के बावजूद उपलब्ध समय का सही प्रबंधन न हो पाने से कुछ लोग लम्बा व अनावश्यक बोल गये तो अनेक वक्ता स्वयं को अभिव्यक्त करने का मौका न मिल पाने से मायूस रहे। मगर उत्तराखंड में पसरी हुई जड़ता को तोड़ने की एक अच्छी कोशिश सम्मेलन में हुई, जिसके दूरगामी परिणाम निकल सकते हैं।

पिछले दो महीनों में उत्तराखंड में तथा इसके बाहर दिल्ली आदि स्थानों पर भी ऐसी बौद्धिक गोष्ठियाँ हो चुकी हैं और हो रही हैं, जिनमें इस आपदा को जन्म देने के पीछे के कारणों को समझने तथा इससे सबक लेकर आगे के लिये तैयारी करने की कोशिश की गई है। इन सब में निष्कर्ष निकला था कि इस आपदा के पीछे प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ जिम्मेदार है। श्रीनगर सम्मेलन के पीछे मंशा यह थी कि इस आपदा के दुष्परिणामों को भोग रहा उत्तराखंड का सामान्य व्यक्ति इन कारणों को समझे तथा आगे अपना भविष्य निरापद तथा खुशहाल करने के लिये कमर कसे। ‘हिमालय बचाओ आन्दोलन’ के समीर रतूड़ी और अरण्य रंजन द्वारा अनथक कोशिश की गई थी कि प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीण, युवा और महिलायें ज्यादा से ज्यादा संख्या में सम्मेलन में भाग लें। मगर प्रभावित क्षेत्रों के लोग अपेक्षित संख्या में अपनी आपबीती सुनाने के लिये नहीं आ पाये और युवा भी ज्यादातर गढ़वाल विश्वविद्यालय के ‘मास्टर ऑफ सोशल वेल्फेयर’ के विद्यार्थी ही थे। सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि इस आपदा के बारे में जनता के पक्ष में खड़े रहने वाले वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की समिति इस आपदा के बारे में अपनी अध्ययन रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके साथ ही प्रदेश सरकार को 73वाँ-74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम तथा वन अधिकार अधिनियम 2005 अंगीकार करने के लिये विवश करने हेतु एक निर्णायक लड़ाई लड़ी जायेगी।

गढ़ सम्राट नरेन्द्र सिंह नेगी के हिमालय के सरोकारों से जुड़े गीतों ‘नौ फरैं विकास का विनाश कैन कारि यूँ पहाड़ु कू खोजा वे सैणि पछाणा वे सैणि’ एवं ‘द्वी दिनै कि हौरि च खैरि मुट्ठि बोटि की रख’ ने श्रोताओं का मन मोह लिया। प्रो. शेखर पाठक ने जमीन, जंगल तथा जल सम्पदा के सरकारी तथा निजीकरण और संरक्षित क्षेत्रों से ग्रामीणों को अलग कर देने और खनन, जल विद्युत परियोजनाओं व नदी तटों पर अवैज्ञानिक तरीकों से सड़क व भवन निर्माण के दुष्परिणाम, गाँव से शहर-कस्बों तथा पहाड़ से मैदान को पलायन, अनियंत्रित तीर्थाटन-पर्यटन और मैदान केन्द्रित औद्योगीकरण, रोजगार और उद्यमिता के नये और व्यावहारिक तरीकों, जल विद्युत उत्पादन का जनहितकारी तरीका तथा वैकल्पिक ऊर्जा की सम्भावनाओं, माफिया, नेता और नौकरशाहों की गिरफ्त में फँसे भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र की असफलता तथा 72वें-73वें संविधान संशोधन आदि आयामों पर प्रतिभागियों के विचार आमंत्रित किये। सम्मेलन की मुख्य उपलब्धि विश्वविख्यात भूगर्भ विज्ञानी प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया का व्याख्यान था, जिसमें बेहद सरल व सुबोध ढंग से उन्होंने बताया कि भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील मध्य हिमालय में बार-बार चेताने के बावजूद परम्परागत ज्ञान को नकार कर विकास का जो मॉडल थोपा गया, उससे ऐसी आपदा का आना स्वाभाविक था। यदि हम अब भी मानवीय बस्तियाँ बसाने, सड़कें बनाने, खनन या अन्य विकास कार्य करने और जल विद्युत उत्पादन करने के अपने तरीकों में बदलाव नहीं लाते तो इससे भी विनाशकारी आपदा के लिये तैयार रहें। मैगससे पुरस्कार से सम्मानित ‘जलपुरुष’ राजेन्द्र सिंह ने कहा कि शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण रूपी तीन विकारों ने उत्तराखंड की सभ्यता को लील लिया है। उत्तराखंड की तबाही के लिये वे प्रधानमंत्री, पर्यावरण मंत्री और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने अपने साथी डॉ. रवि चोपड़ा तथा रशीद सिद्दीकी के साथ राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। राजेन्द्र सिंह के ‘दम्भी’ वक्तव्य की बाद के वक्ताओं, सी.पी.एम. के गंगाधर नौटियाल तथा भाकपा (माले) के इन्द्रेश मैखुरी ने तीखी आलोचना की। उनका कहना था कि राजेन्द्र सिंह को यह त्यागपत्र तब देना चाहिये था, जब मन्दाकिनी घाटी में जल विद्युत परियोजना का विरोध करने पर स्थानीय जनता का दमन किया जा रहा था और सुशीला भंडारी व जगमोहन झिंक्वाण आदि ग्रामीणों को जेल में डाला जा रहा था।

चिपको आन्दोलन के मूल कार्यकर्ताओं में एक, पद्मभूषण चंडीप्रसाद भट्ट, ने कहा कि विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के बारे में उनके द्वारा इन्दिरा गांधी सरकार को चेताये जाने पर तत्काल कार्रवाही हुई थी। मगर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद संवेदनाशून्य हो चुकी प्रदेश सरकार उनकी राय को अहमियत नहीं देती। हालिया आपदा में ही यदि प्रशासन उनकी राय को मान लेता और विभिन्न विभागों में तालमेल होता तो हजारों लोगों की अकाल मृत्यु नहीं होती। इंजीनियर/वास्तुशिल्पी रामकृष्ण मुखर्जी के प्रस्तुतिकरण, जिसमें उन्होंने साबित किया था कि स्विट्जरलैंड में आज बनने वाले मकान हमारे उत्तराखंड के पारम्परिक मकानों जैसे ही हैं, को भी लोगों ने पसन्द किया। मुखर्जी का कहना था कि पहाड़ों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से ही मकान बनाना सस्ता, टिकाऊ और निरापद होता है। आपदाग्रस्त लोगों को पंचायतों के माध्यम से अपने आसपास से लकड़ी, पत्थर और रेता लेने की छूट दी जानी चाहिये। ‘प्रिफैब्रिकेटेड हट्स’ को जबरन आपदा- पीडि़त क्षेत्रों पर थोपना पैसे की बर्बादी होगा। आजादी बचाओ आन्दोलन के मनोज त्यागी का कहना था कि सीधे पंचायतों के माध्यम से राहत कार्य करना ही उत्तराखंड के जख्म भरने का एकमात्र तरीका है। जी.बी.पंत संस्थान के डॉ. मैखुरी और गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. जे. पी. पचैरी, डॉ. मोहन पँवार और डॉ. अरविन्द दरमोड़ा आदि ने भी आपदा का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

हिमालय बचाओ आन्दोलन, गढ़वाल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग, पर्वतीय विकास शोध केंद्र, लोक विज्ञान संस्थान, उत्तराखंड जन जागृति संस्थान, तरुण भारत संघ, आजादी बचाओ आंदोलन एवं नैनीताल समाचार की पहल पर आयोजित इस सम्मेलन में पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली, स्तम्भलेखक भरत झुुनझुुनवाला, बीज बचाओ आन्दोलन के विजय जड़धारी, एन.डी.टी.वी. के पत्रकार सुशील बहुगुणा, आजादी बचाओ आन्दोलन के विवेकानन्द माथने, उत्तराखंड विकास पार्टी के मुजीब नैथानी, श्रीनगर के निवर्तमान पालिकाध्यक्ष कृष्णानन्द मैठाणी, उत्तराखंड महिला मंच की कमला पंत व प्रो. उमा भट्ट, महिला आन्दोलनकारी सुशीला भंडारी, चेतना आन्दोलन के त्रेपन सिंह चैहान, राजीव लोचन साह, डाॅ. डी. आर. पुरोहित, दिगम्बर आशु, जगदम्बा रतूड़ी, पूरन बत्र्वाल, साहब सिंह, कमल जोशी, महिपाल नेगी, दयाकृष्ण कांडपाल, मनीश सुन्दरियाल आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर प्रो. गिरिजा पांडे, चन्द्रशेखर करगेती, उमेश तिवारी ‘विश्वास’, कैलाश नौडि़याल, गजेन्द्र रौतेला, भाष्कर उप्रेती, प्रवीण भट्ट, दीप पाठक, रोहित जोशी, बिजू नेगी, देवेन्द्र कैंथोला, ललित मोहन कोठियाल, भवानी शंकर, विनीत फुलारा, कुम्मी घिल्डियाल, दीप्ति नौडि़याल, भरत रावत, सत्येन्द्र हेमन्ती, महेश जोशी, अमीनुर्रहमान, बसन्त खनी, कुलदीप प्रकाश आदि दर्जनों प्रबुद्ध जनों के साथ आपदापीडि़त क्षेत्रों के निवासी व बड़ी तादाद में हे.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उपस्थित थे।

अन्त में यह तय किया गया कि प्रो. खड्गसिंह वल्दिया व डॉ. नवीन जुयाल आदि वैज्ञानिकों की एक समिति इस आपदा के ‘कारण और निवारण’ के बारे में अपनी अध्ययन रिपोर्ट तैयार करेगी। सम्मेलन में यह राय बनी कि 73वें-74वें संविधान संशोधन अधिनियम लागू न होने तक न तो उत्तराखंड का सही विकास हो सकता है और न ही आपदाओं का सिलसिला रुक सकता है। इसी के आधार पर डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट द्वारा यह कार्यक्रम दिया गया कि मुजफ्फरनगर कांड की 19वीं बरसी, 2 अक्टूबर को पूरे प्रदेष से उत्तराखंड सरकार को ज्ञापन भेजे जायेंगे कि वह तत्काल 73वें-74वें संविधान संशोधन अधिनियम व वन अधिकार अधिनियम 2006 को अंगीकार करने की घोषणा करे, अन्यथा राज्य स्थापना दिवस, 9 नवम्बर से दो दिन पूर्व 7 नवम्बर से देहरादून में उपवास प्रारम्भ कर दिया जायेगा, जिसमें देश व प्रदेश के आन्दोलनकारी, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, विशेषज्ञ एवं चिन्तित नागरिक भाग लेंगे।

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