प्रताप शिखर: आँखिरी पाँत का योद्धा

book-by-pratap-shikharअच्छा डील-डौल वाला शरीर, चेहरे पर सौम्यता, सहज और सरल व्यक्तित्व, मितभाषी, भीतर ही भीतर अपने विचारों में डूबे, हमेशा किसी न किसी उधेड़बुन में व्यस्त…..

ये थे हमारे प्रताप भाई…. प्रताप शिखर। जन आन्दोलनों की अन्तिम पीढ़ी के एक नायक, जो 25 मई को हमें छोड़ गये। विचारों में पाक-साफ तथा स्पष्टवादी धारणा उनकी पहिचान थी। इस स्पष्टवादिता के कारण जितने उनके मित्र थे, उतने ही शत्रु भी। बचपन से ही गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर वे उन दिनों के प्रत्येक सर्वोदय कार्यकर्ता की तरह हमेशा समाज के अंतिम लोगों की सेवा करने तथा समाज में फैली बुराइयों के प्रति जन जागरण करने में जुट गये। सत्तर के दशक में अस्कोट-आराकोट पद यात्रा में उत्साही सिपाही की तरह शामिल हुए और पहाड़ के दर्द को बड़ी करीबी से देखा। तभी से उनका संकल्प पुख्ता हुआ। हेंवल घाटी के आन्दोलन के बाद पहाड़ की बुनियादी समस्याओं को लेकर चिन्तित रहे। फिर उन्होंने इस समस्या का निदान गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से करना उचित समझा और अपने साथियों के लाख मना करने पर भी 1983 में एक स्वयंसेवी संस्था ‘जन जागृति संस्थान’ की शुरूआत कर दी।

मेरी उनसे भेंट श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम में स्वामी मनमथन ने कराई। उस समय वहाँ बूढ़ाकेदार से बिहारी भाई टिहरी से भवानी भाई, सरदार प्रेमसिंह, विजय जड़धारी आदि लोग भी आये थे। स्वामी जी के कामों से प्रताप भाई को ऊर्जा मिलती थी। तभी प्रताप भाई के बुलाने तथा तात्कालिक खण्ड विकास अधिकारी बुद्धिबल्लभ डियूँडी के सम्पर्क में आने की वजह से मैं खाड़ी गया। प्रताप भाई तथा बहिन दुलारी दीदी का सान्निध्य मिला। ‘सिद्ध’ संस्था से कुछ बहिनें एक प्रशिक्षण के लिए खाड़ी आई, तब भी मैं वहाँ कुछ दिन रहा। एक बार मेरे साथ भुवन पाठक व पवन गुप्ता थे। हम लोग किसी बातचीत के लिए खाड़ी आये थे। तब वहाँ आंध्रप्रदेश में शराब बंदी के लिए काम कर रहे एक स्वामी जी भी मिले।

उनके व्यक्तित्व में सादगी थी। फिजूलखर्ची से नाराज हो जाते थे। एक बार एक प्रशिक्षण चल रहा था। उन्होंने मुझे लेखन सामग्री के लिए बाजार भेजा। मैं वहाँ से राइटिंग पैड उठा लाया। उन्होंने मुझे डाँटा और कहा कि जाओ इन्हें वापस कर पतली सी कापियाँ ले आना। वे जब कभी देहरादून में मिलते तो हमारी जोड़ी जम जाती। फिर एक दिन उनका चश्मा टूट गया तो वह मुझे सब्जी मण्डी में ‘भट्ट आप्टीकल’ के यहाँ ले गए। वहाँ चश्मा खरीदा और फिर कहने लगे कि चलो भाई, इस खुशी में एक-एक पैग जाम हो जाए। भट्ट आप्टीकल की सीढ़ी उतर कर हम सीधे जूस वाली दुकान पर चले गए। मौसमी का जूस पीकर वे धर्मपुर चले गए तो मैं मसूरी की तरफ चला गया। एक बार खाड़ी में मैंने उनसे गढ़वाल के गढ़ों के बारे में काफी बातचीत की। उनसे ही मालूम पड़ा कि गजा के पास भी एक गढ़ है। उसके कई किस्से उन्होंने मुझे सुनाए। दुबारा इस बारे में उनसे मिलने की बात थी, लेकिन तभी उन्हें बीमारियों ने आ घेरा। फिर बहुत साल बाद मेरी मुलाकात दून लाईब्ररी के एक कार्यक्रम में हुई। प्रेम पंचोली ने बताया कि दून लाईब्रेरी में उनकी किताब का विमोचन है। वे काफी अस्वस्थ हो गये थे पर बातचीत पूरी की और फिर वह इसके पश्चात् सीधे ऋषिकेश चले गये।

वे एक समृद्ध साहित्यकार भी थे। उन्होंने यहाँ के लोक साहित्य पर भी काम किया। गढ़वाली से अपने लेखकीय परिवेश को सिंचित किया। कुरेडी फटेगी, टिहरी गढ़वाल की लोककथाएँ आदि रचनाओं को जन्म दिया। अपनी बेटी सृजना राणा के साथ ‘एक थी टिहरी’ का सम्पादन किया। 2007 में जब हम लोग उत्तराखण्ड राज्य का पाठ्यक्रम बनाने के लिए नरेन्द्रनगर में एकत्र हुए थे, उन दिनों मेरे साथ ‘बाल प्रहरी’ के सम्पादक उदय किरौला भी थे। एक दिन उनसे कहा, चलो कल सुबह खाड़ी में प्रताप भाई से मिलने जाया जाये। तब उनसे खूब बातचीत हुई थी। हम नीचे उतर रहे थे, तभी शोभन नेगी का फोन आया था। ऊपर से प्रताप भाई ने आवाज लगा कर हमें सूचना दी कि भाई कामेश्वर बहुगुणा नहीं रहे। मै स्तब्ध हो गया और मूर्तवत खड़ा सूरज की बिखरती किरणों को देखता रहा। इस बार उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर जब मैं वीरेन्द्र पैन्यूली के साथ खाड़ी के लिए रवाना हो रहा था तो रास्ते भर यही बातें याद आ रही थीं।

वे जन आन्दोलन के आखिरी पीढ़ी के नायक थे।

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