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    Rajesh Joshee October 21, 2009 at 1:16 PM |

    पता नही क्यों सभी पहाड़्वासी इस अव्यवहारिक मुन्गेरीलाल के सपने को पाले बैठे हैं और कुछ नेता लोग अपनी नेतागिरी इस सपने को दिखाकर चमका रहे हैं। वर्तमान में ऊत्तराखण्ड के पहाड़ो में रेल की बात करना एक बचकानेपन से अधिक कुछ नही है। सवाल रेल के पहाड़ पर चलने का नही हमारी प्राथमिकता और उससे जनता को मिलने वाले लाभ का है। जब तक उत्तराखण्ड के मैदानो में भी रेल ढंग से नही रेंग पाती तब तक यह सब बकवास है। मेरे विचार से अगर कोई नया रेलमार्ग अत्यन्त महत्व्पूर्ण हो सकता है तो वह राईवाला से कोट्द्वार, कालागढ़ होते हुये रामनगर तक हो सकता है इस रेलमार्ग को दोनो तरफ़ से दिवारयुक्त तथा बीच में जानवरों के पार करने के लिये ब्रिजयुक्त बनाया जाये तो इससे प्रदेश के दोनो भागों को आपस में जोड़्ने में सहायता मिलेगी तथा कार्बेट पार्क के पर्यावरण को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा। यह नया रेलमार्ग प्रदेश के लिये बहुत ही लाभदायक हो सकता है अगर सरकार, रेलवे विभाग, जनता तथा नेता निजी स्वार्थों को छोड़्कर मिलकर इसके लिये पहल करे तथा पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति प्राप्त करने का प्रयास करें। अगर मेरी बातों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुची हो तो क्षमा चाहता हुं पर केवल भावनाऎं ही प्रदेश का कलयाण नही कर सकती है कुछ ठोस और लाभदायक तथ्य भी ध्यान में रखे जाने चाहिये।

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    Prem October 29, 2009 at 9:06 AM |

    If one travels (after waiting for several hours at Tanakpur) via Champawat to Jauljibi, through Pithoragarh s(he) knows the importance of the train. Train will make a big difference! A few tunnels and bridges, you are there! Thousands of crores is being spent on Migs. Chandrayans and what not. WHY NOT ONE MORE TRAIN LINE?
    My vote ‘for train’ in hills.
    Best wishes,
    Prem

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    Dr. B S Mehta November 3, 2009 at 4:32 PM |

    परिकल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है,रेल ही क्यूँ ?एक कदम पीछे सड़क की ही सोचे ,उन इलाकों के बारे मैं जो जिला मुख्यालयों से मात्र ८-१० किलोमीटर की दुरी मैं होने के वावजूद अभी तक सड़क के लिए तरस रहे हैं, जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है,जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है.ऐसे भी गाँव हैं जहाँ आज से १० वर्ष पहले सड़क खुदान तो सुरु हुवा था और गाँव के लोग ख़ुशी के मारे होली-दिवाली सब साथ ही मानाने लगे थे की अब हमारे गाँव भी मोटर आएगी,लेकिन ये अब तक हो न सका,मुझे एक गाँव के सयाने व्यक्ति का कहा याद आ रहा है-कि तुम लोग समय से पहले ख़ुशी मत मनाओ,मुझे नहीं लगता कि ये सड़क हमारे जीते जी यहाँ पहुचेगी-वही हुवा भी…..लेकिन सपने बुनने मैं क्या जाता है -यदि वो सुहाने हों तो! किसे दोष दें -नेता जी को जो हमेशा चुनाव से पहले दिलाशा देने आते हैं और पक्का वादा भी कर जाते हैं कि इश बार तो आपके गाँव मैं सड़क ही नहीं गाडी भी आएगी,जो अगले चुनाव तक नहीं आती है,या फिर भ्रस्ट नौकरशाहों को जो केवल अपने कमीशन से मतलब रखते हैं, और ठेकेदार कि तो बात ही क्या करें वो तो खून-पशीना ही इसलिए बहाते है कि उसका नफा होता रहे-ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा…हाँ कभी कभार प्रधान जी दारू पार्टी मैं सौकिनो को जरुर खुश कर देते हैं…. हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं रेल कि पटरी से उतर गया हूँ -पर मैं ये नहीं समझता- हाँ रेल से पहले भी काफी कुछ मेरे उत्तराखंड मैं पटरी मैं लाना बांकी है -शिक्षा और स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चहिये -इनकी संख्या बडाना ही काफी नहीं होगा,गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..
    इस सबके वावजूद फिर भी सबसे अधिक ख़ुशी मुझे होगी जिस दिन सतोपंथ एक्सप्रेश का सपना साकार करने कि दिशा मैं काम सुरु होगा -क्या फरक पड़ता हैं कि हम इसे नहीं देख सकेंगे,हमारी आने वाली नस्लें तो देख पाएँगी-यही हमारी परंपरा है .

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    govind singh rana November 26, 2009 at 1:53 PM |

    परिकल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है,रेल ही क्यूँ ?एक कदम पीछे सड़क की ही सोचे ,उन इलाकों के बारे मैं जो जिला मुख्यालयों से मात्र ८-१० किलोमीटर की दुरी मैं होने के वावजूद अभी तक सड़क के लिए तरस रहे हैं, जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है,जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है.ऐसे भी गाँव हैं जहाँ आज से १० वर्ष पहले सड़क खुदान तो सुरु हुवा था और गाँव के लोग ख़ुशी के मारे होली-दिवाली सब साथ ही मानाने लगे थे की अब हमारे गाँव भी मोटर आएगी,लेकिन ये अब तक हो न सका,मुझे एक गाँव के सयाने व्यक्ति का कहा याद आ रहा है-कि तुम लोग समय से पहले ख़ुशी मत मनाओ,मुझे नहीं लगता कि ये सड़क हमारे जीते जी यहाँ पहुचेगी-वही हुवा भी…..लेकिन सपने बुनने मैं क्या जाता है -यदि वो सुहाने हों तो! किसे दोष दें -नेता जी को जो हमेशा चुनाव से पहले दिलाशा देने आते हैं और पक्का वादा भी कर जाते हैं कि इश बार तो आपके गाँव मैं सड़क ही नहीं गाडी भी आएगी,जो अगले चुनाव तक नहीं आती है,या फिर भ्रस्ट नौकरशाहों को जो केवल अपने कमीशन से मतलब रखते हैं, और ठेकेदार कि तो बात ही क्या करें वो तो खून-पशीना ही इसलिए बहाते है कि उसका नफा होता रहे-ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा…हाँ कभी कभार प्रधान जी दारू पार्टी मैं सौकिनो को जरुर खुश कर देते हैं…. हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं रेल कि पटरी से उतर गया हूँ -पर मैं ये नहीं समझता- हाँ रेल से पहले भी काफी कुछ मेरे उत्तराखंड मैं पटरी मैं लाना बांकी है -शिक्षा और स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चहिये -इनकी संख्या बडाना ही काफी नहीं होगा,गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..

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    Manoj Joshi April 28, 2010 at 12:50 PM |

    At least the train service should be up to Tankapur and Govt. has to increase no. of trains towards Haldwani/Kathgodam.

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    Seema Mehara, Dhonthiya, -- July 27, 2010 at 5:13 PM |

    कल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है, आप तो रेल के बात करते है , हमारे उधर तो ये हॉल है ,—————– ग्राम सभा दियौना- भीने मे १० साल से एक ही बात है की रोड आएगी पर आज तक नहीं आयी है , सल्ट के बिध्याक रणजीत सिंह रावत जो पिछले १२ सालो से सल्ट के बिधायक है , चुनाव के समय हर – बार यही कहते है की अबकी बार तो रोड जरुर दिया जायेगा . पर चुनाव ख़त्म होने के बाद बस ये सब बाते एक भाषण हे रह जाती है, पिछले चुनाव मे तो उन्होंने दो पुथिया रोड भी काट डाली ताकि जनता को बेकूफ बनाया जाय, चुना लगया गया , पिलयर लगाये गए, पर शायद भोली जनता यह नहीं जानती की ये चुना उनको लग रहा है, वास्तव मे यही हुआ , रोड का सपना – सपना हे रह गया , जबकि , दियोना , भीने , काने, खल्पति, रिक्वाशी , मत्वाश से रोड कम से कम 7-८ किलोमीटर दूर है , पर यहाँ अभी तक रोड नहीं है जो बहुत ही कष्टदायी है, यहाँ के लोगो का जीवन बहुत हे कस्त्दायी है , पर भी हमारे बिधायक जी को चिंता नहीं है,
    जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है, कई लोगो के साथ ऐसा हुआ भी है , इसके एक नहीं काफी उदहारण है , , जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है जबकि अपने वह पर तो जब वह पहले बार बिध्याक बना उस ही समय रोड बना दिया , आज दंगुला ग्राम सभा , या फिर शाशिखाल मे जायोगे तो ऐसा लगेगा जैसे आप किसी सहर मे प्रवेश कर गए है . ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा… तो और क्या हो सकता है , ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, माननीय रणजीत सिंह इन बातो पर थोडा गौर जरुर करे…
    गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..
    आपकी भोली – भाली जनता
    दियौना , भीने , काने , खल्पति , रिक्वाशी , मत्वाश, चमन पुर , सिस्वादी ,आदि के लोग

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    Dinesh Panwar September 1, 2010 at 4:39 PM |

    Mujhe nahi lagta hai ki, uttrakhand walon ka sapna kabhi sachch ho payega. kyonki abhi to uttrakhand mai road marg ka sahi se vikash nahi ho paya hai. or log maidani bhagon mai jakar basne lage hai.jo uttrakhand ke pichhdne ka mul karan banta ja raha hai. jo road bani bhi hai wah her mahine tuthti rahti hai. or is saal to inderdev ne bhi khub kripa nibhayi hai. But hamen is samay ekjut hone ki awsyakta hai. or centeral goverment ke akhon ko kholna hai. ( Aap ka bhai- Dinesh Singh Panwar Darmola Rudrapryag Uttrakhand -9654395499)

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