पारम्परिक ज्ञान से आँखें न मूँदें

gharat-in-action 16-17 जून को उत्तराखंड में आई विनाशकारी आपदा ने पहाड़ पर विकास के मॉडल और इको सिस्टम (पारिस्थितिकीय तंत्र) से छेड़छाड़ पर बहस को तेज कर दिया है। इस सवाल पर सारी बहसों को अंततः उत्तराखंड में ‘इको संसिटिव जोन’ बनाने के समर्थन में ले जाया जा रहा है। पर्यावरणविदों के अलावा जल-जंगल-जमीन पर जनता के परंपरागत अधिकारों की वकालत करने वाले कई संगठन व लोग भी इसके समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। पहाड़ में वर्तमान विद्युत परियोजनाओं के समर्थक भी इस तबाही को रोकने के लिए और भी बड़े पैमाने पर बाँधों व सुरंगों के जरिये नदियों के वेग को रोकने की खुलकर वकालत कर रहे हैं। मगर इन सारी बहसों के बीच पहाड़ का वो मानव समाज और उसकी चिंताएं नजर नहीं आ रही हैं जो हजारों वर्षों से पहाड़ को, यहाँ के इको सिस्टम को और यहाँ की आत्मनिर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था को बचाता आया है।

पहले पहाड़ पर मानव जीवन को समझना जरूरी है। हजारों वर्षों से कृषि-पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी पर आधारित पहाड़ की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार वन रहे हैं। इसलिए पहाड़ के लोगों ने हजारों वर्षों से न सिर्फ वनों को लगाया और उनकी रक्षा की बल्कि इको सिस्टम को समझते हुए अपने रहन-सहन और आजीविका के साधनों का विकास किया। पहाड़ के गाँवों की बनावट देखें तो हर गाँव में ऊपर जंगल, जंगल के नीचे आबादी, आबादी के नीचे खेती, खेती के नीचे नदी। यानी किसी भी गाँव की आबादी नदी से सटी नहीं है। अपने अनुभव से हमारे पुरखों ने नदी तट को आबादी के लिए सुरक्षित नहीं माना था। पहाड़ में कहावत है कि नदी और खेत की मैड़ बारह वर्ष में अपनी पुरानी जगह पर आ जाती है। नदी को लेकर यहाँ के ग्रामीणों के इस परम्परागत ज्ञान को वर्तमान आपदा ने पूरी तरह सही साबित कर दिखाया है। पहाड़ के लोगों ने अपने पानी के स्रोतों को बचाए रखने और चोटियों पर अपने पालतू व जंगली जानवरों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए चाल-खाल (छोटे-छोटे तालाब) बनाने की एक पद्धति विकसित की जिसमें बरसात का पानी जमा होता था और वह भूगर्भीय जल को बढ़ाने का काम करता था। आज भी हल-बैल के साथ पहाड़ की खेती व पशुपालन से लेकर कृषि यंत्रों तक वनों पर निर्भरता है। चूँकि वन पहाड़ के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग हैं इसीलिए एकमात्र उत्तराखंड के पहाड़ ही हैं जहाँ सरकारी वनों से परम्परागत अधिकार छिन जाने के बाद लगभग 16 हजार राजस्व गाँवों वाले राज्य की जनता ने 12 हजार से ज्यादा गाँवों में वन पंचायतें गठित कर सरकारी वनों से इतर अपने खुद के वनों का निर्माण किया है। आज जो सरकारें और लोग ऊर्जा की जरूरतों का हवाला देकर पहाड़ की नदी-घाटियों को जे.पी., रेड्डी, एल.एनटी., एनटीपीसी आदि के हवाले करने, बिजली उत्पादन के नाम पर पहाड़ों व नदियों से उन्हें मनमानी करने की छूट देने की वकालत करते हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब बिजली का आविष्कार ही नहीं हुआ था, तब पहाड़ के लोगों ने आज से एक हजार साल पहले घट (पनचक्की) का आविष्कार कर पानी से ऊर्जा उत्पन्न करने की विधि खोज ली थी। यह विधि नदी और पहाड़ों को छेड़े बिना ही ‘रन आफ रिवर’ पद्धति से ज्यादा सफल हुई थीं। पहाड़ के लोगों को यह विधि सिखाने के लिए किसी जेपी, रेड्डी, एलएनटी, एनटीपीसी को लाने की जरूरत नहीं पड़ी थी। यह इको सिस्टम को क्षति पहुँचाए बिना विकास करने का पहाड़ के लोगों का सिंचित परंपरागत ज्ञान था। आज सुरंग आधारित जिन बड़ी-बड़ी विनाशकारी परियोजनाओं को ये कम्पनियाँ बना रही हैं वो रन ऑफ रिवर पद्धति नहीं कहलाती हैं। लोगों के इस संचित ज्ञान के आधार पर यहाँ की कृषि, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी के साथ ही पनचक्की के लिए विकसित की गई रन ऑफ रिवर पद्धति को ऊर्जा की अन्य जरूरतों के लिए विकसित कर यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता था।

मगर पहले अंग्रेजों और बाद में आजाद भारत के शासकों ने उत्तराखंड की इस विकसित होती आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करने का षड़यंत्र किया। अंग्रेजों ने उत्तराखंड के इस पर्वतीय क्षेत्र को वन आधारित कच्चे माल व सस्ते श्रम के लिए इस्तेमाल किया। तब न सिर्फ फैलते रेल लाइनों के जाल के लिए पहाड़ के जंगलों को बड़े पैमाने पर काटा गया, बल्कि सर्दियों में आग सेंकने के लिये पहाड़ के परम्परागत पेड़ों को काट कर उसका कोयला बनाया गया। साथ ही विकसित होते शहरी केन्द्रों व फौज के लिए यहाँ के युवाओं की सस्ते श्रम के रूप में सप्लाई होती रही। यह क्रम आजादी के पच्चीस साल बाद तक जारी रहा।

सन् 1976 से शासक वर्ग की जरूरतें बदलने लगी थीं। देश के शहरी केन्द्रों को अब सस्ते श्रम की जगह पर्याप्त बिजली व स्वच्छ पानी की जरूरतों से जूझना पड़ रहा था, वहीं विकसित राष्ट्रों द्वारा ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के चलते दुनिया के स्तर पर पर्यावरण संरक्षण एक प्रमुख एजेंडा बन कर सामने आ गया। ऐसे में उत्तराखंड के इस पर्वतीय भूभाग को बिजली, स्वच्छ पानी, पर्यावरण व जैव-विविधता के संरक्षण के लिए रिजर्व जोन में तब्दील करने की रणनीति पर शासक आगे बढ़ने लगे। मगर यह तभी संभव था जब यहाँ की परम्परागत आर्थिकी के आधार को खत्म किया जाता, इसलिए उन्होंने जानबूझ कर यहाँ की कृषि, पशुपालन व ग्रामीण दस्तकारी को हतोत्साहित कर लोगों को यहाँ से पलायन के लिए मजबूर किया। आज उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र के गाँवों में ही युवाओं को देखा जा सकता है। उन क्षेत्रों में पशुपालन और कृषि पर आधारित उनकी परम्परागत आजीविका के आधार का मजबूत होना इसका मुख्य कारण है। चीन व नेपाल सीमा से जुड़े धारचूला, मुनस्यारी (पिथौरागढ़), जोशीमठ ( चमोली), ऊखीमठ (रुद्रप्रयाग), भटवाड़ी और रवाईं (उत्तरकाशी) ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ बड़ी तादात में युवा आज भी गाँवों में टिका है। बाकी पहाड़ पलायन की मार से त्रस्त है।

राज्य बनने के बाद जल- जंगल- जमीन पर स्थानीय निवासियों के परम्परागत आधिकार बहाल करने और पारिस्थितिकीय तंत्र से ज्यादा छेड-छाड़ किये बिना विकास का वैकल्पिक ढाँचा खड़ा करने की जो जिम्मेदारी राज्य के नए नेतृत्व के जिम्मे थी, वह अपनी वर्गीय प्रतिबद्धता के चलते भाजपा-कांग्रेस की सरकारें उसके विपरीत रास्ता चुनती गई। राज्य की आर्थिकी को मजबूत आधार देने के नाम पर ऊर्जा प्रदेश और पर्यटन प्रदेश के नारे गूँजने लगे। विद्युत कंपनियों की बड़ी-बड़ी मशीनों के निर्वाध आवागमन के लिए सड़कों को चौड़ा कर इन सड़कों और सुरंगों का सारा मलवा पेड़ों सहित नदियों में डाल दिया गया। राज्य में राजस्व वसूली के बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शराब के व्यवसाय को मुख्य व्यवसाय का दर्जा दे दिया गया। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति औसत आय को बढ़ाने के नाम पर जमीनों की लूट का कारोबार पनपाया गया। नतीजे के तौर पर नदी-घाटियों पर विद्युत कंपनियों का कब्जा और मनमानी बढ़ती गई। पर्यटन व्यवसाय और ‘इको टूरिज्म’ को बढ़ावा देने के नाम पर सड़कों, नदी घाटों और जंगलों पर सत्ता के संरक्षण में कब्जा करने की होड़ में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, यूकेडी और सपा जैसी कोई भी पार्टी पीछे नहीं रही। अब तक राज्य में विद्युत कम्पनियाँ 1700 वर्ग किलोमीटर जंगल साफ कर चुकी हैं। विभिन्न योजनाओं के लिये राज्य सरकार 17 हजार वर्ग किलोमीटर वनभूमि को हस्तांतरित कर चुकी है। मगर इसके बदले दोगुने क्षेत्र में वृक्षारोपण की अनिवार्य शर्त की खानापूर्ति के लिए दूसरे राज्यों में दर्शाकर आबंटित धन की जमकर लूट की गई। गंगा नदी के सौ मीटर बाहर तक कोई निर्माण न करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद हरिद्वार से लेकर गंगोत्री-केदारनाथ तक गंगा व अन्य नदियों के जल को छूते हुए होटल व्यवसायियों, धार्मिक संस्थाओं और सरकारी विभागों द्वारा भवन निर्माण 15 जून 2013 तक बेरोकटोक जारी था। राज्य सरकार को हेलीपैडों के इस्तेमाल का कोई भी शुल्क दिए बिना यात्रा सीजन में निजी कंपनियों के हेलीकॉप्टर रोजाना चार चक्कर उच्च हिमालयी क्षेत्रों का लगा रहे थे, जिन पर रोक लगाने के आदेश 10 मई 2013 को माननीय हाईकोर्ट ने दे दिए थे।

सत्ता द्वारा सत्ता के संरक्षण में इको सिस्टम के साथ किये जा रहे इस विनाशकारी व्यवहार ने ही इको सिस्टम को भारी नुकसान पहुँचाया है। इसी का खामियाजा 16-17 जून की विनाशकारी आपदा के रूप में हमें भुगतने को मजबूर होना पड़ा। पहाड़ के जीवन में अति मुनाफे के लिए जब तक यह बाहरी हस्तक्षेप नहीं था, यहाँ के इको सिस्टम को कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। मगर अब अति मुनाफे पर खड़ी प्रकृति के लिए विनाशकारी यह राजनीति ‘इको सैंसिटिव जोन’ के माध्यम से उन पर्वतवासियों को विस्थापन की सजा दे रही है जो हजारों वर्षों से इस इको सिस्टम के मजबूत पहरेदार रहे हैं। ‘इको सैंसिटिव जोन’ इनकी परम्परागत आजीविका पर एक बड़ा हमला है जो इन दुर्गम क्षेत्रों के नौजवानों को भी पलायन के लिए मजबूर कर देगा। इको सिस्टम को बचाए रखने और जैव-विविधता की रक्षा के नाम पर उत्तराखंड के एक बड़े भू-भाग को ‘इको सैंसिटिव जोन’ में तब्दील करने का षडयंत्र चल रहा है। इसके पहले चरण में 18 दिसंबर 2012 से गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के एक सौ किमी क्षेत्र को ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित किया जा चुका है। केंद्र सरकार ने सभी राष्ट्रीय पार्कों और सेंचुरीज के दस किलोमीटर बाहरी क्षेत्र को इको सेंसिटिव जोन घोषित करने का निर्णय लिया है।

उत्तराखंड में पहले से चौदह राष्ट्रीय पार्क और सेंचुरीज मौजूद थे। बावजूद इसके राज्य सरकार ने इनकी संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भेज कर इस साल तीन नए सेंचुरीज क्षेत्रों को स्वीकृति दिला दी है। पहले ही इन राष्ट्रीय पार्कों व सेंचुरीज की सीमा में आये राज्य के हजारों गाँवों पर विस्थापन का खतरा मँडरा रहा है। ऐसे में अगर इनके दस किमी बाहरी क्षेत्र को ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित कर दिया गया तो उत्तराखंड की आबादी के एक बड़े हिस्से को विस्थापन के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। राज्य में ‘इको सेंसिटिव जोन’ का भारी विरोध देख सत्ताधारी कांग्रेस और भाजपा ने भी इसका विरोध किया है। इन दोनों पार्टियों का विरोध सिर्फ दिखावा है। सच तो यह है कि इको सेंसिटिव जोन’ के गठन का निर्णय एनडीए सरकार ने 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेई की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया था। इसी तरह 18 दिसंबर 12 को उत्तरकाशी में इको सेंसिटिव जोन के गठन का निर्णय हो जाने के बाद भी न तो राज्य की कांग्रेस सरकार ने इसके खिलाफ कोई कदम उठाया और न ही पूर्व में भेजे गए नए सेंचुरीज के प्रस्तावों को ही वापस लेने की कोई पहल की। अगर राज्य में निर्धारित सभी क्षेत्रों को इको संसिटिव जोन बना दिया गया तो वहाँ के निवासियों का जीना मुश्किल हो जाएगा। वनों पर निर्भर पशुपालन और खेती छोड़ने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया जाएगा, लघु वन उत्पाद जो उनका परम्परागत वनाधिकार है से वे वंचित हो जायेंगे। वे अपनी आबादी का विस्तार नहीं कर पायेंगे और पुराने घरों का पुनर्निर्माण करने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से इजाजत लेनी होगी। जबकि पूँजीपतियों को होटल व कॉटेज बनाकर अपना व्यवसाय करने की इजाजत होगी। बात साफ है कि सरकार इको सेंसिटिव जोन के नाम पर इको सिस्टम को नुकसान पहुँचाने वाली ताकतों के व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए स्थानीय जनता को उनकी जमीनों व परम्परागत आजीविका से बेदखल करना चाहती है।

राज्य बनने के बाद सत्ताधारी कांग्रेस-भाजपा के नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से उत्तराखंड में बचे इको सिस्टम के बदले राज्य को ग्रीन बोनस देने की मांग शुरू कर दी थी। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने तो आगे बढकर हिमालयी राज्यों की बैठक कराने और राज्य को प्रतिवर्ष चालीस हजार करोड़ रुपये ग्रीन बोनस के रूप में देने की मांग कर डाली। तब यह राशि राज्य के कुल सालाना बजट का दोगुना से भी ज्यादा थी। इस अभियान में वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर कई पर्यावरणविद तथा एनजीओ भी लगे हैं। एनजीओ ने हिमालयी राज्यों का अपना एक नेटवर्क भी स्थापित कर दिया है। दरअसल ग्रीन बोनस के नाम पर यह पूरा अभियान जो पिछले बारह वर्षों से उत्तराखंड में चलाया जा रहा है वह इको सेंसिटिव जोन’ के निर्माण के लिए वातावरण तैयार करने के अभियान का ही हिस्सा था जो साम्र्राज्यवादियों और उनकी हितपोषक फंडिंग एजेंसियों द्वारा वित्त पोषित था। हिमालय और उसके इको सिस्टम को हजारों वर्षों से संरक्षित रखने वाले लोगों को उनकी जमीनों और परम्परागत आजीविका से बेदखल कर आखिर यह ग्रीन बोनस किसके लिए माँगा जा रहा है ?

पहाड़ में 17 सौ वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को नष्ट करने वाली जल विद्युत परियोजनाओं को चलाने वाली कंपनियों को बिना कार्बन उत्सर्जन के विद्युत उत्पादन के लिए लाखों रुपये ग्रीन बोनस के रूप में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं दे रही हैं क्या वे इसकी हकदार हैं ? मगर 12 हजार से ज्यादा जंगल वन पंचायतों के माध्यम से तैयार कर हिमालय और उसके पर्यावरण की रक्षा कर इन नदियों को बचाने वाले पहाड़ के ग्रामीणों की वन पंचायतों को आज तक किसी एजेंसी ने कोई ग्रीन बोनस नहीं दिया है। इससे साफ हो जाता है कि ग्रीन बोनस की यह राजनीति किसके हित में की जा रही है। किसी भी हाल में इको सेंसिटिव जोन के गठन व विस्तार पर रोक लगनी चाहिए। हिमालय के ईको सिस्टम को बचाए रखने ग्रामीणों को खदेड़ने के बजाय हिमालय क्षेत्र में बाहरी मानव गतिविधियों को सीमित किया जाना चाहिए जिसके तहत निम्न कदम उठाये जाने चाहिए-

1. उच्च हिमालयी क्षेत्र में सभी तरह की यात्राओं को सरकार हरिद्वार से आगे स्वयं आयोजित करे और उसमें जाने वाले लोगों की संख्या सुनिश्चित करे।

2. हरिद्वार से आगे काँवड़ यात्रा पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।

3. पर्यटन विकास के नाम पर सभी उच्च हिमालयी क्षेत्रों, राष्ट्रीय पार्कों और सेंचुरीज में बड़े होटलों, रिसोर्टों और बड़ी धर्मशालाओं को पूर्णतः प्रतिबंधित कर ग्राम पर्यटन (विलेज टूरिज्म) को विकसित किया जाय और इसके लिए ग्रामीणों को सरकारी सहायता मिले।

4. इन क्षेत्रों में जमीनों की बिक्री पर तुरंत रोक लगाई जाय और पूर्व में हुए सभी भूमि सौदों को रद्द किया जाय।

5. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सड़कों के बजाय रज्जु मार्गों (ट्राली) को प्राथमिकता दी जाय और स्थानीय निवासियों को उसके किराए में छूट दी जाये।

6. नदी किनारे हुए सभी तरह के अतिक्रमणों को हटाते हुए इस बार नदी की चपेट में आई जमीनों पर पुनर्निर्माण पर पूर्णतः रोक लगे और खतरे की जद में आ चुके भवनों को भी मुआवजा देकर अन्यत्र स्थानान्तरण करने के आदेश जारी हों।

7. सभी स्वीकृत जल विद्युत परियोजनाओं की पुनः समीक्षा हो और तब तक इन परियोजनाओं के निर्माण पर रोक लगे।

8. सुरंगों का मलबा नियम विरुद्ध नदी में गिरा कर तबाही को बढ़ाने वाली विद्युत कंपनियों से नुकसान की भरपाई कराई जाय।

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