छोटा मुँह छोटी बात : कालेजों में बायो मीट्रिक्स मशीनें!

Biometrics‘हरेला अंक’ में ईश्वर जोशी ने एकदम सही लिखा है कि ‘‘राज्य बनने के बाद हमारी सरकारों ने यहाँ के विकास की नींव दो नारों के साथ रखी। पहला ऊर्जा प्रदेश तथा दूसरा पर्यटन प्रदेश। आज यही दो नारे आपदा का मूल कारण बने।’’

दरअसल ये दो क्षेत्र ही चूँकि बाजार एवं निजी स्वार्थों की जरूरत के हिसाब से ‘विकास’ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त थे, परिणामतः सरकार भा.ज.पा. की रही हो या कांग्रेस की, ‘विकास’ के लिए सारा छल-बल इधर ही केन्द्रित रहा। छल-बल की इन सरकारी कोशिशों ने इस विकास के सह उत्पाद (बाई-प्रोडक्ट) के तौर पर एक नया कार्य-क्षेत्र ‘आपदा एवं पुनर्वास’ इधर खोल दिया है। यह तय है कि सरकार की ‘विकास गतिविधियाँ’ अब कुछ समय इधर ही केन्द्रित रहनी हैं। कम से कम 2014 के चुनावों तक तो निश्चित ही। केन्द्र से तकरीबन 14 हजार करोड़ रुपये मिलने तय हैं…विश्व बैंक जैसी संस्थाओं और अन्य जुगाड़ों से भी कुछ न कुछ हाथ लगेगा ही। आखिर रोज-रोज महंगे होते जा रहे चुनावों के खर्चों के लिए दल, प्रत्याशियों और ठेकेदार-कार्यकर्ताओं की जरूरतों की पूर्ति यहीं से तो होनी है।

अच्छा, एक बात बताइये। आपदा और पुनर्वास के मौजूदा दौर में अगर सरकार पंजे वालों की नहीं फूल वालों की होती तो क्या आपदा राहत के मामले में अकर्मण्यता, संवेदनहीनता, लापरवाही, राहत सामग्री की बर्बादी-बंदरबाँट तथा भ्रष्टाचार का मौजूदा परिदृश्य कुछ भिन्न होता ?

वैसे उत्तराखण्ड में आपदा और राहत के प्रकरण का सत्ता के स्तर पर निबटारा हो चुका है। अब न आपदा बाकी है न राहत, क्योंकि ‘उत्तराखण्ड विधानसभा सत्र के इतिहास में पहली बार सभी कार्य रोक कर आपदा पर की चर्चा’ की हैडलाइन अखबार में लग चुकी है। विपक्ष सरकार पर आरोप लगा चुका है और सरकार ने अपनी तरफ से स्थिति स्पष्ट कर दी है। विपक्ष और सरकार दोनों इससे ज्यादा कर भी क्या सकते हैं ? बाकी त्रासदी सम्बन्धी अपने दायित्वों के पूरे हो जाने की बात बहुगुणा (?) पे्रस के साथ यह कह कर साझा कर चुके हैं ही कि केदारनाथ में पूजा शुरू हो चुकी है और हेमकुण्ड के लिये भी पहले जत्थे को उन्होंने रवाना करवा दिया है। अब वह आराम से ज्यादा समय नई दिल्ली में अगरबत्ती-धूप दिखाने में लगा सकते हैं।

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खबरें और भी हैं। उच्च शिक्षा निदेशक के हवाले से खबर लगाई गयी है कि उत्तराखण्ड के 70 डिग्री कॉलेजों में प्राध्यापकों की हाजिरी सुनिश्चित करने के लिए ‘बायोमीट्रिक मशीन्स’ लगाई जाने वाली हैं। अब मशीन पर उनके हाथों की छाप उनकी उपस्थिति का प्रमाण होगी। प्राचार्यों से यह भी देखने को कहा गया है कि गुरु जी लोग कम से कम पाँच घण्टे कॉलेज में रहें और पाँच पीरियड्स पढ़ायें जरूर।

हमारे पढ़ने के दिनों में इन कॉलेजों में गुरु जी लोगों के लिए हाजिरी रजिस्टर तक तो होता था नहीं। हाँ कक्षायें जरूर हो जाती थीं। जमाना बदल गया है। अब टैक्नोलॉजी का इस्तेमाल जरूरी है। उत्तराखण्ड सरकार राज्य स्थापना के बाद से ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी शिद्दत से सक्रिय रही है। डिग्री कालेजों की तादाद दूनी हो गयी (भले ही प्राध्यापकों के आधे पद खाली हों)। तमाम एजेन्सीज के जरिये तमाम तरह के प्रोफेशनल कोर्सेज चलाये जाते हैं (तथाकथित फैकल्टीज भले ही भीतर से ही जुगाड़ी जाती हों और इन पाठ्यक्रमों से आज तक कोई प्रोफेशनल निकला न हो)। सरकार की कोशिश रही है कि कॉलेजों में नये तकनीकी उपकरणों की कमी न रहे। मेरे कस्बे के डिग्री कॉलेज में ही तकरीबन 60 कम्प्यूटर, 25 प्रिंटर और आधा दर्जन फोटो कॉपियर आदि-आदि मौजूद हैं (अब यह सवाल न उठाया जाये तो बेहतर कि उनकी उपयोगिता क्या है)। दसेक साल पहले कम्प्यूटर से सम्बन्धित एक ऐसा ही कोर्स ‘एपटैक’ के साथ मिल कर शुरू करवाया गया था, जिसके बारे में तत्कालीन शिक्षा सचिव का दावा था कि इसके द्वारा 4/5 सालों के भीतर राज्य को इतने कम्प्यूटर प्रोफेशनल मिलने वाले हैं कि राज्य उन्हें अन्य राज्यों को निर्यात करेगा (यह बात दीगर है कि यह व्यवस्था अधिकांश कॉलेजों में अकाल मृत्यु को प्राप्त हो चुकी है, अगर कहीं चलाई जा रही है तो ‘वैन्टीलेटर’ पर होगी, मीठा मीठा हप्प….कड़वा कड़वा थू)। अब जहाँ तक इन ‘बायोमीट्रिक मशीनों’ की बात है, आवश्यक रखरखाव एवं बजट के अभाव में खराब हो जाने तक, अगर वे प्राध्यापकों को कॉलेज में बनाये रखने में कामयाब हो भी गयीं तो वो मशीन कहाँ से लायी जायेंगी जो विद्यार्थियों की कक्षाओं में उपस्थिति को सुनिश्चित कर सके!

‘छोटा मुँह छोटी बात’ दरअसल उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जरूरत बायोमीट्रिक मशीनों की नहीं वरन् प्रवेश से पहले पढ़ने, पढ़ाने और पढ़वाने वाले सभी का ‘साइकोमैट्रिक टैस्ट’ (योग्यता, अनुकूलता और व्यक्तित्व परीक्षण) किये जाने की है।

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