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    नवीन बगौली February 6, 2012 at 2:26 AM |

    अनिल राणा जी आपका लेख पढ़ा अच्छा लगा कि आप जनजातियों के दुख दर्द को समझ और देख रहे हैं, लेकिन महाराज आपकी बात एक तरफा है, सही है, भू-माफिया इस प्रकार की हरकतें कर रहा है, लेकिन जनजाति के लोग भी कम गफलत नहीं फैला रहे, एक ही जमीन को कई लोगों को बच देते हैं, कई बार तो दादा की बेची गई जमीन पर पोता लाखों रुपये का लोन ले ले रहा है, जमीन पर काबिज गरीब फिर कैसे उस लोन को चुकाए। इस प्रकार के मामले एक नहीं खटीमा और सितारगंज में ही हजारों में हैं। अच्छी बात है जब कोई घटना होती है तो उसमें पीड़ित के पक्ष में सभी खड़े हो जाते हैं। लेकिन रतनपुर में आज से बीस बर्ष पहले कई तीन संगे भाइयों समेत सात पर्वतीय मूल के लोगों की हत्याएं हुई हैं, वर्तमान में जो विवाद है यह उसी के प्रकाश में हुआ है। इस प्रकार की हालत तब तक जारी रहेगी जब तक दोनों पक्षों की ओर से मामला का कोई सर्वमान्य हल नहीं निकाला जाता। बहरहाल खटीमा का भूमिविवाद का एक बहुत लंबा इतिहास है। इस पर कई पन्ने लिखे जा सकत हैं। बहरहाल आपने एक पक्षीय ही सही इस विवाद पर कुछ तो लिखा है आप धन्यवाद के पात्र है, दूसरे पक्ष की पीड़ा और दर्द को खिलना भी तो हमारा काम है।

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