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    Gopal Singh Negi June 25, 2013 at 8:27 PM |

    व़ाह चंदन दाज्यू मज़ा आ गया. पहाड़ी शादी के संस्मरण, ख़ास कर बुआ कौशल्या दीदी और ईजा के अनुभवो को सज़ो कर आपने प्रस्तुत किया, बड़े काबिलेतारीफ है. ये वाकई बड़ा मार्मिक और पहाड़ी जीवन से आत्मसात करने वाला संस्मरण है मुझे आशा है आप हमारे पहाड़ के बारे मे इसी तरह अपने अनुभवो को हम जैसे पहाड़ी जो मैदानी जगहों मे अपनी रोजी रोटी कमाने गये है, से सांझा करते रहिंगे, धन्यवाद।

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    chandra shekhar Taragi June 26, 2013 at 10:43 PM |

    आपके सम्पूर्ण लेख को पढ़ा , ऐसा लगा की जैसे पहाड़ो के बीच ही हूँ | मैं दौलाघाट के समीप के गों रिखे का रहने वाला हूँ | यूँ तो जीवन के सुरुवात की दिन ( छै वर्ष) ही पहाड़ मैं बीते हैं ,पर पहाड़ी जीवन का जो वर्णन आपने किया है, वो सब पलों को मैने को मैने महसूस किया है और आज भी संजो के रखा है | विशेषकर दौलाघाट इंटर कालेज , गोविंदपुर और माजखाली का वर्णन | जिन विधलय के परचारियों का आपने ज़िक्र किया है , औन सब के बारे मैं मैंने अपने बौजू ,इजा और मामा से खूब सुना है |

    पहाड़ी शादी का अनुभव , जंगलों मैं जाना,बीड़ी पीना,माकन का बनवाना , गों वालो का घर के लोए सामान सारना , और काम दरों का कामचोर होना, ज्यूँ का तूँ वर्णित किया है |

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