श्रीकृष्णचरितामृत : प्रथम सोपान

दीपा कांडपाल

श्रीकृष्ण की रसमयी लीलाओं का स्वरूप लौकिक एवम् आध्यात्मिक दोनों ही रूपों में हिन्दी साहित्य के आदिकाल से अब तक अभिव्यक्ति का विषय रहा है। श्रीकृष्ण के बहुआयामी व्यक्तित्व ने भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, आध्यात्म तथा लोकजीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया है। हिन्दी साहित्य में कृष्ण विषयक रचना करने वाले कवियोँ की संख्या हजारों में है। कृष्ण काव्य परम्परा में महेश कुमार वर्मा ‘अशांत’ का श्रीकृष्णचरितामृत इस युग का सर्वाधिक विस्तृत महाकाव्य है, जिसकी पृष्ठ संख्या लगभग छः हजार है। इतने विशाल कलेवर में कृष्ण चरित्र को समग्र में समेटने का कार्य अशांत जी द्धारा ग्यारह सोपानों में किया गया है। ये ग्यारह सोपान हैं- बाल पर्व, गीता पर्व, कुरुक्षेत्र पर्व, नीति पर्व, विजय पर्व, राजधर्म पर्व, शान्ति पर्व एवम् मोक्ष पर्व। इनमें प्रत्येक सोपान में मंगलाचरण संस्कृत श्लोकों में है। सभी सोपानों में कृष्ण चरित्र के विविध आयाम विस्तार में वर्णित हैं। श्रीमद्भागवत् महापुराण, ब्रह्म वैवर्तपुराण, हरिवंश पुराण, महाभारत, गर्ग संहिता आदि ने कृष्ण चरित को पूर्णता देने का सफल प्रयास किया है।

ग्रन्थ की रचना अवधी भाषा में है। विषयानुरूप छन्दों के चयन ने इस काव्य को अनुपम बना दिया है। दोहा, चौपाई, हरिगीतिका जैसे छन्दों के साथ-साथ अनुष्टुप, शार्दूल विक्रीडि़त, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, भुजग-प्रयात, तोमर, त्रोटक आदि अनेक छन्दों का विधान प्रसंगानुसार काव्य की श्रीवृद्धि कर रहा है।

इस विशाल ग्रन्थ का ‘बाल पर्व’ प्रकाशित हो चुका है। पुस्तक का यह प्रथम सोपान भव्य कलेवर, सुन्दर छपाई और आकर्षक चित्रों के साथ सामने आया है। इस प्रथम सोपान का प्रारम्भ कवि ने परब्रह्म कृष्ण की वंदना से किया है-

नमो देवाधिदेवाय परमात्मस्वरूपिणे

साक्षिणे जीव रूपाय निराकाराय ते नमरू।।

तदन्तर देवी सरस्वती की वन्दना-

नमो देवी सरस्वती श्वेतवस्त्र सुशोभिताम

रत्न सारेन्द्र भूषणां, प्रभा मंडित विग्रहाम।।

संस्कृत में करने के उपरान्त यदुनाथ एवं विविध देवी-देवताओं की वदना करते हुए ग्रन्थ को विस्तार दिया गया है-

व्यास देव पद कमल नमामी। बसहु आइ उस अन्तर्यामी।।

वेद पुरान बहुरि सिर नाई। कहहुँ कथा पुनि धरि चित लाई।।

श्री सौति शौनक संवाद, वैष्णव महिमा, कंस वसुदेव संवाद, भगवान का जन्म, जन्मोत्सव, विविध दैत्यों का उद्धार, यमलार्जुन उद्धार आदि लीलाओं के साथ श्री राधा कृष्ण विवाह, वृन्दावन गमन, वत्सासुर-बकासुर, अधासुर, उद्धार, कालीय दमन आदि प्रसंगों के उपरान्त वेपु-गीत, चीर हरण, गोवर्धन पूजा और श्री कृष्ण यश वर्णन किया गया है। महाकाव्य के प्रायः सभी लक्षण सर्गबद्धता, छन्द वैविध्य, मनोरम प्रकृति चित्रण, प्रसंग विस्तार आदि इस कृति में सहज ही देखे जा सकते हैं। प्रकृति चित्रण में वर्षा और शरद ऋतु का चित्रण कृष्ण लीलाओं के आलोक में अत्यधिक अनुपम बन गया है-

गरजि घुमरि घन बरसहिं काले। टूटहि बाँध मेड़ सर नाले।।

ऋतु बरखा वृन्दावन सोहे।

जामुन फल देखत मन मोहे।।

पाकि खजूर गुच्छ लगि नीके। गूलर परे धरनि रस फीके।।

कीन्ह प्रवेश बनहिं घनश्यामा।

संग ग्वाल सुर भी बलरामा।

आयी शरद सुखी सब प्रानी।

काम विवस वसुधा अकुलानी।।

नहि कोउ सरवर कमल विहीना। नहि कोउ कमल जो हास मलीना।।

कुंद सुरभि माधवि लता,

करहिं अलिंद निनाद।

झुंड झुंड फूले पुहुप,

गूँजहि खगकुल नाद।।

श्री कृष्णचरितामृत (प्रथम सोपान- बालपर्व) /लेखक: महेश कुमार वर्मा ‘अशान्त’ / प्रकाशक: कला कुंज, विवेक विहार, नगारी गाँव, भवाली 263132/सहयोग राशि: 800 रु.

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