शिक्षा के नाम पर बेशर्म लूट !

Featured


दिनेश कर्नाटक
हर वर्ष अप्रैल के महीने में बच्चे नई कक्षा या नये स्कूल में जाते हैं। बच्चों को जहाँ इस नवीनता की खुशी होती है, वहीं उनके माँ-बाप के लिए यह महीना उनकी फीस, किताबें आदि जुटाने के लिए होने वाले खर्चे के कारण परेशानी का सबब बन जाता है। प्राइवेट शिक्षा अब देश के हर हिस्से में मजबूती से जड़ जमा चुकी है। लोगों की स्थिति बड़ी अजीब है। उन्हें इन्हीं स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना भी है और इन्हीं से लुटना भी है। राज्य सरकारों के सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय तथा अभिनव स्कूलों के साथ इस तरह की कोई समस्या नहीं है। लेकिन ठीक-ठाक हैसियत के अभिभावक वहाँ अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते। कुछ प्राइवेट स्कूलों के साथ भी इस तरह की समस्या नहीं है, लेकिन अधिकांश प्राइवेट स्कूल हर वर्ष अप्रैल के महीने में अभिभावकों को फीस, किताबों, ट्रांसपोर्ट तथा स्कूल ड्रेस के नाम पर जोरदार झटका देते हैं। पहले स्कूल के स्तर, प्रतिष्ठा के नाम पर लोग इसे चुपचाप स्वीकार कर लेते थे, मगर अब लोगों को समझ में आ चुका है कि इसमें लूट का इरादा भी बड़े पैमाने पर जुड़ चुका है।
पिछले तीन वर्ष से सी.बी.एस.ई., मानव संसाधन मंत्रालय तथा राज्य सरकारों के हवाले से कहा जा रहा था कि फीस को नियंत्रित कर दिया जायेगा। कुछ राज्य सरकारों ने इस संबंध में कानून भी बना दिये थे। सबसे अधिक उम्मीद इस वर्ष अभिभावकों को किताबों पर होने वाले अनाप-शनाप खर्च को लेकर थी। अखबारों में खबरें आ रही थीं कि सभी प्राइवेट स्कूल अब एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ायेंगे। यह कि एनसीईआरटी द्वारा स्कूलों से किताबों की संख्या ले ली गई है। अगर कक्षा 8 तक एनसीईआरटी की किताबें लग जातीं तो किताबों की संख्या 15-20 से घट कर 7-8 तक रह जाती। इसी प्रकार किताबों पर होने वाला खर्च 4-5 हजार से 700-800 तक सिमट कर रह जाता। सबसे बड़ी बात यह होती कि बच्चों के बस्ते का बोझ कम हो जाता। लेकिन वही नहीं हुआ। प्राइवेट स्कूलों ने हर बार की तरह इस बार भी अपनी मनमानी की और सरकारी मशीनरी भी हर बार की तरह धृतराष्ट्र बन गयी। एक बार फिर अभिभावकों को छले जाने का एहसास हुआ। प्राइवेट स्कूलों का इस तरह बेलगाम होना सरकारों की भारी विफलता को दिखाता है। केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा प्राइवेट स्कूलों की लूट से आँख मूँद लेना भी इसका प्रमुख कारण है।
शिक्षा और अस्पताल इस समय कमाई के सबसे अच्छे धंधे बने हुए हैं, जबकि एक लोकतांत्रिक देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापार की इजाजत नहीं होनी चाहिए। सरकारी अस्पताल और स्कूल की उपेक्षा इस क्षेत्र में व्याप्त अराजकता का प्रमुख कारण है। सरकारों ने पिछले 70 वर्षों में प्राइवेट तथा सरकारी की खाई पाटने के बजाय इसे और अधिक बढ़ाने का ही कार्य किया है। सबसे बड़ा मजाक तो यह है कि हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में फीस रेगुलेशन कानून मौजूद है, लेकिन फीस के नाम पर हो रही लूट में यहाँ कोई फर्क नहीं पड़ा है।
इस बार जनवरी के महीने से ही देश भर के अभिभावक संघों, अखबारों ने प्राइवेट स्कूलों की इस लूट के बारे में बात करना आरंभ कर दिया था। मार्च-अप्रैल के महीने में तो अखबारों ने लगातार इस पर लिखा। लेकिन राष्ट्रीय समाचार चैनल शर्मनाक तरीके से इस मुद्दे पर चुप रहे। वे गाय, बूचड़खानों, योगी तथा मोदी के इर्द-गिर्द सिमटे रहे। इधर अप्रैल के महीने में ‘एनडीटीवी’ के ‘प्राइम टाईम’ में रवीश कुमार ने लगातार छह दिनों तक प्राइवेट स्कूलों पर जन सुनवाई कार्यक्रम चलाकर राष्ट्रीय स्तर पर प्राइवेट स्कूलों की लूट को उजागर किया। इस कार्यक्रम के जरिये पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि देश के हर कोने में प्राइवेट स्कूलों का चरित्र एक जैसा है। राज्य सरकारें सब जगह मौन हैं। जैसा कि पहले भी कहा गया कि कुछ राज्यों नेे अच्छे कानून बनाये हैं, मगर उन कानूनों का कोई असर नहीं है। कोई निगरानी तंत्र नहीं है, जो कानून को लागू करवाये। स्कूलों के मन में जो आ रहा है, वे कर रहे हैं।
मौजूदा समाचार चैनलों में रवीश कुमार अकेले पत्रकार के रूप में नजर आते हैं, जो जनता के मुद्दों पर न सिर्फ बात करते हैं, बल्कि गहराई से उनका विश्लेषण भी करते हैं। छह दिन तक चले अपने अभूतपूर्व प्राईम टाईम में उन्होंने सीबीएसई के निगरानी तंत्र, जूतों, कॉशन मनी, स्कूल बस, किताबों तथा फीस वृद्धि के मसलों पर बात की। विभिन्न अभिभावक संघों की शिकायतों से पता चला कि स्कूल हर वर्ष 15 से 80 फीसदी तक की फीस वृद्धि कर देते हैं, जबकि सीबीएसई के नियमों के तहत विद्यालय प्रबंधन तथा अभिभावकों को साथ बैठकर फीस वृद्धि तय करनी होती है। इस कार्यक्रम में लूट के एक से बढ़ कर एक उदाहरण सामने आये। जैसे कि कुछ स्कूलों ने अभिभावकों के पीटीए की बैठक में उपस्थित न होने पर एक हजार का जुर्माना लगाया। बच्चों को मैगी दी गयी, लेकिन भोजन के नाम पर प्रतिदिन सौ रुपये लिये गये। पचास रूपये की डायरी को 350 रुपये में दिया गया। कई स्कूल कॉशन मनी के नाम पर पैसा लेते हैं। अभिभावकों को तबादले आदि कारणों से स्कूल छुड़वाना पड़ता है तो ये स्कूल कई बहाने बनाकर बड़ी रकम काट लेते हैं। बिहार के एक स्कूल ने कॉशन मनी के नाम पर 44,000 रुपये जमा करवाये, लेकिन वापस सिर्फ 6,000 रुपये ही किये। कुछ स्कूल पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर प्रतिमाह 1,000 रुपये तक ले लेते हैं। लूट में एक मद और बड़ी भूमिका निभा रही है, वह है ई-सर्विस यानी एसएमएस आदि से अभिभावकों को सूचना देने की सुविधा। इसके नाम पर सालाना छह-सात सौ रुपये वसूल लिये जा रहे हैं। कुछ स्कूल बच्चांे के ऊपर इंजीनियरिंग तथा मेडिकल की तैयारी का दबाव डाल कर उनसे करीब 3000 रुपये प्रतिमाह ले लेते हैं। इसी प्रकार जूता कंपनियों से साँठ-गाँठ करके 500-600 के जूते के बजाय ब्रांडेड कंपनियों के 2,000-2,500 रुपये के जूते खरीदने
को मजबूर किया जाता है।
ऐसा नहीं है कि सम्पन्न जगहों में ही प्राइवेट स्कूल महंगे हैं। यूपी, बिहार तथा मध्य प्रदेश के गरीब इलाकों के प्राइवेट स्कूल भी 8,000 रुपया महीना तक की फीस ले रहे हैं। इधर हल्द्वानी के कुछ अभिभावकों ने बताया कि स्कूल ने बच्चों के नई कक्षा में आने पर रख-रखाव के नाम पर प्रति बच्चे के हिसाब से 5,000 रुपये वसूले। यही नहीं, अपने ही स्कूल के बच्चे के अगली कक्षा में जाने पर रिएडमिशन के नाम पर स्कूल उससे 1,000-2,000 रुपये झटक ले रहे हैं। स्कूल बस के नाम पर भी अभिभावकों की खूब लूट होती है। कई स्कूल 100 मीटर की दूरी के लिए 1,500 रुपये बस फीस वसूलते हैं। अब अगर इसके बाद बच्चों को सीट पर आराम से बैठने की सुविधा हो तो कोई बात नहीं, लेकिन स्कूल बसें हमेशा क्षमता से ज्यादा बच्चों को बैठाती हैं। कई बार दुर्घटनायें भी हो चुकी हैं, लेकिन स्कूलों को कोई फर्क नहीं पड़ता।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 साफ-साफ कहती है कि बच्चों के स्कूल बैग का बोझ कम होना चाहिए। इसके लिए एनसीईआरटी ने कक्षा 12 तक की हर विषय की किताबों की संख्या एक में सीमित कर दी है। हालाँकि विषय की बृहदता के कारण कक्षा 9 व 10 में सामाजिक विज्ञान की 3 किताबें हैं, लेकिन न तो वे प्राइवेट प्रकाशकों की तरह भारी-भरकम हैं और न उतनी महंगी। बच्चों पर किताबों का शारीरिक और मानसिक बोझ कम हो, इसलिये यह किया गया। लेकिन प्राइवेट स्कूलों को यह बुनियादी बात समझ में नहीं आती। उन्हें तो अपनी कमाई से मतलब है। वे सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए काफी महंगी तथा भारी-भरकम किताबों की लिस्ट अभिभावकों को थमा देते हैं। यदि एनसीईआरटी की किताबें ही बच्चों को उपलब्ध करवा दी जायें तो बच्चे की पीठ का बोझ कम होगा तथा अभिभावकोे को 4 से 5 हजार रुपये की राहत होगी। अभिभावकों से इतने बड़े पैमाने पर पैसा वसूलने वाले ये स्कूल शिक्षकों का जमकर शोषण करते हैं। उन्हें सम्मानजनक वेतन नहीं दिया जाता। उनको 20,000 या 25,000 का चेक थमाकर 5,000 या 6,000 रुपये दे दिये जाते हैं और शेष वापस ले लिये जाते हैं। कहीं हस्ताक्षर किसी और रकम में कराये जाते हैं और दिया कुछ और जाता है।
अगर देश भर के प्राइवेट स्कूलों द्वारा अभिभावकों से ली गई फीस के औचित्य की जाँच की जाये तो यह देश का सबसे बड़ा घोटाला या संगठित लूट होगी। अफसोस इस बात का है कि सारी राजनीतिक पार्टियाँ इस मामले पर चुप हैं। नेता सामने नहीं आते। अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जायेगी। इससे पहले कि हालात बदतर हों तथा लोगों का आक्रोश सड़कों पर आये, समाधान ढूँढ लिया जाना चाहिये। ‘अच्छे दिनों’ का वादा करके सत्ता में आई मोदी सरकार ने इस दिशा में अभी तक कुछ नहीं किया है। स्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य लोगों को मुनासिब दाम पर उपलब्ध हो जायें तो इससे अच्छे दिन और क्या हो सकते हैं ? सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि स्कूल और अस्पताल बिजनेस नहीं, समाज सेवा के कार्य हैं। सरकार को सबसे पहले प्राइवेट तथा सरकारी स्कूल की खाई को पाटना होगा। प्राइवेट किताबों को बंद कर एनसीईआरटी अथवा राज्य सरकारों की किताबों को लागू करना होगा। फीस तय करनी होगी। इन सब बातों को लागू करने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र का निर्माण करना होगा। इसके लिए सरकारी ही नहीं समाज के जागरूक लोगों की भी सेवाएँ ली जा सकती हैं या उन्हें उसका हिस्सा बनाया जा सकता है। अगर दिल्ली के सार्वजनिक यातायात के क्षेत्र में मेट्रो जैसी स्तरीय सुविधा वाजिब दाम पर उपलब्ध करवाई जा सकती है तो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?

Leave a Reply