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    Rajesh Joshi June 4, 2012 at 10:45 AM |

    शेरदा का जाना कुमाऊंनी भाषा एवं साहित्य के लिए एक बड़ी क्षति है, कुमाऊंनी भाषा को वर्तमान में साहित्यिक पहचान देने का जो काम शेरदा मे किया उसकी कोई मिसाल नही है। उत्तराखण्ड में कोई भी कवि सम्मेलन हो शेरदा की कविताओं के बिना अधूरा ही रहता है। चाहे हिन्दी या गढ़वाली भाषा का ही कवि सम्मेलन हो शेरदा किसी भी कवि सम्मेलन में मास पुलर की भूमिका में रहते हैं। मैने जिस भी कवि सम्मेलन में शेरदा को सुना वो हमेशा अन्त में मास पुलर के तौर आते थे। मुझे तो लगता है कि कुमाऊंनी कविता ही नही उत्तराखण्ड के किसी भी कवि सम्मेलन ’मास अपील’ लाने वाला कोई नही रहा। गोपाल बाबू गोस्वामी के बाद कुमाऊंनी भाषा की एक और ग्योबल पर्सनैल्टी शेरदा का जाना सचमुच दुखद है।

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    RiskyPathak June 4, 2012 at 7:39 PM |

    शेरदा को नमन||

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    virendra June 12, 2012 at 5:28 PM |

    thanks

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