पाठशाला या पाकशाला ?

mid-day-mealसरस्वती के मंदिर (स्कूल) शहरों में अंग्रेजी भाषा की बदौलत भले ही चल रहे हों, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के प्राथमिक विद्यालयों की हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है। शिक्षा व्यवस्था दोपहर भोजन येाजना लागू होने के बाद और बदतर हुई है। अब गुरु जी की प्राथमिकता पढ़ाने के बजाय दोपहर में बच्चों को खाना खिलाने की हो गई है। उन्हें नए-नए नामों से पुकारा जाने लगा है- भात वाले मास्साब, भात वाली बैहन्जी। सरकार पढ़ाने में कंजूसी को भले ही बर्दाश्त कर जाये, भात समय पर न खिलाने वाले अध्यापकों को दंड देने में कोताही नहीं बरतती। इस योजना से स्कूलों में पढ़ाई तो प्रभावित हो ही रही है, मगर छात्र संख्या बढ़ने की दिशा में कोई सार्थक परिणाम निकलते नहीं दिखाई दिए हैं। गरीब अभिभावक अवश्य इस लालच में बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि उन्हें एक वक्त का भोजन तो नसीब हो जाये। वे बच्चों को इस उद्देश्य से स्कूल नहीं भेजते कि बच्चे अच्छी शिक्षा पा सकें।

उनकी मजबूरी भी है कि वे अपने बच्चों को उन प्राथमिक स्कूलों में डालें जहाँ पर दोपहर को भात परोसा जाता है। मगर इन प्राथमिक विद्यालयों में तैनात शिक्षक अपने विद्यालयों में पढ़ाई के स्तर से भली भाँति परिचित हैं और वे स्वयं अपने बच्चों को शहरों में खुले अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं। दोपहर भोजन योजना की जिम्मेदारी से लदे अध्यापक अगर पढ़ाना भी चाहें तो सरकार ने स्कूलों में बनने वाले भवनों के लिए ईट, गारा, सीमेंट, लोहे का इंतजाम करने की बेमतलब जिम्मेदारी उनके सिर पर डाल दी है। हमारी पाठशालायें पाकशालायें बन कर रह गई हैं।

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