संपादकीय : ‘राईट टू रिजेक्ट’ उत्साहजनक समाचार है

Right to rejectसर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान में ‘राइट टु रिजेक्ट’ के लिये व्यवस्था किये जाने का आदेश भारतीय लोकतंत्र के लिये एक उत्साहवर्द्धक समाचार है। कई सालों से यह माँग की जा रही थी कि कोई भी योग्य प्रत्याशी न होने की स्थिति में मतदाता सारे प्रत्याशियों को नकार सके। अन्ततः पीयूसीएल की याचिका पर न्यायालय ने यह निर्णय सुना ही दिया। मगर यह एक अधूरा फैसला है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि इसका असर चुनाव पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जो ‘नकार’ वाले वोट होंगे, उन्हें छोड़ कर बाकी मतों में से विजयी उम्मीदवार का चयन कर लिया जायेगा। इससे उम्मीदवारों की सेहत पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने जा रहा है। फर्क तभी पड़ता, जब नकारात्मक मतों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक होने अथवा सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी से अधिक होने पर चुनाव रद्द हो जाने की व्यवस्था होती और चुनाव में शामिल सभी प्रत्याशियों को अगले पाँच साल तक चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित कर दिया जाता। इससे धीरे-धीरे गलत लोगों की छँटनी होती चलती और साफ-सुथरे लोगों के लिये सम्भावनाओं के दरवाजे खुलते। मतदान अनिवार्य करना और मतदान न करने पर दंड का प्रावधान करना भी इस अभियान की सफलता के लिये जरूरी है। क्योंकि यह देखा जाता है कि राजनीति पर बहुत ज्यादा बहसें करने वाले और भारतीय लोकतंत्र की दुर्गत का दोष अनपढ़ों पर मढ़ने वाले तथाकथित प्रबुद्ध लोग ही मतदान करने में सबसे ज्यादा कोताही करते हंै। भारत में चुनावी लोकतंत्र यदि जिन्दा है तो केवल तथाकथित जाहिल, अनपढ़, गरीब और ग्रामीण लोगों के कारण। बहरहाल जो राजनैतिक दल अपने आपको ‘सूचना का अधिकार कानून’ और अपने दागी जन प्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म होने से बचाने के लिये जमीन-आसमान एक किये दे रहे हैं, उन्हें अदालत के इस ताजा फैसले से एक और बड़ा झटका लगेगा। और विचार तो धीरे-धीरे ही परिपक्व होते हैं। इस फैसले के भी दूरगामी परिणाम होंगे।

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