बिपिन दा को याद करने के बहाने

Bipin Tripathi

उत्तराखण्ड की जनता ने पृथक राज्य गठन आंदोलन में अपनी भूमिका बखूबी अदा की थी। राज्य गठन के पश्चात् राजनैतिक फर्ज निभाने की बारी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाले उत्तराखंड क्रान्ति दल की थी। मगर इतने जीवन बलिदान होने और मुजफ्फनगर जैसे घृणित काण्ड का जहर पीने के बाद बने उत्तराखण्ड में हमें हासिल क्या हुआ ? पिछले 12 वर्षों में हमने सिर्फ अपने सपनों को टूटते देखा है।

बीते बारह सालों में इस राज्य की सत्ता पर काबिज रहे राजनैतिक नेतृत्व ने अलग राज्य की अवधारणा को मटियामेट कर दिया। मगर इन राजनैतिक दलों का असल उद्देश्य तो येन केन प्रकारेण राज्य की सत्ता हथियाना था। मगर राज्य आंदोलनकारी नेताओं का आभामंडल भी इन बीते सालों में अलोप हुआ है। सामने आयी है कुर्सी की ओर लपकते उक्रांद के नेताओं की बेसब्री, एक समय के अग्रणी आंदोलनकारियों के झूठे अहम की लड़ाई या फिर सत्ता की मलाई चाटने को कांग्रेस-भाजपा की गोद में जाकर बैठ गए तथाकथित सर्टिफिकेटधारी आंदोलनकारियों की लोलुपता। इन सारे भटकावों ने संड-मुसंड टाईप नेताओं के चरने के लिए राज्य का हर मैदान खुला छोड़ दिया। उन्होने बेशर्मी से भरपेट चरा और अपने चहेते नौकरशाहों-चमचों को भी खिलाया। इसी से तो अब आवाज आने लगी है कि काश न बना होता यह राज्य, इससे बेहतर तो हम उत्तर प्रदेश में थे !

कांग्रेस-भाजपा ने अपने चरित्र के अनुरूप अपने काम को बखूबी अंजाम दिया, लेकिन जिस तरह से उक्रांद ने हर गलत काम में उनका साथ दिया उससे जनता की अपेक्षाओं पर तुषारापात हुआ। उक्रांद प्रवक्ताओं का यह तर्क कि वर्तमान समय गठबंधन की राजनीति का है, किसी भी समझदार के गले नहीं उतर सकता। उनकी बात में यदि यकीन कर भी लिया जाये तो क्या राज्य की जनता यह समझ ले कि उक्रांद का चरित्र भी केन्द्र में गठबंधन की राजनीति करने वाले सपा, बसपा जदयू जैसा ही है ? इस सोच के कारण तो भविष्य में उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अपनी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी। इस अपयश का कौन भागी होगा ?

अपनी सारी उम्र आन्दोलनकारी रहे और उत्तराखंड क्रांति दल में शामिल होने के बाद उसके सबसे प्रखर प्रवक्ता और ’थिंक टैंक’ बन गये बिपिन त्रिपाठी की 9वीं पुण्यतिथि के बहाने 30 अगस्त को जब द्वाराहाट में उत्तराखंड के सरोकारों से वास्ता रखने वालों ने राज्य आंदोलन की बिखरी ताकतों को एक मंच पर जुटाया तो स्वाभाविक था कि यही प्रश्न उठते। वे उठे भी। जो लोग उन प्रश्नों से बेचैन हो गए उन्हें क्षण भर ठहर कर सोचना चाहिए कि हकीकतों से दो-चार हुए बिना ऐसे किसी आयोजन से चाय-पानी पीकर घर लौट जाने का क्या मतलब ? काफी समय से यही हो रहा है, कोरी भाषणबाजी होती है, जनसंघर्षों में अपनी भागीदारी का बखान होता है और सरकारों की रस्मी आलोचना कर इतिश्री कर ली जाती है। जो लोग भूतपूर्व का बिल्ला लगा कर अपना और दूसरों का समय बर्बाद करते हैं, वो खरी-खरी न तो कहेंगे न सुनेंगे और न ही ये बता पाएंगे कि भविष्य में वे क्या करना चाहते हैं। जनता के कुछ सवाल हों तो कार्यक्रम के आयोजकों भागीदारों सर्वश्री चारु तिवारी, राजा बहुगुणा, पीसी तिवारी, पुष्पेश त्रिपाठी, भगोतराम ज्यू, शमशेर बिष्ट, काशी सिंह ऐरी, एनएस जंतवाल, प्रकाश पाण्डे, भुवन पाठक, प्रेम सुंदरियाल, हरीश पाठक, हरीश बुधानी, दयाल पाण्डे ही नहीं, इस लेख के लेखकों से भी पूछे जा सकते हैं। अन्ततः जनता के बलिदान से प्राप्त यह राज्य इस तरह बर्बाद हो रहा है तो इसकी जिम्मेदारी भी सामूहिक ही होनी चाहिये।

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