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    आदरणीय महोदय
    यह कोई नई बात नहीं है साथ ही साथ यह स्वाभाविक भी है आजादी के पहले से भी हम इसके उदाहरण देख सकते हैं जब गोविन्दबल्लभ पंत हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे नेताओं ने पहाड से दूर मैदानी इलाको में आकर अपना राजनैतिक भविष्य संवारा था।
    मूल समस्या पहाड के गांव में बुनियादी सुविधायें और ऐसे संसाधन सुदूरवर्ती पहाडी घरों तक पहुंचाने की है जो उन्हें अपने गांव में रूककर वही से देश प्रदेश और समाज का विकास कर सकने की बाध्यता दे सके और मैदानी अथवा अधिक सुविधाजनक स्थानों की ओर पलायन को रोकने को प्रेरित कर सके।

    मेरे विचार से इसके बारे में नीति नियंता सोचते तो हैं परन्तु व्यवहारिक धरातल पर आते आते आते उनके प्रयास क्यों फलीभूत नहीं हो पाते है इसके बारे में विचार करने की आवश्यकता है।

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