पंचों का कहना सिर माथे, पर नाला यहीं गिरेगा !

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विशेष प्रतिनिधि
डांग (उत्तरकाशी) के ग्रामीण एक बार फिर संघर्ष की राह पर हैं। मगर इस बार यह संघर्ष जबरन उन पर थोपा जा रहा है। वर्षों पूर्व तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार ने जब डांग के जंगल में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एन.आई.एम.) बनाने का निर्णय लिया था, तो ग्रामीणों ने इसका विरोध किया। राजधानी लखनऊ तक कई-कई बार दौड़-भाग करके और पूरे क्षेत्र में जन आंदोलन चलाकर, पेड़ों पर रक्षा सूत्र बाँध कर और पेड़ों से चिपक कर उन्होंने अपने जंगल को कटने से बचाया था। जब सरकार ने जंगल काट कर राजकीय पॉलीटेक्निक बनाना चाहा या आई.टी.बी.पी. और एस.एस.बी. की छावनी बनानी चाही, तो भी ग्रामीणों ने हरे-भरे सदाबहार जंगल को काटने का विरोध किया। हर बार उ.प्र. सरकार को जनशक्ति के सामने झुकना पड़ा और एन.आई.एम., पॉलीटेक्निक तथा आई.टी बी.पी. आदि को दूसरी जगह बसाना पड़ा। ग्रामीणों ने पूरे क्षेत्र में बांज, बुरांश, भीमल, खड़ीक, कचनार, अंयार, काफल, डैकन, तून, पैंया आदि-आदि कई प्रजातियों के वृक्षों का रोपण किया। पेड़ों को अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा। पेड़ों को लगाने और बचाने का यह क्रम आज भी जारी है।
ऐसा भी नहीं कि डांग के लोग ‘विकास विरोधी’ हैं। उन्होंने सिंचाई विभाग की रोड, मनेरी-भाली जल विद्युत परियोजना (द्वितीय चरण), विकास भवन परिसर और इसकी कॉलोनी, ट्रांजिट कॉलोनी, अनुसंधान कॉलोनी, विभिन्न स्कूलों व आश्रमों, एन.आई.एम. की सड़क, जल संस्थान, विद्युत विभाग और दूरसंचार विभाग के लिए अपनी जमीनें और खेत खुशी-खुशी सरकार को दिये। लेकिन अपना हरा-भरा सदाबहार जंगल देने के लिए वे कभी भी राजी नहीं हुए।
इस बार लड़ाई एक सड़क को लेकर शुरू हुई है। ग्राम पंचायत डांग के दोनों गाँवों, डांग और पोखरी के लिए सड़क बनाने के लिए अपने वे एक बार फिर अपने खेत व जमीनंे देने के लिए तैयार हैं। मगर कतिपय वन माफियाओं, भू-माफियाओं, लकड़ी तस्करों, दलालों और अवैध शिकारियों के दबाव में सरकार पूर्व में स्वीकृत सड़क के स्थान पर इसे एन.आई.एम. से पोखरी तक बनाना चाहती है। यह सड़क बनाने के लिये अनावश्यक रूप से 1,100 हरे-भरे पेड़ कट रहे हैं और यह ग्रामीण नहीं चाहते। वे इस सड़क का विरोध कर रहे हैं और जीप सड़क, जो पहले ही मोटर सड़क के लिये स्वीकृत थी, को ही बनवाना चाहते हैं।
अपने संघर्ष को रचनात्मक स्वरूप देने के लिये ग्राम पंचायत डांग ने 11 दिसम्बर 2016 को एक प्रस्ताव पारित कर तीन दशक पूर्व बनी जीप रोड का अपने संसाधनों से चैड़ीकरण करने का निर्णय लिया। अगले ही दिन से इस पर श्रमदान से काम भी शुरू हो गया। न सिर्फ पुरुष, बल्कि महिलायें और बच्चे भी सब्बल, गैंती, बेलचे और घन लेकर सड़क चैड़ी करने में जुट गये। अपना काम आसान करने के लिये आपस में चन्दा कर वे एक जे.सी.बी. मशीन भी ले आये। मगर प्रशासन माफियाओं के भारी दबाव में है। अतः 17 दिसम्बर को भटवाड़ी के एस.डी.एम. भारी पुलिस के साथ घटनास्थल पर पहुँचे और उन्होंने जे.सी.बी. को जब्त कर लिया। ग्रामीण अब डरे हुए हैं कि उन्हें भी किसी भी समय झूठे मुकदमे लगा कर गिरफ्तार किया जा सकता है। हालाँकि उन्होंने श्रमदान करना अभी बन्द नहीं किया है।
अजीब विडम्बना है। ग्रामीण एकजुट हैं, पंचायत में सर्वसम्मति है। ग्रामीण सड़क चाहते हैं, मगर जंगल का विनाश कर के नहीं। सरकार को उन्होंने एक वैकल्पिक रास्ता सुझााया है, जिसके लिये सरकार मदद न भी करे तो वे अपने स्वयं के संसाधनों से वे यह सड़क बनाने को तैयार हैं। यह ईको संेसिटिव जोन भी है। समस्त पर्यावरणीय व अन्य कानून ग्रामीणों के पक्ष में हैं, लेकिन कुछ माफियाओं के हित के लिये सरकार ही 1,100 पेड़ों को काटने पर तुली हुई है। वह अपने ही बनाये कानूनों को ध्वस्त करने में लगी है और जनता के दमन के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार है। इसी के लिये एक कहावत है, ‘‘पंचों का कहना सिरमाथे, पर नाला यहीं गिरेगा।’’

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