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    sht November 10, 2009 at 5:59 PM |

    पहाड़ भले ही रचनात्मकता के सम्बन्ध मे कितने ही दावे करता हो ..परन्तु यह एक सत्य है की इनकी कोशिश अपने कुनबे के कुछ सदस्यों को ही लाभ पहुचने की कोशिश करते हैं चाहे वह अपनी लफ्फाजियों से सरकारी ग्रांट हड़पना हो या NGOs को मदद करना हो या फिर अपने कुनबे के लोगों को तथाकथित बुद्दिजीवी बताकर प्रचारित करना हो , तमाम नेताओं, नौकरशाहों, पूंजीपतियों को पानी पी पी कर कोसने वाले पहाड़ के सदस्य अपने कार्यक्रमों मे तमाम ऐसे ही लोगों को अतिथि बनाकर बुलाते है ताकि उनकी कृपा पहाड़ पर बनी रहे ! पहाड़ के तमाम संस्करण बाहरी दुनिया के लिए रोचक हो सकते है पर उसमे ऐसा कुछ भी नहीं है जो आम उत्तराखंडी की रूचि हो पहाड़ के तमाम संस्करण मे अधितकर सिर्फ यात्राओं के संस्मरण है जिमसे यात्राओं और उनकी कठिनाईयों को बड़ा चडाकर प्रस्तुत किया गया है! साहित्यिक पक्ष भी इनका बहुत कमजोर है ! अधिकतर कई आयोजनों मे मैंने सिर्फ ये देखा है की कुछ ग्लेशियर और नंदा देवी की तस्वीरों को अलग अलग एंगल से दिखाना और ऐसी लफ्फाजी करना की जैसे ये लोग नंदा देवी को फतह कर आये हो.. ऐसे तमाम उदाहरन है जहाँ पहाड़ के आयोजनों की फूहड़ता प्रर्दशित होती है ! और पहाड़ के कई प्रकाशनों मे तो ऐतिहासिक तथ्यों को भी नजरंदाज किया गया है मसलन उत्तराखंड के कई जनान्दोलनों के सम्बन्ध मे और ये दिखने की कोशिश की है की पहाड़ और उससे सम्बंधित सदस्यों और संगठनो ने ही ये आन्दोलन चलाये और उनकी नेत्रत्व दिया !

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