हवा में रहते हैं हमारे मंत्रिगण

Helicopterउत्तराखंड सरकार द्वारा मुख्यमंत्री तथा मंत्रिय¨ं क¢ द©र¨ं क¢ लिए खरीदे गये (एक या दो ?) हेलीकाॅप्टर पहाड़¨ं के लिए कतई अनुपय¨गी सिद्ध ह¨ रहे हंै। चम¨ली जनपद में मुख्यमंत्री का आपदा तथा क्षति का आँकलन करने के लिये किया जाने वाला दौरा पाँच बार स्थगित करना पड़ा, क्य¨ंकि म©सम उनक¢ हेलीकाॅप्टर की उड़ान क¢ लिए अनुकूल नहीं था। वे लगभग एक माह बाद आ पाए। मगर हमारे प्रदेश में अब मुख्यमंत्री ने ही नहीं, अनेक मंत्रिय¨ं ने भी सड़क¨ं से यात्रा करनी छ¨ड़ दी है।
राज्य में 400 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हंै। मुख्यमंत्री यदि सड़क से आते त¨ उन्हें देहरादून-बदरीनाथ राजमार्ग की हालत तथा उसक¢ किनारे की बस्तियों के आपदा प्रभावित¨ं क¨ देखने-सुनने तथा राहत वितरण की वास्तविकता समझने का बेहतर अवसर मिलता। यह 300 किल¨मीटर राजमार्ग इस राज्य क¨ जीवित रखने की प्राणवाहिनी है। यह बाधित ह¨ जाय त¨ राज्य का एक बड़ा भाग निष्प्राण ह¨ने लगेगा। राजधानी देहरादून में पता भी नहीं लगेगा कि राज्य के इस बडे़ भाग की क्या हालत है, यदि यह राजमार्ग बंद ह¨ जाए। पहले से कहा जा रहा था कि उत्तराखंड की राजधानी एक टापू बन गई है। वैसे भी राजधानियाँ कम संवेदनशील ह¨ती हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजधानी एक क¨ने में ह¨ने क¢ कारण राज्य क¢ अधिकांश ल¨ग¨ं की वहाँ पहुँच कठिन है।
चारधाम में फँसे 5,000 से अधिक यात्रिय¨ं क¨ सकुशल निकालने में विभिन्न संस्थान¨ं तथा जगह¨ं से बुलाए गए, वायु तथा थल सेना के अ©र कई निजी कंपनिय¨ं के हेलीकाॅप्टर¨ं की बहुत बड़ी भूमिका रही। उनक¢ बिना इतने सारे यात्रिय¨ं क¨ शीघ्र निकालकर उनकी प्राणरक्षा करना संभव नहीं ह¨ता। अभी भी वे दूरस्थ जगह¨ं पर अन्न पहँुचाने में लगे हैं। लेकिन उनक¢ उतरने क¢ लिए बहुत कम, 15 या 20 स्थान बने हैं, ज¨ 53,483 वर्ग किल¨मीटर क्षेत्र क¢ लिए पर्याप्त नहीं हैं।
भूगर्भवेत्ताअ¨ं का कहना है कि उत्तराखंड में सड़क-निर्माण तथा जल-विद्युत य¨जनाअ¨ं की सुरंगें बनाने क¢ लिए विस्फ¨टक¨ं के अंधाधंुध प्रयोग से सारे पहाड़ हिल गए हैं और नित नई आपदाओं को जन्म दे रहे हैं। मगर देहरादून में विदेशी-धन से मालामाल हुई एक गैर सरकारी संस्था ‘रूलेक’ के संचालक अवधेश क©शल ने अखबार¨ं में दावा किया है कि जलविद्युत य¨जनाअ¨ं की सुरंगें विस्फ¨टक¨ं द्वारा नहीं, बल्कि मशीन¨ं द्वारा पहाड़¨ं क¨ ख¨द कर बनाई गई हैं। वर्ष भर पहले ये महाशय पहाड़़¨ं में जलविद्युत परिय¨जनाएं बनाने क¢ पक्ष में धुआँधार प्रचार कर रहे थे और अपनी पùश्री की उपाधि त्यागने की धमकी दे रहे थे। अब जब सुप्रीम कोर्ट तक इन परियोजनाओं को बन्द करने की बात कर रहा है, ये नया झूठ बोलने में लग गये हैं।

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