3 Responses

Page 1 of 1
  1. avatar
    Sandeep Bhatt December 12, 2009 at 12:22 PM |

    स्थापना के बाद से ही उत्तराखंड राज्य लूटखसोट का एक उत्तम अड्‌डा बना हुआ है। गैरसरकारी संगठनों की तो मौज है। छुटभैया और बड़े नेताओं तमाम संस्थाएं खोली हुई हैं और नेताओं के दखल और हैसियत के हिसाब से उनको सरकारी परियोजनाएं मिलती हैं। एक दशक हो गया है राज्य बने हुए लेकिन यहां के गांव आज तक विकास की बाट जोह रहे हैं। एक गांव में हाल ही में जाना हुआ। गांव तहसील मुखयालय से तकरीबन ४० किलोमीटर होगा। उस गांव में सर्दियों के इस मौसम में सार्वजनिक पीने के पानी की यह व्यवस्था है कि प्रति परिवार बमुकश्किल दो या तीन बाल्टियां भर कर ही पानी मिल पाता है। पहाड़ों में आधारभूत सुविधाओं का बेहद अभाव है। राज्य सरकार रोजाना बजट का रोना रो रही है और हकीकत ये भी है कि कई जनप्रतिनिधियों ने अपनी निधियों का पूरा उपयोग ही नहीं किया। इस राज्य में ऐसा कब तक रहेगा इसके बारे में सही से कोई भी नहीं कह सकता है।

    Reply
  2. avatar
    हेम पन्त December 16, 2009 at 12:00 PM |

    मैने भी यह महसूस किया है कि पहाड़ के युवाओं के लिये NGO वाला काम एक रोजगार की तरह हो चुका है. जिसे देखो वह किसी NGO के साथ काम करता हुआ दिखता है. हर गांव में 3 NGO काम कर रहे हैं और जाहिर है सरकार से ही उन्हें पैसा मिल रहा है, लेकिन इनका परिणाम सिर्फ आंकड़ों में ही दिखता है.. वास्तविकता यह है कि अधिकांश (सभी नहीं) NGO सिर्फ सरकार और जनता को बेवकूफ बना कर अपनी जेबें भर रहे हैं.

    पहाड़ी क्षेत्रों में नये उद्योगों के पंजीकरण के लिये युवावर्ग भारी दिक्कतों का सामना कर रहा है, उनकी फाइलें टेबलों के नीचे दबी हुई हैं लेकिन NGO के पजीकरण धड़ा-धड़ हो रहे हैं.

    Reply
  3. avatar
    sht December 16, 2009 at 6:46 PM |

    राजनीतिक दलों और सरकारों ने बुनियादी समस्याओं, विकास के मुद्दों, भाषा, शिक्षा, संस्कृति जैसे प्रश्नों पर विचार करना बहुत पहले से ही बंद कर दिया है इसलिए तो वह देश को बाजार तथा एन.जी.ओ. के भरोसे छोड़कर मुक्त हो गई है । एन जी ओ ने इसका खुला फायदा उठाया है आज वह बाजारवाद के समर्थको के साथ मिलकर काम कर रहे है, और आंदोलनों की धार को कुंद कर रहे है ! तभी तो उत्तराखंड मे बन रहे बंधो का जब स्थानीय लोग विरोध करते है तो उन पर रासुका लगा दी जाती है और और बंधों का विरोध कर रहे एन.जी.ओ. के तथाकथित कार्यकर्ता कभी जेलों मे नहीं ठूंसे जाते वो मैग्सेसे , पदम् विभूषण , पदम् भूषण, पदमश्री और कई व्यापारिक व मीडिया के पुरुस्कारों जैसे NDTV इंडियन ऑफ़ द इयर या फिर राजकीय सम्मानों से नवाजे जाते हैं !

    Reply

Leave a Reply

%d bloggers like this: