नौकुचियाताल में पाँचवाँ अंतर्राष्ट्रीय डाक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टीवल


भास्कर उप्रेती
भारत में आजादी के बाद सरकार की योजनाओं को बताने के उद्देश्य से डाक्यूमेंट्री फिल्म विधा अस्तित्व में आई, जिससे दर्शकों का जल्दी ही मोहभंग हो गया। फिर कुछ लोगों ने कैमरे का प्रयोग अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए किया। आज डाक्यूमेंट्री फिल्में पॉलिटिकल एक्टिविज्म का एक धारदार औजार बन चुकी हैं। मगर, मूलतः यह एक ऐसी कला विधा है, जिसमें कैमरे के माध्यम से अपनी बात सरल और सहज रूप में कही जा सकती है। जिसमें जीवन जैसा वह है, वैसा दिखाया जा सके। हालाँकि साहित्य की तरह सिनेमा में भी ‘आर्ट फॉर आर्ट्स सेक’ की सीमाएँ हैं। प्रिंट की तुलना में कैमरा यथार्थ को ही दिखाने का आदी होता है और जो काल्पनिकता वह रचता है, वह भी यथार्थ की ही बुनियाद पर होती है। डाक्यूमेंट्री सिनेमा का एक बड़ा मकसद यह भी है कि वह हमारे बीच मौजूद उस सामान्य और साधारण को एक गाढ़ी खबर की तरह सामने लाये, जो हमें सामान्यतः दिखाई देना बंद हो गया है। ऐसा गाढ़ापन जो पारे की तरह है, कीचड़ की तरह नहीं। आर्ट सिनेमा मुद्दे की बात को सनसनी और मुहावरों से निकाल कर देखने का प्रयास करता है।
फिल्मकार दम्पत्ति नीलिमा और प्रमोद माथुर लगातार पाँच सालों से नौकुचियाताल में ‘लेक साइड डाक्यूमेंट्री फेस्टीवल’ (एल.डी.एफ.) का आयोजन कर रहे हैं। इस बार 14 से 17 अप्रैल तक आयोजित इस फेस्टीवल में 10 मुल्कों की 13 फिल्में प्रदर्शित की गयीं। अब तक हुए पाँच आयोजनों में यूरोप के लगभग सभी देशों की फिल्में शामिल हो चुकी हैं, खासकर पूर्वी यूरोपीय देशों की फिल्मों को यहाँ अधिक तरजीह मिली है। भारत समेत एशिया के विभिन्न देशों का सिनेमा भी यहाँ आया है। इस बार फेस्टिवल को गोथे इंस्टिट्यूट (मैक्समूलर भवन) जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और पोलैंड के राजनयों द्वारा मदद प्रदान की गयी थी। नौकुचियाताल में ही बस गये दम्पत्ति नीलिमा और प्रमोद माथुर की संस्था ‘फॉर मीडिया’ के साथ डॉक्स लेप्जिग, सिनेमा डेला क्रिटिक और सिनेमा डू रील आदि प्रतिष्ठित संस्थाएँ फेस्टीवल के सह-आयोजक थे। फॉर मीडिया भारत के युवा फिल्म निर्माताओं के लिए समय-समय पर वर्कशॉप, सेमीनार और सिनेमा पालिसी को लेकर चर्चा-परिचर्चा आयोजित करती रहती है। इसका मकसद पेशेवर डाक्यूमेंट्री निर्माता तैयार करना है और इसे संयुक्त राष्ट्र की इकॉनोमिक और सोशल काउंसिल की ओर से विशेष परामर्शदात्री संस्था का दर्जा मिला है।
इस बार प्रदर्शित फिल्मों में रोमानिया की ‘सिनेमा, मोन अमोर’ में रोमानिया में तेजी से विलुप्त हुए सिनेमाघरों की त्रासदी को विक्टर पउरिस की उस जद्दोजहद के रूप में व्यक्त किया गया है, जो किसी तरह अपने सिनेमा में लोगों को लाना चाहता है। मगर अंततः 30 दर्शकों को ही सिनेमाघर में जुटा पाता है। पुराना सिनेमा नयी तकनीक और भव्यता के आगे लाचार है। यह फिल्म रोमानिया के मशहूर सिनेमाघर ‘डासिया’ की सच्ची दास्ताँ हैं। फिल्म का निर्देशन अलेक्जान्द्रू बेल्क ने किया है।
स्विट्जरलैंड से आई फेस्टिवल की दूसरी फिल्म ‘बीइंग दियर’ के निर्देशक थॉमस ल्युसिंगर खुद आयोजन में मौजूद थे। यह चार अलग-अलग स्थानों, अमेरिका, ब्राजील, स्विट्जरलैंड और नेपाल, के मृत्य की दहलीज पर खड़े चार लोगों की देखभाली की कहानी है। मृत्युबोध और उस पर बातचीत कैसे उनकी मौत की पीड़ा को एक सहज चीज बना देती है। यदि मृत्यु निश्चित है तो क्यों नहीं मृत्यु की एक नयी कला विकसित की जाये ? पेशे से शिक्षक रहे ल्युसिंगर ने बताया कि इस फिल्म का विचार उन्हें अपनी माँ की लंबी बीमारी से आया। इसे बनाने में कई साल लगे और उन्हें इसके लिए फिल्म निर्माण का काम भी सीखना पड़ा।
ग्योर्गुई बालावनोव द्वारा निर्देशित बुल्गारिया की ‘एंड दि पार्टी गोज ऑन एंड ऑन’ यूरोप में पिछले दिनों छाई आर्थिक मंदी और उससे उपजे व्यक्तिगत क्षोभ को दर्शाती है। क्रांति की दरकार है लेकिन क्रांति के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं। दक्षिणपंथी सांसद को कहते हुए सुना गया है कि कठोर आर्थिक नियंत्रण लाने होंगे, जबकि जिंदगी पहले से ही तबाह है। फिल्म कहती है कि सोवियत संघ में श्रम संबंधों के बदलने की एक बानगी जरूर पेश हुई थी, लेकिन वह दुनिया के समाजों पर कोई दूरगामी छाप नहीं छोड़ सकी। पंकज जौहर निर्देशित ‘सिसीलिया’ घरेलू नौकरानियों की विडंबनाओं के साथ खुद फिल्म निर्माता का साक्षात्कार है। यह मानव तस्करी की जीवंत कहानी है। सिसीलिया दिल्ली में पंकज और उनकी पत्नी सुनैना के घर में काम करती है और उसे खबर मिलती है कि उसकी बेटी, जो दिल्ली में ही अन्यत्र नौकरानी है, ने खुदकुशी कर ली है। दरअसल यह खुदकुशी नहीं हत्या थी। पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाके से आई सिसीलिया जौहर दंपत्ति की मदद से लड़ाई लड़ती है। लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान पता चलता है कि आदिवासी इलाके से रोजगार के लिए महानगरों में लायी जाने वाली लड़कियों के पीछे एक तंत्र काम कर रहा है, जिससे पराजित होकर जौहर दंपत्ति और सिसीलिया अंततः हथियार डाल देते हैं। भारत की एक और फिल्म ‘सब-टेक्स्ट ऑफ एंगर’ थी। निर्देशक वंदना कोहली ने क्रोध आने की वजहों और क्रोध के दौरान होने वाली मानसिक-शारीरिक प्रतिक्रियाओं की पड़ताल की है। फिल्म बताती है कि क्रोध एक मनोवैज्ञानिक दशा तो है लेकिन इसकी जड़ें हमारे समाज और परिवेश में निहित हैं। अपने विषय को समझने के लिए वंदना ने देश और दुनिया के श्रेष्ठ मनोविज्ञानियों, मनोचिकित्सकों और समाजविज्ञानियों से बात की है। फिल्म मीडिया और इलैक्ट्रोनिक माध्यमों द्वारा पैदा होने वाले अवसाद को बखूबी दर्शाती है।
जापान की फिल्म ‘पेंटिंग पीस: दि आर्ट एंड लाइफ ऑफ काजुआकी तान्शी’ का निर्देशन नीदरलैंड के बेबेथ वान्लू ने किया है। यह 80 वर्षीय शिक्षक, अनुवादक और कलाकार काजुआकी तान्शी के द्वारा 13वीं शताब्दी के महान जापानी कलाकार दोजेन के काम की प्रतिलिपि बनाने को लेकर उनके योगदान को दर्शाती है। फिल्म यूरोप और जापान की कला-यात्रा कराती है। चीन के खिलाफ छेड़े गए जापानी युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले काजुआकी तान्शी के पिता बाद में शांतिवादी हो जाते हैं। खासकर, नागासाकी और हिरोशिमा की तबाही के बाद वे दुनिया को बर्बादी के रास्ते में जाने से रोकने का प्रयास करते हैं और इस प्रयास में जापानी सरकार के लिए चुनौती बनते हैं तो जनता के चहेते। काजुआकी तान्शी अपने पिता के आत्मावलोकन को कला में ढालते हुए दुनिया में शांति, सह अस्तित्व और बहुलता के पक्ष में मजबूत आवाज बन जाते हैं।
तीसरे दिन की पहली फिल्म पोलैंड से थी- ‘के-2. टचिंग दि स्काई’। पर्वतारोही एलिसा कुबार्स्का निर्देशित फिल्म हानिया, लुकाज, लिंसडे और क्रिस टुलिस की काराकोरम अभियान की आत्मावलोकन करती कहानी है। खुद निर्देशक और ये चार दरअसल 1986 के अभियान में मारे गए इनके माताओं-पिताओं से साक्षात्कार करती हुई अभियान में चलती हैं। ये सब खुद भी अच्छे ट्रेकर और क्लाइंबर हैं, लेकिन इनका मकसद है मानव की उस ग्रंथि का पता लगाना जो निरर्थक शिखरों को फतह करने के लिए सब कुछ दाँव में लगा देते हैं। फिल्म के मार्मिक संवाद हमारे सोचने के नजरिए को चुनौती देते हैं। पोलैंड की ही ‘कासा ब्लांका’ में निर्देशक अलेक्सांद्र मॉसियोजेक ने हवाना में मछुआरों के छोटे से गाँव में डाउन सिंड्रोम के पीडि़त 76 वर्षीय माँ और 37 वर्षीय बेटे के रिश्तों को प्रस्तुत किया है। बूढ़ी माँ कभी उसकी सेवा में लगे और कभी बच्चों या मछुआरों के बीच व्यस्त व्लादिमिर को लेकर मासूम सपने देख रही है। बेटे को घर आने में थोड़ी भी देर होती है तो माँ अपने जर्जर शरीर के साथ अँधेरी सुरंग में खड़ी सीढ़ी उतरकर बेटे को तलाशने लगती है। फिल्म बताती है कि प्रेम के लिए भौतिक जरूरतें और शारीरिक कठिनाइयाँ बाधा नहीं बनतीं।
उदासी, बिछोह और अकेलेपन का विशद चित्र खींचती ‘दि कन्वर्सेशन’ रूस से आई थी। निर्देशक थे अनास्तासिया नोविकोवा। एक बुजुर्ग एक एकांत जगह पर, पास में एक मोबाइल फोन रखे खिड़की के पास बैठा है। किसी की कॉल का इंतजार करते-करते वह खुद से बात करने लगता है। वह दूर अस्पताल में भर्ती अपनी पत्नी के बारे में, खिड़की पर चढ़ आई छिपकली के बारे में, पानी में उतर रहे झींगुर के बारे में और समय के बीतते चले जाने के बारे में बातें करता है। अगली फिल्म फ्रांस की- ‘अ यंग गर्ल इन हेर नाइनटीज’ थी। इसका निर्देशन यान कोरिडीयान और ब्रूनी टेडीशी ने किया है। कोरियोग्राफर थिअरी भूलने के आदी बीमारों के अस्पताल की यात्रा के दौरान 90 वर्षीय ब्लांचे मोरोयु, जो अपना सुंदर सा नाम भी याद नहीं कर पाती, से मिलता है। किसी के मधुर गीत के दौरान ब्लांचे अचानक गहरी विस्मृति से जाग उठती है और अपने पहले प्यार के क्षणों में लौट आती है।
फेस्टिवल की अन्तिम फिल्म ‘हेलिकॉप्टर- हाउस अरेस्ट’ जर्मनी से थी। फिल्म का निर्देशन कोस्तांतिन हटज का है। 27 वर्षीय बेंजामिन को जेल में उपद्रव के लिए उसके घर में ही निगरानी पर रखा गया है। उसकी माँ और उसके बीच हेलिकॉप्टर को लेकर एक ऐसा संवाद चलता है जो दर्शक के मन में सवाल पैदा करता है कि इस काम में कोई कानूनी मसला भी है क्या! फिल्म संवाद की ताकत को दर्शाने का काम करती है।
नौकुचियाताल झील के किनारे एक रिसोर्ट में सम्पन्न हुए इस फेस्टिवल में देशी-विदेशी फिल्मकारों के अलावा तमिलनाडु, झारखंड, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, पंजाब, अल्मोड़ा आदि जगहों से लोग पहुंचे थे। हर फिल्म के बाद फिल्म की निर्माण प्रक्रिया पर निर्देशक से सवाल जवाब होते। कई सवाल चुभने वाले हो सकते थे, मगर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त निर्माताओं-निर्देशकों को इन सवालों पर खुलकर और विनम्रतापूर्वक बात करते देखा गया।
इस फेस्टिवल में चुनिंदा लोगों को ही आमंत्रित किया जाना थोड़ा अटपटा लगता है और खलता भी है। मगर आयोजक इस संकोच को इस विधा के साथ पेश आने की एक जरूरत बताते हैं। इसमें भाग लेने वाले लोग मुख्यतः सिनेमाई लोग ही होते हैं, खासकर निर्माता, निर्देशक और संपादक। डाक्यूमेंट्री बनाने वाले सामान्य रूप से स्वयं में ही सब कुछ होते हैं। पटकथा लिखने वाले, कैमरा चलाने वाले और कई बार इसके पात्र भी। आयोजन में ऐसी फिल्में आती हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर सिनेमाघरों, बाजारों या यू ट्यूब जैसी जगहों में नहीं देखा जा सकता। सिनेमाकार अपने उत्पाद को लेकर जगह-जगह स्क्रीनिंग कराते हैं। निर्देशक और निर्माता एक आइडिया लेकर आता है और उस पर बाकी सिनेमाविदों से उनकी राय चाहता है। कई फिल्में ऐसी हो सकती हैं जो एक सामान्य दर्शक को पहली ही नजर में रुच जाएँ, मगर सिनेमा की समझ रखने वाली डाक्यूमेंट्री कम्युनिटी को वह मामूली और कुछ नयी बात न कहने वाली लगे। डाक्यूमेंट्री में आर्ट को अहमियत देने वाली ये फिल्में दरअसल हमारे सिनेमा-दृष्टिकोण को चुनौती देने का काम करती हैं। यह उस सब को धोने की इच्छा रखती हैं जो मुख्यधारा के सिनेमा की मादकता और एक्टीविस्ट डाक्यूमेंट्री सिनेमा की सनसनी हमारे मन पर दर्ज करती है। मीडिया की भाषा में इसे स्लो मोशन सिनेमा भी कह सकते हैं।
72 वर्षीय प्रमोद माथुर बताते हैं कि हम मुख्यधारा के सिनेमा द्वारा पैदा किये इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं कि आर्ट सिनेमा अभिजनों की ही समझ में आ सकता है। जब कोई छोटे बजट की फिल्म बनाता है और सामान्य जिंदगी को दर्शाता है तो उसे पेशेवर सिनेमा के डब्बे से बाहर निकालकर आर्ट या डाक्यूमेंट्री सिनेमा के डब्बे में डाल दिया जाता है। हम डाक्यूमेंट्री को न छोटा-बड़ा करके देखते हैं और न ही इसे महज नारेबाजी के काम में लाने के हिमायती हैं। आज डाक्यूमेंट्री फिल्में एन.जी.ओ. मार्का हो गयी हैं। हम गंभीर सिनेमा के लिए जगह बनाने के लिए लगे हैं। यह कठिन, मगर बहुत जरूरी काम है। 62 वर्षीय नीलिमा कहती हैं कि यूरोप में आर्ट सिनेमा को बढ़ावा देने वाले बड़े-बड़े संस्थान हैं। वे हर तरह के गंभीर काम को मदद देती हैं, यह सोचे बगैर कि इससे सरकारी नीतियों की आलोचना होती है। वे आलोचना सुनना चाहते हैं. हमारे यहाँ उल्टी स्थिति है। सरकार के लिए डाक्यूमेंट्री सिनेमा अपना प्रोपेगेंडा करने का औजार है। दूसरी ओर एंटी- एस्टेब्लिश्मेंट की बात है। हम मानते हैं कि कहने के तरीके से फरक पड़ता है। आपने भुखमरी दिखाई, गरीबी दिखायी लेकिन आपकी बात सुर्खियाँ बटोरकर रह गयी और कोई हलचल नहीं हुई। चीजें वैसी की वैसी बनी रहीं, तो फायदा नहीं। अभी एक अभियान चला हुआ है कि भारत की नेगेटिव चीजें दिखाकर अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड्स जीतने का। इससे किसको फायदा हुआ ? सिनेमा साहित्य की तरह मानसिक पोषण के लिए होता है।
प्रमोद के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय फेस्टीवल के बहाने उत्साही फिल्मकारों को बाहर का सिनेमा देखने को मिलता है। आर्ट मूवीज आपको नया दृष्टिकोण देती हैं। रूस, पोलैंड, चेक और इरान का सिनेमा एक अलग तरह का नैरेटिव पेश करता है, उनका सिनेमायी स्टाइल अलग है। आप इस बात को अपने यहाँ लायेंगे तो अपने मुद्दों को अधिक गंभीरता से पेश कर सकेंगे. एक अच्छी फिल्म सोचने का दायरा बढ़ाती है और सोचने के नए-नए नजरिए विकसित करती है। सिनेमा को अकेले में देखकर बात नहीं बनती, उस पर चर्चा करना भी जरूरी होता है। हम यहाँ ऐसा ही वातावरण निर्मित करना चाहते हैं।

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