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    घिंघारु May 21, 2010 at 4:01 PM |

    मोहन जी ने नोडल एजेंसी वाला सुझाव बहुत अच्छा दिया है। आज विभिन्न क्षेत्रों में उत्तराखण्ड के कई नामचीन और विज्ञ व्यक्ति हैं, जिनके अनुभवों का लाभ सरकार को लेना चाहिये। लेकिन वर्तमान सरकार जिस मंशा के साथ विजन-मिशन लैस होकर काम कर रही है। उसके जरिये तो यह हो पाना असंभव ही है। क्योंकि इस सरकार की कोई इच्छाशक्ति ही नहीं है, जिस सरकार का मिशन उत्तराखण्ड के वंचित आदमी तक मूलभूत सुविधा और अवस्थापना सुविधा देने के बजाय मात्र २०१२ के चुनाव का मिशन हो, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है।

    मजे की बात यह भी है कि अपने इस मिशन को सरकार अपने गठन के दिन से ही प्रचारित-प्रसारित करती रही है, और कहीं कोई प्रतिउत्तर नहीं, यहां तक कि मुख्य विपक्षी दल को भी इस मिशन पर एतराज नहीं, हो भी क्यों, उसके पास कौन सा मिशन है।

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    हेम पन्त May 22, 2010 at 9:50 AM |

    प्रवासी उत्तराखण्डियों का राज्य के निर्माण में भी बड़ा योगदान रहा है और राज्य के विकास में भी वह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन इस उदाहरण से स्पष्ट है कि स्वयं आगे बढ कर सहायता का प्रस्ताव देने पर भी सरकार के प्रमुख मन्त्री ने उन्हें यथोचित प्रतिक्रिया नहीं दी. होना तो यह चाहिये थाकि सरकार के वरिष्ट नौकरशाह या स्वयं मन्त्री जी को जाकर जोशी जी से मिलना चाहिये था.

    हरगोविन्द खुराना को भारतीय लोगों ने तब इज्जत देना शुरु किया जब उन्हें अमेरिकी नागरिक के तौर पर नोबल मिला. भारत में तो उन्हें अपनी प्रतिभा के हिसाब से नौकरी भी नहीं मिल पायी थी. ऐसी कई प्रतिभाएं सरकार के साथ मिलकर उत्तराखण्ड के हित में काम करना चाहती हैं लेकिन सरकार शायद “घर की मुर्गी दाल बराबर” वाले फार्मूले पर चल रही है.

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