पलायन रोकने का तरीका चकबंदी से शुरू होगा

Ganesh Garibअखिल गढ़वाल सभा के बैनर तले एवं गरीब क्रान्ति की पहल पर 1 सितम्बर को देहरादून के गढ़वाल सभा भवन में एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। पूरे 5 घण्टे चली गोष्ठी में सरकार द्वारा राज्य में अनिवार्य चकबन्दी का निर्णय लागू करने का स्वागत किया गया।

1952 में उ.प्र. में चकबन्दी हुई थी, मगर पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक यहाँ बाद में चकबन्दी करने की बात करते हुए इसे उस वक्त चकबन्दी से मुक्त रखा गया था। लेकिन चकबन्दी हो नहीं पायी और पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार भूमि बँटवारे के कारण खेती अलाभप्रद होती चली गयी। इससे जब दूसरी समस्यायें पैदा होने लगी तो राज्य में चकबन्दी की मांग उठने लगी। 26 नवम्बर, 2012 को श्रीनगर में हुई समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री बहुगुणा ने पूरे प्रदेश में चकबन्दी लागू कराने की घोषणा की थी। कृषि मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत की लगातार कोशिशों के बाद यह निर्णय आया है। इस निर्णय से लोगों में नई उम्मीदें जगी हंै। अब इस बात पर मंथन होने लगा है कि किस प्रकार चकबन्दी लागू हो और कैसे इसकी राह में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाये।

गोष्ठी की शुरूआत में अखिल गढ़वाल सभा के सचिव रोशन धस्माना नेे आगन्तुकों का स्वागत करते हुए कहा कि चकबन्दी की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिये गढ़वाल सभा हर संभव मदद देगी। चकबन्दी आन्दोलन के प्रणेता गणेश सिंह ‘गरीब’ ने कहा कि पहाड़ को बसाने का एकमात्र रास्ता चकबंदी ही है। यदि शंकायंे हैं तो समाधान भी हंै। इस पर जब आगे चर्चा आरम्भ होगी तो कई बातंे सामने आयेंगी। सरकार को एक योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ना होगा। विषय-विशेषज्ञों, कानूनविदों, जानकार लोगों, किसानों, बुद्धिजीवियों व सभी संगठनों को बुलाकर प्रारूप तैयार करना होगा, उसे लागू करने के लिये मैनुअल बनाना होगा और फिर प्रचार-प्रसार के माध्यम से जनता के सवालों का समाधान कर उनका सहयोग लेना होगा। पूर्व चकबन्दी अधिकारी कुँवर सिंह भण्डारी ने तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चकबन्दी में मैदान व पहाड़ की अड़चन नहीं है। इच्छाशक्ति हो तो पहाड़ की परिस्थितियों के अनुसार यहाँ के लिये अलग नियम बन सकते हंै। चकबन्दी से भी पहले बन्दोबस्त पर ध्यान देना होगा। स्वैच्छिक चकबन्दी सफल नहीं हो सकती। उत्तरकाशी के बीफ व खरसाली गाँवांे में लोगों ने स्वैच्छिक चकबन्दी तो की लेकिन उनके सँटवारे- बँटवारे को विधिक मान्यता न मिलने से लोग उस जमीन के स्वामी नहीं बन सके। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी डॉ. हर्षवन्ती बिष्ट ने कहा कि यदि चकबन्दी से गाँवों से पलायन रुक सकता है तो इसे शीघ्रातिशीघ्र लागू किया जाना चाहिये।

कलजीखाल विकास खण्ड से आये पृथ्वी सिंह पटवाल और जयकृत सिंह पटवाल ने कहा कि उनकी दिवई न्याय पंचायत में सरकार ने चकबन्दी करने का निर्णय लिया था। तत्कालीन आयुक्त सुभाष कुमार ने एक बैठक की थी। उनके गाँव में काफी खेती बंजर हो चुकी है। ज्यादातर लोग चकबन्दी के लिये तैयार हैं लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। साहित्यकार योगम्बर सिंह बर्तवाल ने कहा कि चकबन्दी से लोगों को जब एक स्थान पर जमीन मिलेगी तो वे अपनी सुविधानुसार उस पर काम करने लगेंगे। प्राध्यापक डाॅ एम.एस. रावत ने कहा कि अन्य समस्याओं, जैसे जंगली जन्तुओं के आतंक, के कारण भी लोग खेती से विमुख हो रहे हैं। आन्दोलनकारी परिषद के नेता प्रदीप कुकरेती ने कहा कि चकबन्दी के साथ हमें भूमि को भी बचाना होगा। ऐसा न हो कि चकबन्दी का लाभ भू माफिया उठा लें। हिमाचल की तरह हमें अपने नियमों को कड़ा बनाना होगा।

गढ़वाल मण्डल विकास निगम के पूर्व महाप्रबन्धक सी.एस. नेगी ने कहा कि चकबन्दी से परम्परागत खेती से आगे बढ़ कर पुष्पोत्पादन, जड़ी बूटी कृषिकरण, औद्यानिकी, बागवानी जैसे काम होने लगेंगे। गढ़वाल सभा के जयकृत सिंह नेगी ने चिन्ता व्यक्त की कि पहाड़ से पलायन कर चुके लोगों की रुचि जमीन के प्रति नहीं हैै।

सेवानिवृत्त आई.जी. सत्यशरण कोठियाल ने सुझाव दिया कि प्रक्रिया में ऐसे लोगों को होना चाहिये जिन्हें पहाड़ का ज्ञान हो। चकबन्दी लागू करने वाली एजेन्सी को पूरी शक्ति व अधिकार से युक्त करना होगा। गरीब क्रान्ति की अलख जगाने वाले युवा कपिल डोभाल ने कहा कि गाँव नहीं रहंेगे तो हमारी पहचान कैसे बनी रह सकती है ? डॉ. रमेश उनियाल ने कहा कि चकबन्दी से भूमि संरक्षण व जल संरक्षण योजनाओं का सीधा लाभ लिया जा सकता है। पूर्व उपजिलाधिकारी शशिधर भट्ट ने चकबन्दी पर उ.प्र. सरकार द्वारा बनाये गये एक्टों का हवाला देते हुए कहा कि पहले हमें यहाँ के भूमि पैटर्न को समझ कर सर्वमान्य रास्ता निकालना होगा। यहाँ की परम्पराओं का भी ध्यान में रखना होगा, यह काम कठिन है लेकिन असंभव नहीं। इस बारे में गढ़वाल सभा एक दस्तावेज तैयार कर सरकार को भेजने की जिम्मेदारी ले सकती है।

समाज विज्ञानी डॉ. वीेरेन्द्र पैन्यूली ने पहाड़ की पीड़ा का एक खाका रखा। अखिल गढ़वाल सभा के अध्यक्ष टी.एस. असवाल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि चकबन्दी से ग्राम नियोजन की भावना को बल मिलेगा। यह गाँव का मास्टर प्लान बनने में सहायक होगी। शुरूआत में हर विकास खण्ड में ऐसे एक गाँव को चिन्हित किया जाये, जहाँ पर सरकार अपनी ग्राम विकास की सारी योजनाओं से उन लोगांे को लाभ दे जो चकबन्दी करेंगे। इस अवसर पर डा. अरुण कुकसाल, चन्द्रशेखर तिवारी, द्वारिका बिष्ट आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। गोष्ठी का संचालन एल.एम. कोठियाल ने किया।

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