पीडि़तों की रहनुमाई महंगी पड़ी

21 अक्टूबर 2013 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्र धारचूला का दौरा किया गया। लेकिन उनका दौरा होने से पूर्व ही आपदा प्रभावितों की मांगों को उनके समक्ष रखना चाह रहे भाकपा (माले) के पिथौरागढ़ जिला सचिव जगत मर्तोलिया को प्रशासन द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और मुख्यमंत्री के वहाँ से लौट आने के बावजूद तत्काल उनकी रिहाई नहीं हुई। उन्हें तीन दिन जेल में रहना पड़ा।

सरकार- प्रशासन के इस तानाशाहीपूर्ण रवैये की चौतरफा आलोचना हुई। मर्तोलिया के अपने संगठन भाकपा (माले) ही नहीं अन्य संगठनों ने भी इस घटना की निन्दा की है। उत्तराखंड लोक वाहिनी के अध्यक्ष डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक सबको है। मगर उत्तराखंड सरकार दिनोंदिन असहिष्णु होती जा रही है। इस राज्य के बनने का मतलब ही नष्ट हो गया है। भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर पूछा कि यदि प्रशासन के इस तर्क को मान भी लिया जाए कि कामरेड जगत मर्तोलिया के नेतृत्व में आपदापीडि़त लोग उनके समक्ष आक्रोश प्रकट कर सकते थे, इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो क्या मुख्यमंत्री जी प्राकृतिक आपदा में अपना सब कुछ गँवा चुकने वाले अभागे लोगों से फूलमालाओं और प्रशस्ति गीतों की अपेक्षा कर रहे थे ? यदि मुख्यमंत्री का दौरा आपदा प्रभावित क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिए था तो क्या आपदा पीढि़तों का आक्रोश उस हकीकत का प्रकटीकरण नहीं होता ?

इस जून की अतिवृष्टि के बाद धारचूला क्षेत्र में आपदापीडि़तों के बीच सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक संगठन भाकपा (माले) ही रहा है। जब शासन प्रशासन लकवे में पड़ा था जगत मर्तोलिया आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री लेकर पहुँचने वाले पहले व्यक्ति थे। बाद में प्रदेश के अन्य हिस्सों से ही नहीं, उत्तराखंड के बाहर से भी आपदाग्रस्त लोगों के लिये राहत सामग्री लेकर आने वाली टीमों ने शासन-प्रशासन के विवेक से भी अधिक भरोसा मर्तोलिया पर जताया। पिथौरागढ़ में आपदा पीडि़तों के लिए राहत सामग्री जुटाने से लेकर उनकी दिक्कतों को प्रशासन के सामने लाने तक के लिए वे रात-दिन एक किये हुए थे। जाहिर है कि अपनी नाकामी छिपाने के लिये ही पिथौरागढ़ जिला प्रशासन ने जगत मर्तोलिया को गिरफ्तार किया।

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