अपने गाँवों को तुम जानो. 9 :मक्कूमठ

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उमा भट्ट
अआअ में बाकी सब बातें तो होती हैं पर थकान की बात करने की जैसे मनाही है। रात को अगर बैठक हो रही है तो जब तक सब बैठे हैं, आपको भी बैठना है। चलना है तो चलते रहो। सभा करनी है तो सबकी उपस्थिति जरूरी है। कोरस गाये जा रहे हैं तो साथ में सबको गाना है। 18 जून की रात चोप्ता में भोजन के बाद ढाबे की मेजों के इर्द-गिर्द कुर्सियों को व्यवस्थित करके जब बैठक शुरू हुई तो अब तक की यात्रा, मुद्दे, अनुभव, आपदा पर विस्तार से बातें होती रहीं। बहुत से साथी यहां आये हुए हैं। बागेश्वर से केशव भट्ट, पंकज पाण्डे, आलोक साह; नैनीताल से महेश जोशी तथा अल्मोड़ा से शम्भू राणा आये हैं। मदनमोहन चमोली भी आये हैं। रुद्रप्रयाग के साथी गजेन्द्र रौतेला, दीपक बैंजवाल आदि तो हैं ही, स्वागत-सत्कार के लिए तत्पर। रात को जो कसर रह गई थी, वह उन्होंने सुबह पूरी की। सुबह कमरों से निकले तो बाहर ढोल दमाऊं बज रहे थे। एक-एक कर साथी आते रहे, टीका लगता गया, टोपी पहनाई गई और तिल-गुड़ खिलाया गया। साथ में ‘दस्तक पत्रिका’ का आपदा पर केन्द्रित नया अंक, जो रुद्रप्रयाग के ये साथी ही निकालते हंै, भी दिया गया।
आज हमें मक्कूमठ, फिर किमाणा होते हुए उखीमठ तक जाना है। चोप्ता से हमने भेड़पालन केन्द्र होकर जाने वाला जंगल का रास्ता न पकड़कर दुग्गलबिट्टा से मक्कू मोड़ होकर सड़क का लम्बा रास्ता चुना। रास्ता बहुत सुन्दर था और मदन मोहन चमोली जी के नेतृत्व में गीत गाते हुए चलने में जोश और बढ़ रहा था। मक्कू मोड़ में हमें रुद्रप्रयाग से आये हुए समाजकर्मी और ‘अनिकेत’ के सम्पादक रमेश पहाड़ी, आन्दोलनकारी सुशीला भंडारी तथा पत्रकार अनुसूया प्रसाद मलासी जी मिल गये। सड़क-सड़क चलने का अनुभव सुखद नहीं रहा। हालांकि सड़क के दोनों ओर घना जंगल था। अलग अलग समूहों में बतियाते हुए लोग चल रहे थे। हमें तो सुशीला भण्डारी ने खूब गीत सुनाये- रामलीला, भजन, लोकगीत, देशभक्ति के गीत और अन्त में रामी बौराणी का गीत। आन्दोलनकारी सुशीला भण्डारी का एक नया रूप था यह।
मक्कू पहंुचते ही हमने पहले गांव से नीचे की सड़क पर जाकर एक छोटी सी ढाबेनुमा दुकान में खाना खाया। वहीं व्यवस्था की गई थी। यही विडम्बना रही कि इतने बड़े और समृद्ध गांव में हम खाना खाने एक ढाबे में गये, जहां न खाने में स्वाद था, न बैठने की जगह थी और न ही स्वच्छता का कोई खयाल था। हमारे लिए खैर, यह भी एक अनुभव था। भोजन के बाद गांव में ही विद्यालय के बरामदे में सभा हुई, जिसमें बहुत बड़ी संख्या में लोग आये थे।
रुद्रप्रयाग जिले के मक्कूमठ गांव की प्रसिद्धि तुंगनाथ जी के शीतकालीन आवास के रूप में है। कालीमठ तथा उखीमठ की तरह ही यह मक्कूमठ है। तुंगनाथ जी के साथ साथ यहां के मैठाणी लोग भी प्रसिद्ध हैं। पांडुकेश्वर, गोपेश्वर, नारायणकोटि, त्रिजुगीनारायण, तुंगनाथ की ही तरह यहां भी कत्यूरी शैली का मन्दिर है जिसे गुप्तोत्तरकालीन मन्दिर स्थापत्य कहा जाता है। मक्कू चमोली जिले की उखीमठ तहसील की दैड़ा पट्टी में आता है। कुल 420 परिवारों वाले गांव में ब्राह्मण, राजपूत और शिल्पकार रहते हैं। लगभग 2000 की जनसंख्या वाले इस गांव में 960 मतदाता पिछले चुनाव में थे। इस गांव में पंजाब नेशनल बैंक की शाखा है, पोस्ट आॅफिस है, इन्टर कालेज है, प्राइमरी स्कूल के अतिरिक्त चिल्डेªन अकादमी है। प्राइमरी पाठशाला के अध्यापकों से हमारी बातें हुईं तो यह रोचक बात पता चली कि सप्ताह के छहों दिनों के लिए उन्होंने अलग-अलग प्रार्थनाएं तथा कोरस बच्चों को सिखाए हैं। केवल तीन कोरसों की पहली पंक्ति ही याद रही- ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के’, ‘गीत गा रहे हैं आज हम रागिनी को ढूंढते हुए’ और ‘लहू का रंग एक है अमीर हो गरीब हो’। इन्टर कालेज में 264 विद्यार्थी हैं, जिनमें 50 प्रतिशत छात्राएं हैं और फिलहाल 15 अध्यापक हैं।
राजकीय महाविद्यालय तथा पालिटेक्नीक अगस्त्यमुनि में हैं। गांव सड़क से जुड़ा है। अगस्त्यमुनि होते हुए रुद्रप्रयाग को सड़क जाती है और दूसरी सड़क उखीमठ को चली जाती है। मक्कू सेेेे चोप्ता तक पैदल रास्ता भी है सीधा चढ़ाई वाला। पुजारीगण तथा अन्य लोग इसी पैदल रास्ते से नित्य आते-जाते रहे हैं, सड़क तो अब आई। मक्कू से काफी नीचे मन्दाकिनी नदी बहती है, जो केदारनाथ से आकर अलकनन्दा से मिलने चली जाती है। तुंगनाथ की ओर से आकाशकामिनी नदी आती है और मक्कू के पास से होते हुए मन्दाकिनी की ओर चली जाती है। तुंगनाथ की दूसरी ढाल का पानी बालखिला नदी में चला जाता है जो चमोली से जरा नीचे अलकनन्दा में मिलती है।
मक्कू गांव के अधिकांश लोग नौकरियों में हैं। फौज में भी अच्छी खासी संख्या है। ऊंचे-ऊंचे पदों पर भी यहां के लोग हैं। लेकिन जैसा हमें बताया गया कि स्थायी रूप से पलायन यहां नहीं है। अभी घरों में ताले नहीं लगे हैं। लोग प्रवास में रहते हैं लेकिन लौटते भी हैं।

जमीन उपजाऊ है। खेती से लगभग साल भर की गुजर हो जाती है। गांव के ऊपर, तुंगनाथ से भी ऊपर चन्द्रशिला तक मक्कू की वन पंचायत है जो 2014 हेक्टेयर में फैली है। सरपंच सरोजिनी मैठाणी से हमारी बातें हुईं। इतनी बड़ी वन पंचायत में परेशानी नहीं होती ? नहीं, कोई परेशानी नहीं है, उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया। दो चैकीदार रखे हैं हमने और गांव वाले भी देखभाल करते हैं। वे कहती हैं, पर्यावरण बचाने के लिए हम सतर्क रहते हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ नुकसानदायक है हमारे लिए। जब हम मक्कूमोड़ से सड़क-सड़क आ रहे थे तो रास्ते में बहुत सारे पेड़, बड़ी-बड़ी शाखाएं, टहनियां पड़ी हुई थीं। हमारे एक साथी ने कहा, इस लकड़ी को बेच क्यों नहीं देते होंगे ये लोग ? बेकार पड़ी हैं जगह-जगह। हमारे मस्तिष्क में किसी वस्तु को देखते ही सबसे पहले उसके उपयोग की बात आती है। उपयोग नहीं हो रहा है तो लगता है, वस्तु बेकार जा रही है। वस्तु की उपयोगिता क्या मनुष्य के सन्दर्भ में ही देखी जानी चाहिए। जंगल की चीज है, जंगल में पड़ी है, यह भी तो सोचा जा सकता है। जंगल की पुरानी पीढ़ी सदैव नई पीढ़ी के लिये खाद बनती रही है। यही तो पारिस्थितिकी है।
मक्कू में अस्पताल नहीं है, पर एएनएम केन्द्र है। अस्पताल 30 किमी. दूर उखीमठ में है। फिर रुद्रप्रयाग और आगे जाना पड़े तो देहरादून। पशु चिकित्सालय भी उखीमठ में ही है। जीप सेवा के कारण आना-जाना कठिन नहीं है। महिलाओं की बच्चेदानी निकालने के आपरेशन यहां भी बहुत हुए हैं।
गांव से कुछ ऊपर चोपता के रास्ते में भेड़ प्रजनन केन्द्र खुला था। इसका सम्बंध मीरा बहन द्वारा स्थापित ‘पशुलोक’ से भी रहा। गांव वालों ने अपनी जमीन भी उसके लिए दी थी। पर अब वहां कुछ नहीं होता। केवल जगह का नाम भर रह गया है। तमाम सरकारी योजनाओं की तरह यह भी ठप हो गई है। यहां हमने एक नया नाम सुना गैर सरकारी संस्था ‘ऋतंजलि’ का, जिसने गांव में कम्प्यूटर का प्रशिक्षण दिया है। स्वयं सहायता समूह भी बनाये हैं महिलाओं के। उत्तराखण्ड के गांवों में एनजीओ से लोग अब सुपरिचित हैं। गांव में शराब का प्रचलन है। कच्ची बनती है और देशी तथा अंग्रेजी उखीमठ या अगस्त्यमुनि से आती हैं। जब भी कोई सार्वजनिक आयोजन होता है, गांव में सबसे पहले यही बात उठती है कि शराब बन्द होनी चाहिए।
राज्य आन्दोलन में यह पूरा गांव जुटा था। उन दिनों ऐसा नियम बना दिया था कि हर परिवार से रोज एक व्यक्ति उखीमठ धरना-प्रदर्शन में जायेगा। लोग मानते हैं कि राज्य बनने से कुछ विकास तो हुआ है। पर गड़बडि़यां भी बढ़ी हैं। चिपको आन्दोलन के लिए भी यहां सकारात्मक रुख है। जलवायु परिवर्तन का असर भी पड़ रहा है। तापमान बढ़ गया है। गांव में पंखे चलने लगे हैं। माल्टा-सन्तरा की पैदावार कम हो गई है। खेती में भी उपज कम हो गई है। यहां भी घर में सब गढ़वाली बोलते हैं और गांव-घर से बाहर हिन्दी। तुंगनाथ जी का शीतकालीन आवास होने से ‘द्याप्त औण’ (देवता का आना) तथा ‘द्याप्त जाण’ (देवता का जाना) यहां बड़े़ उत्सव हैं। वैशाखी, पौणाखी, पांडव नृत्य, जीतू बगड्वाल, पंचमी, रामलीला, संक्रान्ति, मोल, घोघामाई (फूलदेई) आदि अनेक पर्व-त्यौहार और मनोरंजन हैं जो जीवन्त बनाते हैं ग्रामीण जीवन को।
गांव के निकट एक कोट भी है डोबली। एक पुराने ऊँचे स्थल में ओखल बने हैं, पर अपने कार्यक्रम से बंधे होने के कारण हम वहां जा नहीं पाये। मक्कूमठ में तुंगनाथ जी के रहते लोगों की आवत-जावत (तीर्थाटन/पर्यटन) बढ़ती है तो आसपास के ये स्थल भी दर्शनीय और सुगम हो सकते हैं। मक्कू में होम स्टे के लिए भी अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अच्छे खासे घर और सुविधाएं गांव में हैं, जिन्हें सुव्यवस्थित अवश्य करना होगा और सीमा निर्धारित करनी होगी। पर्यटकों के लिए गांव की संस्कृति के भीतर मर्यादित आचरण जरूरी होना चाहिए।
2013 की आपदा में मक्कू के भी 6 लोग केदारनाथ में काल कवलित हुए। उन दिनों दहशत भर गई थी सब कहीं। यह गांव बहुत जागरूक और आन्दोलनकारी रहा है। यहां के महीधर मैठाणी जी ने केदार-बद्री को जोड़ने वाली चोप्ता-मंडल हो कर जाने वाली सड़क के बन जाने पर भी बस न चलाये जाने के कारण भूख हड़ताल की थी। जिसे मंदाकिनी और मंडल, दोनों घाटियों की जनता का समर्थन मिला। इस आन्दोलन ने शासन को इस मार्ग से वाहन चलाने को विवश कर दिया। आज भी इस मार्ग में चलने वाली मुख्य बस को ‘भूख हड़ताल एक्सप्रेस’ और इस मार्ग को ‘भूख हड़ताल मार्ग’ कहा जाता है।
लोगों के पास कहने को कई बातें हैं। इन्टर कालेज में अध्यापकों की कमी है। बेरोजगारी है। स्वरोजगार के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है। फलों के लिए विपणन व्यवस्था नहीं है और संरक्षण के लिए शीतघर नहीं हैं। बुरांश काफी है पर कोई उद्योग नहीं है। पानी बहुत है पर उसका कोई उपयोग नहीं है। भेड़पालन केन्द्र खुला पर स्थानीय जनों के लिए उसमें भी नौकरी नहीं है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनना ही उनकी नियति है। संसाधन हैं पर ग्रामीण स्तर पर उनसे रोजगार पैदा करने की पहल न सरकार करती है न खुद ग्रामीण जन।
सभा की समाप्ति पर बागेश्वर का दल कर्णप्रयाग को गया, रुद्रप्रयाग का रुद्रप्रयाग को, अगस्त्यमुनि के साथी अगस्त्यमुनि को और हम अआअ के यात्री भी थकान और समय की कमी को देखते हुए एक जीप बुक करके वापस मक्कूमोड़ के रास्ते किमाणा गांव की ओर चल पड़े। हमें अभी 8 जुलाई तक चलते जाना है।
(जारी है)

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