पराई भाषा में जीना मरना

Parayi Bhashaदादी की अंधेरी रात की कथा-डोर के साथ
कान के रास्ते खून में गई हुई भाषा
पहाड़ नदी-खेतों के रास्ते, दादा के कन्धों पर बैठकर
आँखों के रास्ते अंदर गई हुई भाषा
माँ के चबाये हुए निवालों से
पेट में उठते उजियाले की भाषा
पिताजी की उंगली पकड़कर त्योहारों में देखी हुई
परिवार-मोहल्ला-गाँव की गलियों में जीती भाषा
सब एक होकर रहते
नाचते, गीत गाते, काम करते
एक का दुःख सबका हो जाता था.
जीवन के सबसे ऊँचे रास्ते पर ले जानेवाली यह
हमारी भाषा
एक सीढ़ी भी
नहीं चढ़ सकी
मैं अकेला ही बैठा रहा था स्कूल में
कुत्ते की तरह बाहर बैठकर सिसक रही थी
हमारी भाषा.
मास्टर कहता: बोलना नहीं अपनी भाषा में
डर गया था मैं
पूछ नहीं सका क्यों बोलना नहीं ?
वह पराई भाषा हमारे मास्टर के मुँह में
किसने रखी होगी ?
अंधेरी रात के काले अंधेरे की तरह
वह आँखों पर बैठती
दस से पाँच बजे तक
बैठी ही रहती वह,

आँखों के रास्ते अक्षर बनकर घुस जाती मुझमें
कभी-कभी तो वह
होवर्या-डोवर्या के शरीर में जीव आता है वैसे
हाथ की उंगलियों के रास्ते घुस जाती शरीर में
उसे अगर जगह न दो तो
मास्टर की मार और भय.

जेठा
मेरी बुआ का लड़का
हम एक ही गूदड़ी ओढ़कर सोनेवाले
मार के भय से नहीं तो नहीं ही पढ़ सका
उठ-बैठ में कमर झुका कर अंगूठे पकड़ने में
हरी छड़ी के साथ, कैसे भी करके
घुस जाती थी वह
पराई भाषा.

हमें सिखाती है:
जमीन बेची जा सकती है
जंगल में मालिकी हो सकती है
पत्थर-रेत-नदी का पानी बेचा जा सकता है
तुम्हारे पास जो है वह छुपा के रखो
दुनियां को छोड़, विचार कर अपने अकेले का
चूहा फूँक फूँक कर खाता है वैसे
हमारे समूहजीवन को
फूँक फूँक कर खाती है
वह पराई भाषा.

हमें बिगड़े हुए साबित करके
मेहनत करती है सुधारने के रात-दिन
एक दूसरे पर राज कैसे करना ?
जिंदा रखकर भी कैसे मार डालना ?
किसी और की मेहनत को लूट लेने वाला विचार
भरे बाजार में खड़ी होकर
सिखाती है वह हमें
पराई भाषा

मेरा मामा मर गया था पराई भाषा में
आँसू थे चंद लोगों की आँखों में
पूरा गाँव दुःखी नहीं था
विधि कर दी गई थी किसी आयोजित कार्यक्रम की तरह
दया-प्रेम के बगैर मरने की
फर्ज लादकर भावहीन कर रही है हमें वह
पराई भाषा.
दुःख की बात तो यह है कि, वह रोकती है-

मना करती है हमें, पुरुखों के हाथों का काम करने से
हमारी धरती पर हल चलाने को
मेहनत करने को, मना करती है हमें
नीचा दिखाती है वह
हमारे माँ-बाप के बनाये जीने के रास्ते को
समाज की परंपरा को,
क्या कहूँ आखिर
हाथ-पैर-आँखें होने के बा-वजूद भी
लूला-लंगड़ा-अंधा-बहरा बनाकर
छोड़ देती है वह
हमारी ही जिंदा भाषा के बीच
हमें जिंदा लाशें बनाकर.

– जितेन्द्र बसावा

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