चिट्ठी पत्री : यादों का पहाड़ और सुखी जीवन

meri-yadon-ka-paharकुछ वर्ष पूर्व नैनीताल समाचारमें मेरी एक लेखमाला मेरा गाँव: मेरे लोगप्रकाशित हुई थी जिसे पाठकों का बहुत प्यार मिला था। पाठकों ने लेखमाला के बारे में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए काफी पत्र भी लिखे थे। उस लेखमाला को मैंने कुछ और सामग्री जोड़़ कर मेरी यादों का पहाड़पुस्तक के रूप में संजोया। लेखमाला के रसिक पाठकों को यह जानकर खुशी होगी कि वह पुस्तक हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित हो चुकी है। लेखमाला के प्रकाशन के लिए नैनीताल समाचारका पुनः आभार।

देवेंद्र मेवाड़ी, द्वारका, नई दिल्ली

1-14 मई 2013 का अंक बहुत विलम्ब से मिला। आखिर इन डाकखाने वालों की ये डाक खाने की आदत कब छूटेगी ? राजजात 2013 की चुनौतियों के बारे में समय पूर्व आगाह करने के लिये नन्दकिशोर हटवाल साहब का धन्यवाद। यह जोड़ देना प्रासंगिक होगा कि प्रत्येक प्रतिभागी यात्री का पंजीकरण यात्रा आरम्भ होने से पूर्व अवश्य हो जाना चाहिए। अरे! श्रद्धा और आस्था ये मानव स्वभाव के गुण ही नहीं बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व के लिए जीवंत मूल्य भी हैं। इनकी रक्षा जीवन रहते ही संभव है। गजेन्द्र पाठक जी का सुझाव कि वनाग्नि रोकने के लिए चीड़ का सफाया गले नहीं उतरा। मैंने तो बाँज-बुराँश के जंगलों में भी आग लगते हुए देखी है। हाँ, यह बात उन्होंने अच्छी कही कि ग्रामीण जनता ऐसी स्थिति में तुरन्त आग बुझाने के प्रयास करे। बल्कि उनकी इस जवाबदेही को उनके हक-हकूक से जोड़ा जाना चाहिए।

चन्दोला जी का आलेख क्या वह वहाँ सुखी था? पाठकों को जन्म-भूमि से जुड़ी अपनी जड़ों के बारे में सकारात्मक सोच रखने का सन्देश देता है। सूखी रोटी में सुखी जीवन की असीम संभावनाएं छिपी रहती हैं, वशर्ते इंसान परिधि की ओर बहिर्मुख होने के बजाय केन्द्र की ओर अभिमुख होने के लिए हमेशा उद्यत रहे। खास बात यह भी है, पब के पव्वे सूखी रोटी से बढ़ कर कभी नहीं हो सकते। बल्कि इनकी तुलना करना ही मूर्खता है। शमशेर बिष्ट का रमापन्त मैडम का भावपूर्ण स्मरण सच्चे श्राद्ध से कम नहीं है। गढ़वाली जी को याद करना गढ़वाली जी का जी उठने के समान है। कभी सांकृत्यायन द्वारा लिखी गढ़वाली जी की जीवनी पढ़ी थी। सोचता हूँ उस शान से कभी कोई जी सकता है ? अपने-आप पर दया आती है। वे हमारे लिए जिए। हम किस के लिए जी रहे हैं। धन्यवाद रोहित भाई। आगे कभी दामिनी कभी गुडि़याआलेख के तहत अपनी चिन्ता व्यक्त करने वाले अरुण भाई ने देश में टूटते सामाजिक मूल्यों के जंगलराज में उन युवक-युवतियों को सलाम ठोका है जिन्होंने उक्त के सम्बन्ध में अपना विरोध दर्ज किया। दरअसल यह युवा वर्ग ही हमारा भावी भारत है। वे नेता नहीं जो दूसरों के लिए कानून बनाते हैं और स्वयं को उस कानून से ऊपर समझते हैं। ये युवा उस युवा शक्ति के लिए प्रेरणा स्रोत हैं जो मतलब-परस्त नेताओं द्वारा गुमराह और दिग्भ्रमित किये जा रहे हैं।

डी.एस. रावत, दुधारखाल, पौड़ी

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