जौनसार बाबर में प्रचलित ‘खुम्ड़ी’ न्याय व्यवस्था

खुशीराम शर्मा

यों तो स्वतंत्र भारत में पंचायत राज का शुभारम्भ 2 अक्टूबर 1959 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने किया था। मगर देहरादून के जौनसार बाबर हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में खुम्ड़ी (पंचायत) व्यवस्था न जाने कब से चली आ रही है। इसका कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं हैं, मगर राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही परम्परा के आधार पर इन पंचायतों में गाँव के आपसी विवाद बड़ी सरलता से निपटा लिये जाते हैं। सरकारी न्यायालयों के समान इस पंचायती न्याय व्यवस्था में भी कई स्तर हैं। इस दृष्टि से देखें तो खुम्ड़ी व्यवस्था के ‘गाँव का सियाणा’ को सरकारी व्यवस्था के पटवारी के समकक्ष रखा जा सकता है। इसी तरह ‘खागी सियाणा’ को जिला न्यायालय, ‘सादर सियाणा’ को उच्च न्यायालय और ‘चार चंतरू’ को सर्वोच्च न्यायालय के बराबर माना जा सकता है।

गाँव, जो कुछ परिवार से मिलकर बनता हैं, का एक सियाणा (लम्बरदार/मुखिया) होता है, जिसे बड़ा सम्मान दिया जाता है। गाँव के सभी विवादों का निपटारा सियाणा की अध्यक्षता में ही किया जाता है। विवादित पक्षों में से कोई भी एक खुम्ड़ी करने के लिये सियाणा के घर जाकर एक रुपया ‘नाणस’ के रूप में देता है। सियाणा अपने चौकीदार (बाजगी) के माध्यम से गाँव के कि सभी परिवारों को संदेश भिजवाता है कि नियत तिथि को हर घर से एक व्यक्ति ‘खुम्ड़ी’ के लिये आये। सभी लोग सियाणा के घर में पंचायत में बैठते हैं और विवादित मामले में अपने-अपने तर्क देते हैं। सियाणा खुले दिमाग से सभी की बातों को सुनता हैं और फिर अपने विेवेक के अनुसार निर्णय देता है, जो दोनों पक्षों को मान्य होता है।

गाँव के सियाणा के निर्णय से असंतुष्ट होने पर विवाद को ‘खागी सियाणा’ के पास रखा जा सकता है। इसमें चार या पाँच गाँवों के प्रत्येक परिवार से एक-एक सदस्य को खागी सियाणा के आदेश से बुलाये जाते हैं। खागी सियाणा मौखिक रूप से अपने बाजगी से प्रत्येक गाँव के सियाणा को सूचना भिजवाता है कि फलां तारीख को इतने बजे खुम्ड़ी है। वहाँ विवादित मामले को बातचीत से सुलझा लिया जाता है। अधिक सम्भावना गाँव के सियाणा द्वारा दिये गये निर्णय के बरकरार रहने की ही होती है। मगर कभी कभार निर्णय बदल भी जाता है, जिससे साबित होता है कि गाँव के सियाणा के दिये गये निर्णय में कहीं भूल-चूक हुई है। जिसे गाँव स्तर पर न्याय नहीं मिल सका, उसे खागी सियाणा के स्तर पर मिल जाता है।

कुछ मामले जो गाँव के सियाणा और खागी सियाणा के स्तर पर भी नहीं निपट पाते, उन्हें ‘सादर सियाणा’ के माध्यम से निपटाया जाता है। इसे आज के उच्च न्यायालय के स्तर का माना जा सकता है। यदि कोई सादर सियाणा के निर्णय को नहीं माने तो उससे गाँव से ‘तयाड़ा’ (बेदखल) कर दिया जाता है। वह गाँव से अलग हो जाता है और किसी भी प्रकार का सम्बन्ध गाँव या ग्रामीणों से नहीं ले सकता। ‘सादर सियाणा’ के भी ऊपर न्याय की सर्वोच्च पीठ ‘चार चंतरु’ है, जिसे आजादी के बाद के सालों में काम करते नहीं देखा गया। ग्राम पंचायत मंझगांव क्वानू के एक बुजुर्ग महर सिंह चैहान के मतानुसार ‘चार चंतरु’ में से तीन तो समाल्टा, दोएरा (खत बाना) और जाड़ी से थे। चैथी का उन्हें भी पता नहीं है।

आपसी विवाद को निपटाने के लिये एक ‘लोटे नूंण’ की परम्परा भी थी, जिसमें देवता के मंदिर में जा कर एक लोटे में नमक डाल कर कसम खायी जाती थी। जो पक्ष गलत होता, उसे अर्थदंड मिलता था। एक जमाने में एसडीएम कोर्ट में महासू देवता की कसम खिलाई जाती थी, आज की तरह गीता की नहीं। इससे साबित करता है कि इष्ट देव का कितना प्रभाव उस समाज में था कि झूठ बोलना सम्भव नहीं होता था।

अब गाँव व खत के सियाणों में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। पिछले लगभग पन्द्रह सालों से राजनैतिक तौर पर सर्व सहमति से सियाणा बना दिया जाता है। अब युवा वर्ग पंचायत प्रणाली को ज्यादा महत्व भी नहीं देता। यों भी जौनसार-बाबर से 65 प्रतिषत पलायन हो चुका है।

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