2 Responses

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    randheersingh2015 February 28, 2015 at 11:46 AM |

    नितांत आत्मिक….होली के गुलाल जैसा जो थोड़े से ही मैं सराबोर कर दे

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    Rajendra Juyal March 1, 2015 at 10:29 AM |

    मुझे कुमाउनी होली का पहला परिचय १९६९-७० में मसूरी में हुआ, मेरे गणित के गुरूजी लोहनी जी के घर पढ़ने जाता था – बंसन्त पंचमी थी – और होली गए रहे थे -समजह ज्यादा नहीं आया पर अच्छा लगा गुरूजी ने समझया – गढ़वाल के जैसी इलाके से तुम आते हो उस होली का इतना जोर नहीं होता पर कुमाऊं और दुस्सान्त पर होली गजब की होती है धीरे धीरे समझ आने लगी , यंहा मेरठ में जब कंही होली गयी जाती है मैं जरूर जाता हूँ – तन मन सरोबार हो जाता है – हिमालय की डाँडी कांठियुं की खुद लग जाती है

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