जोहार घाटी से ऊँताधुरा दर्रा के दोनों ओर – 5

Team-who-went-for-trekking_thumb.jpgदिन के खाने का बुलावा आया। खाने में मैस ड्यूटी वाले जवानों द्वारा करछी से ही घी उँडेला जा रहा था। हमारी परेशानी को प्यार से कम करने का इनका इस जगह पर इससे बढि़या तरीका और क्या हो सकता होगा ? इनके प्रेम से खुद में झिझक हो उठी। आज हमारे टीम के साथी भी इनके साथ जिस ढंग से हिल-मिल गए थे, उससे उनकी थकान भी काफूर हो उठी। आज काफी वक्त मिला। एक बाजी कैरम खेलते-खेलते वॉलीबाल का निमंत्रण आ गया।

हमें बताया गया कि फौज का दिया गया बीएसएनएल का सेटेलाइट फोन इस जगह पर ढंग से काम नहीं करता है। शाम को हमें सूचना दी गई कि आगे की पोस्ट में हमारे बारे में सूचना भेज दी गई है। वहाँ से मैसेज आया कि अगले आदेश तक दल को कहीं भी न जाने दिया जाए। मतलब अब हमारी स्थिति एक तरह से नजरबंद जैसी हो गई थी। हमारे परमिट पहले ही लिए जा चुके थे। हमने पोस्ट के साहब को हमें अपने हाल पर छोड़ने के लिए भी कहा, लेकिन उन्होंने भी अपनी मजबूरी जता दी। हमने उन्हें अपने साथियों के कुछ नंबर देकर उन्हें हमारी स्थिति के बारे में बताने को कहा, लेकिन बाद में हमें मालूम चला कि किसी को भी कोई जवाब नहीं मिला। मौसम भी खराब था। हल्की बर्फ गिर रही थी। ऊँटाधूरा में काफी बर्फ आ जाने के संकेत दिख रहे थे। अंधेरा होने लगा था। बैरक में कम्पनी हवलदार मेजर (सीएचएम) साहब एक जवान के साथ पहुँचे। बैरक में उन्हें ठंड महसूस हुई तो बोले, ‘‘बुखारी जला लो। ठंड काफी हो रही है, आराम से रहो दो-चार दिन। अभी आगे से कोई मैसेज नहीं आया है।’’ उनके साथ आए जवान ने बुखारी जला दी। थोड़ी देर में कमरा गुनगुना हो उठा। सीएचएम साहब ने अपनी डायरी खोली। दो-तीन पन्ने पलटने के बाद बोले, आज का कोड है ‘शोला और फूल।’ भूख न होने के बाद भी कुछ खा लेना इस ऊँचाई पर जरूरी होता है। थोड़ा सा खा लेने के बाद बुखारी बंद कर सो गए।

सुबह देखा कि रात में हुई बर्फबारी से बावन बैंड व ऊँटाधूरा दर्रे में काफी बर्फ आ गई थी। हमें बताया गया कि आज गिर्थी पार सोमना पोस्ट से कुछ जवानों के साथ साहब आने वाले हैं। गिर्थी नदी में टूटे अल्पाईन ग्लेशियर को पार करने के लिए दोनों ओर से कोशिश की जाएगी। जवानों का एक दल रस्सी, फावड़ा, आईस एक्स, बारूद ले गिर्थी नदी को चला गया। सीएचएम साहब जाते-जाते बता गए कि आज रास्ता खोल कर ही रहेंगे, चाहे टूटे ग्लेशियर को गिराने के लिए बारूद से ब्लास्ट ही क्यों ना करना पड़े। हमें पोस्ट में ही रोक दिया गया। हल्की बारिश हो रही थी। रास्ता खुलने की उम्मीद में हमने अपना सामान भी बाँध लिया था। हमारी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दो जवान भी हमारे बैरक में थे। जवान वक्त बिताने के अपने साधन- कैरम, ताश व लूडो ले आए।

जवानों से बातचीत हुई तो कई बातें सामने आई- ‘‘हम तुम्हारे सामान की चैकिंग अच्छी तरह से इसलिए कर रहे थे कि शायद कुछ तंबाकू, गुटका, बीड़ी, सिगरेट या सुर्ती जैसा कुछ मिल जाए तो चुपचाप जब्त कर लें… लेकिन कुछ भी नहीं मिला। कुछ भी नहीं लेते क्या तुम ? हमारे पास नशा करने के लिए कुछ भी नहीं बचा यहाँ। दो महीने से कुछ भी सामान नहीं पहुँचा। न सब्जी, न ठंड भगाने की दवा। पेस्ट किए न जाने कितने दिन हो गए… याद ही नहीं अब तो। जब हम इस पोस्ट को आ रहे थे उस वक्त जो सामान हम लाए, उसी से गुजारा कर रहे हैं। रोज मैसेज भेजते हैं लेकिन कुछ होता ही नहीं। कोई पूछने वाला जो क्या हुआ। उधर से बस एक ही जवाब मिलता है कि जल्द ही ‘हैली’ (हैलीकाप्टर) से सामान भेज देंगे। ………….सैटेलाइट फोन दे रखा है वह भी काम नहीं करता। अस्सी रुपया मिनट कॉल है। बात हो या न हो। एक बार हैल्लो हो गई तो समझो अस्सी गए। आज तक इससे कभी किसी की बात नहीं हो पाई। हमारा एक साथी शादी के तुरंत बाद इस पोस्ट में आ गया। तब से वो परेशान है। उसकी आज तक अपने घर बात ही नहीं हो पाई। एकाध हजार रुपये जो उसके पास थे नकद, वो भेंट चढ़ा चुका है। उस पर भी अभी उसे चैन नहीं है। अभी तीनेक हजार का एडवांस अलग से चढ़ चुका है। मानता ही नहीं किसी की। हम भी क्या कर सकते हैं। बीएसएनएल की अंधेरगर्दी हुई। सिर्फ इसी पोस्ट के लिए है अस्सी रुपये मिनट, उस पर भी बात नहीं होती। ये डिब्बा हमारी जेब काटने के लिए रखा है यहाँ। ये यहाँ नहीं होता तो कुछ सुकून तो रहता कि फोन नहीं है। आगे की पोस्टों में तो अठ्ठाईस रुपये में तीन मिनट की कॉल दर है। साफ बात होती है। हमारे साहब भी काफी सीधे हैं, कुछ कहते ही नहीं आगे। चलो खैर! एक महीना और है फिर सब ठीक हो जाएगा। निकल जाएँगे यहाँ से। बर्फ आ जाती है तब यहाँ काफी। आप लोग क्यों आने वाले हुए ऐसी जगहों में ?’’

बाहर से आवाजें आने पर हम बैरक से बाहर निकले। सुबह गया दल वापस लौट रहा था। सभी के चेहरों में थकान व निराशा दिख रही थी। सीएचएम साहब ने ही बताया- ‘‘उस पार से साहब ने काफी जाँबाजी दिखाई लेकिन बात नहीं बन पाई। अब वे वापस चले गए हैं। बमुश्किल एक जूस की बोतल ही फेंक सके उन तक। एक तो ग्लेशियर में ही अटक गई। अब तो बाद में कभी ग्लेशियर को तोड़ना होगा या फिर ‘हैली’ ही आएगा।’’

हमारी जिद पर सैटेलाइट फोन बाहर सैट होने लगा। नई शादी वाला जवान खुद ही लग गया फोन को सैट करने में। ये जवान जिसे सैटेलाइट फोन कह रहे थे, दरअसल वह बीएसएनएल का डब्लूएलएल का फोन था। इस जगह में उससे फोन मिल पाने के लिए हम भी सशंकित हो उठे। बीएसएनएल ने आखिंर फौज को ये डिब्बा पकड़ा क्यों ठगा था, वहाँ हमें कोई बताने वाला नहीं था। काफी देर के बाद उसमें सिग्नल आए तो हमने पिथौरागढ़ के साथी जगत मर्तोलिया को फोन मिलाया। दो बार मिलाने के बाद भी उन्होंने फोन नहीं उठाया। फिर हमने अपने साथी एवरेस्टर हीरा राम को फोन मिलाया। हीरा राम जी उस वक्त आईटीबीपी पिथौरागढ़ में सूबेदार मेजर के पद पर तैनात थे। उन्होंने फोन उठाया और ‘हैलो’ कहा। हम इधर से बस बोलते ही रह गए। शायद हमारी आवाज नहीं जा पा रही थी या कुछ इस बीएसएनएल के डिब्बे की करामात थी। दोबारा फोन मिलाया। वही हस्र दोबारा भी हुआ। 160 रुपये ठंडे। नई शादी वाले ने भी तुरंत अपनी किस्मत आजमानी चाही लेकिन तब तक सिग्नल जा चुके थे।

मौसम घिरने लगा था। हम अपनी बैरक में फिर से कैद हो लिए। तीन दिन से हमारी टीम टोपीढूंगा में फँस कर रह गई थी। हमें आज मलारी या जोशीमठ पहुँच जाना था। फौज के अधिकारियों की लापरवाही व दूसरी बटालियनों में आपसी तालमेल ठीक न होने की वजह से हम टोपीढूंगा में नजरबंद से हो गए थे। आपस में सहमति बना हमने अब यहीं से वापस लौटने का मन बनाया। शाम को सीएचएम साहब अपनी डायरी ले बैरक में आए। हमने उन्हें वापस लौटने की बात बताई तो उनकी ढेर सारी उलझी बातों में हमें सिर्फ इतना ही समझ में आया कि उनके अधिकारियों के आदेश का इंतजार करना होगा। सीएचएम साहब ने इस क्षेत्र में फौज के द्वारा जासूसों के साथ प्रताड़ना के कई मनगड़ंत किस्से हमें सुनाए। उन्होंने हमारा मनोबल तोड़ने की पूरी कोशिश की ताकि फिर कभी हम सीमाओं की ओर आने की सोचें ही नहीं और फौज चुपचाप अपने दिन काटे। खाने के लिए कह वे बैरक से बाहर निकल गए। अपनी धुन में सीएचएम साहब रात्रि ‘कोड’ बताना भूल गए। ये कोड सिर्फ हमारे यहाँ होने पर हमारे लिए ही थे शायद, ये बताने के लिए कि यहाँ फौज हर हमेशा सतर्क रहती है। हमारे जाने के बाद कोड भी खत्म हो जाते होंगे।

खाना ले चुकने के बाद हमने पोस्ट इंचार्ज से मिलम के रास्ते ही वापस लौटने की बात कही। वे भी अपने उच्चाधिकारियों के आदेशों का हवाला देते रहे। काफी देर की वार्ता के बाद योगेश ने उनसे स्पष्ट कह दिया कि हमारी टीम कल सुबह हर कीमत पर वापस लौटेगी, चाहे हमें गिरफ्तार ही क्यों न होना पड़े। आधे घंटे बाद ही उन्होंने हमें बताया कि उनके उच्चाधिकारियों ने परमिशन दे दी है। हम कल को वापस लौट सकते हैं।

(जारी है)

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