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    घिंघारु April 28, 2010 at 2:02 PM |

    लोग पहले इसलिये जंगल बचाते थे, क्योंकि जंगलों पर उनका अधिआर था और उनकी आजीविका के लिये जंगल महत्वपूर्ण थे। लेकिन १९८० के अन्धे जंगल कानून ने आम जनता के जंगल से अधिकार छीन लिये, जिससे धीरे-धीरे आम आदमी भी जंगल से दूर हो गया “तू मेरा नहीं, तो मैं तेरा क्यों” वाली भावना घर गई। सई बार ग्रामीणों से मैंने बात की तो उनका स्पष्ट कहना था कि जब मैं अपनी कुदाल या हल का नश्यूड़ इस जंगल की लकड़ी से नहीं बना सकता, मुझे इस काम के लिये भी बाहर से लकड़ी खरीदनी पड़ती है। जब कि इन्हीं आवश्यकताओं के लिये मेरे पुरखों ने यह जंगल लगाया था और आज सरकार एक कानून बनाकर हमें जेल में डालने की तैयारी करती है। अगर जंगल सरकार का है तो वही आकर इसे बचा भी ले।
    लेकिन सरकार को कोई ऐसा हल निकालना होगा, जिससे आम आदमी की सहभागिता वनों में बढ़े और जब यह बढेगी तो वन्य-प्रेम भी अपने आप ही जागृत हो जायेगा। वैसे भी उत्तराखण्ड के जंगलों में हक-हकूक ग्रामीणों को मिलने चाहिये। अगर सब कुछ वन विभाग पर ही छोड़ देंगे तो वे चीड़ के अलावा कुछ नहीं लगाने के।

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