डी एस बी कैंपस में विवेकशून्यता व अराजकता

DSB Campusजनता के लगातार संघर्षों और पिथौरागढ़ में दो लोगों की शहादत से बने कुमाऊँ विश्वविद्यालय का नैनीताल परिसर अराजक व गुण्डा तत्वों का गढ़ बन गया है। एक अगस्त को डी.एस.बी. परिसर के कुछ छात्रों द्वारा ‘शिक्षा के सामाजिक सरोकार’ विषय पर एक विचार गोष्ठी होनी थी, जिसमें आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संदीप सिंह तथा जेएनयू की पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सुचेता डे वक्ता के रूप में आमंत्रित थे। कार्यक्रम की अनुमति विधिवत रूप से परिसर निदेशक एवं भौतिकी के विभागाध्यक्ष से ले ली गई थी। नियत समय पर ज्यों ही कार्यक्रम शुरू होने को था, ए.बी.वी.पी. और एन.एस.यू.आई. से जुड़े छात्र नेताओं और उनके साथ कैम्पस से आये कुछ गुंडों ने हुड़दंग मचा दिया। वक्ताओं एवं आयोजकों के साथ धक्का-मुक्की की गई और श्रोताओं को धमका कर खदेड़ दिया गया। इस पूरी घटना के दौरान कॉलेज प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। बाद में वह खुल्लमखुल्ला हुड़दंगियों के पक्ष में खड़ा हो गया। देश की जनता की आँखों में धूल झोंक कर, एक-दूसरे के विरोध में गत्ते की तलवारें भाँजते हुए लड़ने का दिखावा करने वाले भाजपा व कांग्रेस जिस तरह दागी जन प्रतिनिधियों पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एकजुट हो गये हैं, उसी तरह इनसे जुड़े छात्र संगठन, ए.बी.वी.पी. और एन.एस.यू.आई. अपने सारे मतभेद भुला कर परिसर में छात्रों व जनता के सरोकारों से जुड़े मुद्दे उठाने वाले छात्रों के दमन के लिये एकजुट हो गये। उनके दबाव में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये बने छात्रों के समूह ‘प्रतिरोध’ के सदस्य अनिल कार्की को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया।

2 अगस्त को रचनात्मक छात्रों के समूह ने नैनीताल के कुछ संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों को और जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की तृतीय पुण्यतिथि पर 22 अगस्त को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के बीच भी अपनी आपबीती सुनाई। मगर मीडिया ने भी इस चिन्ताजनक घटना का संज्ञान नहीं लिया। उसने तो ‘प्रतिरोध’ द्वारा शैलेहॉल में प्रस्तुत नाटक ‘पूत’ना’ को ही खबरों से लापता कर दिया।

डी.एस.बी. परिसर में हुई इस शर्मनाक घटना के विरोध में आइसा एवं कुछ जनवादी संगठनों द्वारा हल्द्वानी, लालकुआ आदि में विरोध-प्रदर्शन कर पुतले फूँके तो आइसा के कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन ने यूनाइटेड प्रोविंशेज स्पेशल पावर एक्ट 1932 के तहत मुकदमे ठोक दिये। भाकपा (माले) राज्य कमेटी सदस्य पुरुषोत्तम शर्मा के नेतृत्व में 16 अगस्त को एक प्रतिनिधि मंडल डी.आई.जी. से मिला और आइसा कार्यकर्ताओं पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की माँग की। प्रतिनिधि मंडल ने डी.आई.जी. को नैनीताल के एस.एस.पी. सदानन्द दाते द्वारा वरिष्ठ किसान नेता बहादुर सिंह जंगी को माओवादी बताने की भी शिकायत की।

इस तरह की गतिविधियों में जिला प्रशासन का रवैया बेहद पक्षपातपूर्ण रहा है। आइसा शिक्षा को लेकर नैनीताल क्लब में एक सम्मेलन करना चाहता था पर उसे स्थान उपलब्ध नहीं हो पाया। पता चला है कि इसके पीछे प्रशासन का दबाव है। आइसा छात्रसंघों के चुनावों में निरन्तर भागीदारी करने वाला संगठन है। फिर वह विश्वविद्यालय या जिला प्रशासन के लिये अछूत कैसे हो गया ? ‘प्रतिरोध’ के छात्र बताते हैं कि दो वर्षों से वे कैम्पस में बौद्धिक व शैक्षणिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, मगर कदम-कदम पर अराजक तत्वों द्वारा उनके आगे अड़चनें खड़ी की जाती रही हैं। पहली अगस्त की घटना के बाद तो मानो उन पर अलिखित प्रतिबंध लग गया है। उन्हें अपने नाटक की रिहर्सल बाहर करनी पड़ी। दीपक तिरुवा द्वारा लिखित नाटक, ‘पूत‘ना’, वे कॉलेज में नहीं दिखा पाए। इसका मंचन 11 और 22 अगस्त को शैलेहॉल में किया गया। कैम्पस में इधर-उधर छितरे, मगर पढ़ने-लिखने में रुचि रखने वाले छात्र तो इस स्थिति से मायूस हैं ही, नैनीताल नगर के जागरूक नागरिक भी बेहद चिन्तित हैं।

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