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    sht January 5, 2010 at 8:12 PM |

    NGO जैसे संगठनों पर आरोप इसलिये लग रहे है , क्यूंकि जिन मूलभूत आवश्यकताओं को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की है उनको लेकर NGO इतनी आतुरता क्यूँ दिखा रहे है बजाय सरकार पर दबाब बनाने की जगह सरकारी ग्रांट हड़प कर रहे है ! और व्यवस्था मे दलाली का काम कर रहे हैं ! NGO जैसे संस्थान सरकार और उसकी अकर्मण्यता को छुपाने का काम कर रहे है और उनके लिए एक सेफ्टी वाल्व की तरह है ! भोपाल गैस त्रासदी इसका प्रत्यक्ष उदहारण है जहाँ कई NGO पीडितो को सहायता देने का काम कर रहे है परन्तु अभी तक पीडितो के साथ न्याय नहीं हो पाया है और लोगों के आक्रोश जो व्यवस्था परिवर्तन के लिए उत्प्रेरक हो सकता था उसकी धार को इन NGO ने कुंद करने का काम किया है !

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    sht January 5, 2010 at 8:17 PM |

    और NGO को ये भी बताना चाहिए की क्या वो लोकतान्त्रिक सरकार से बेहतर विकल्प बन सकते है क्या ? अगर नहीं बन सकते तो उनको व्यवस्था परिवर्तन व सरकार को उसकी जिम्मेदारी निभाने के लिए दबाव बनाने के लिए काम करना चाहिए ना की सरकारी या बड़े पूंजीपतियों के लिए middlemen का काम!

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    rohit April 27, 2010 at 11:40 AM |

    महोदय आपका यह पत्र वास्तव में निरपेक्ष होकर एन0 जी0 ओ0 की पड़ताल करने का आर्गह करता है। लेकिन आप एन0 जी0 ओ0 के प्रति उदार दिखते हैं। दरअसल हम विगत् वर्षों में एनजीओज की आई बाढ़ के हवाले से इसे परखें तो अधिकतर या कहें की 99 फीसद एन जी ओ समाज सेवा के इतर पूंजी के आकर्षण से बधे हुए हैं। अभी कल ही की बात है एक मंच से बोलते हुए उत्तराखण्ड के एक प्रमुख एन0 जी0 ओ0 हिमालयन ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष ‘राजेन्द्र बिष्ट’ ने कहा कि ‘हम जब कोई प्रोजेक्ट ले लेते हैं तो हम अपनी तरह, अपने अनुभवों के आधार पर काम नहीं कर सकते। प्रोजेक्ट की गाइड लाइन को हमें फौलो करना होता है। हम बंध जाते है।’ सीधी सी बात है आप जानते है आप सही नहीं कर रहे, इससे बेहतर हो सकता है। लेकिन आप नहीं कर सकते। कारण क्या है? विभिन्न प्रोजेक्ट्स से मिलने वाली आर्थिक सहायता। जिससे आप बधे हैं। राजेन्द्र बिष्ट हमारे मित्र हैं। हम यह जानते हैं वाकई उनमें जज्बा है। लेकिन यह जज्बा आर्थिक स्रोतों द्वारा संचालित हो रहा है। यह त्रासदपूर्ण है। एनजीओज को शास्त्रीय संदर्भों में अगर हम समझें तो यह पूंजीवाद में समाजसुधार के ऐसे प्रतिष्ठान हैं जिनके काम करने का एक तयसुदा दायरा है। जो कि पूंजीवाद के खिलाफ नहीं जाता। जैैसे ही जाने लगता है गाइड लाइन आढ़े आने लगती है। ग़जब तो यह है कि पूंजीवाद ने ऐसी मानसिकता तैयार की है, जो समाज की दिक्कतों के नाम पर भी कमाई करवाने की सोचती है। इसे यहां भी समझा जा सकता है कि तमाम शिक्षण संस्थानों में सामाजिक प्रबन्धन आदि के नाम पर एम0 बी0 ए0 जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज करवाऐ जा रहे हैं। राजस्थान के आदिवासी इलाकों में ब्रिटेन का एक बड़ा एन जी ओ ‘सेव द चिल्ड्रªेन’ शिक्षा के समान अधिकारों को लेकर काम कर रहा है। उस इलाके में हम कुछ पत्रकारांे को घूमने का मौका मिला। वहां लोगों में इस संगठन का बड़ा प्रभाव है। लोग किसी क्रांतिकारी पार्टी की तरह संगठन के नाम पर जिंदाबाद चिल्लाते हैं। उन्हें संगठन ने विश्वास दिलवाया है कि शिक्षा व्यवस्था के सुधरते ही उनके हालात सुधर जाऐंगे। ग्रामीण कहते हैं कि जब हमारे बच्चे पढ़ लिख जाऐंगे तो अच्छी नौकरियां पा सकेंगे और हमारे हालात सुधर जाऐंगे। बात सही भी है कि शिक्षा लोगों को जागरूक बनाऐगी, हकों के प्रति लड़ना सिखाऐगी और कुछ एक को नौकरी भी दिलाएगी। लेकिन समयांतर के उपसंपादक और दिल्ली के चर्चित युवा पत्रकार ‘अभिषेक श्रीवास्तव’ ने जब ग्रामीणों से यह पूछा कि ‘यदि इस बीच एन जी ओ का यह प्रोजेक्ट खत्म हो जाता है और इन्हें पानी की समस्या पर या अन्य कोई नया प्रोजेक्ट मिल जाता है। तो भी क्या शिक्षा की समस्या बरकरार रहेगी और आप लोग शिक्षा को लेकर ही काम करते रहेंगे? क्यूंकि एन0 जी0 ओ0 तो अपने नऐ प्रोजेक्ट पर काम करेगा।’ इस पर एन0 जी0 ओ0 कर्मियों के चेहरे की हवाईयां उड़ गई और ग्रामीण जन कन्फ्यूज हो खुद को ठगा सा महसूस करने लगे। इसी भ्रमण के दौरान बांसवाड़ा के एक लक्जीरियस होटल में एक रात हमने इस संस्था के दक्षिणी ऐशिया के समन्वयक के साथ डीनर किया। यह महोदय सोशियल मेनेजमेंट से एम बी ए करने के बाद इस संस्था से पूर्व भी कई संस्थाओं से जुड़ कर काम कर चुके हैं। इनको ज्यादा सेलरी मिलने पर यह इसे छोड़कर किसी दूसरी संस्था के लिए भी काम कर सकते हैं। ऐसे में समान शिक्षा अभियान से इनके जुड़ाव के भावनात्मक पक्ष को समझा जा सकता है। बहरहाल यह महोदय स्पष्टवादी थे सो इन्होंने हमसे कुछ बातें शेयर की। इन्होंने बताया कि इनका पूरा संगठन जिन आदिवासियों के बीच काम कर रहा है इनकी स्थितियां बस्तर के आदिवासियों से भिन्न नहीं हैं। कृषि के लिए यह इलाका पानी के अभाव से दुरूह है। सो आमदनी के लिए छोटे छोटे बच्चे भी पढ़ाई छोड़ संगमरमर की खदानों में या अहमदाबाद जा कर मिलों में मजदूरी करने को अभिशप्त हैं। हम जानते हैं कि हम अपने आंदोलन से बहुत कुछ नहीं बदल पाऐंगे। लेकिन यहां माओवाद के प्रसार के सारे बीज यहां मौजूद हैं। इसीलिए हम भी यहां हैं। ताकि कहीं जनता का तमाम अभावों से पैदा हुआ गुस्सा माओवाद की शक्ल न ले ले।
    दरअसल एन0 जी0 ओ0 वर्तमान समय में सरकार के खिलाफ बनने वाले जनता के दबाव के लिए एक सेफ्टी वॉल्ब की तरह भी हैं। इसीलिए इन्हें तमाम सरकारी प्रशय प्राप्त है। जैसा कि आपने ही जिक्र किया है कि सारे बड़े एन जी ओ या प्रशासनिक अधिकारियों की पत्नियों के हैं या अन्य रसूखदार लोगों के। एक कमरे में आफिस खोल छोटे कस्बों के युवाओं को तो अनुदान के छींटे ही मिल पा रहे हैं या वो भी नहीं। ऐसे में मेरा इन युवाओं से आग्रह है कि समाज सुधार के सही मायनों को समझें? लोगों को संघर्ष करने का सबक दें और अपनी गाइड लाइन खुद तैयार करें।

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    rohit April 27, 2010 at 12:15 PM |

    पिछली पोस्ट में गलती से ‘आग्रह’ शब्द ‘आर्गह’ छप गया है। कृपया इसे शुद्ध ‘आग्रह’ ही पढ़ें और साथ ही आंखरी पंक्ति में प्रश्नवाचक चिन्ह गलती से लगा है उसे न पढ़ कर क्षमा करें।

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