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    navin bagouli February 4, 2012 at 1:45 AM |

    शर्मा जी,
    जोनसार और सिरमौर की दीवाली अब इतिहास ही बन गया है, आज की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने में खुद की तौहीन समझती है, जरूरत है इसे बदलने की, हमें याद रखना चाहिए कि हम जिस थाती से जुड़े हैं, जो सांस्कृतिक परंपरा हमारी हैं उन परंपराओं और तीज त्योहारों को सामूहिक रूप से मनाने की शुरूआत करें। ताकि इससे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इनसे जोड़ सकेंगे। आपका लेख ज्ञानवर्धक और जानकारी पूर्ण है। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।
    जय उत्तराखंड़

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