आपदा दो : अनाथ बच्चे

Anath Bachche 2हाल की आपदा में कई परिवारों के एकमात्र आजीविका कमाने वाले पुरुषों की असामयिक मृत्यु हो गई। हजारों परिवार कंगाली की स्थिति में पहुँच गये हैं। सैकड़ों बच्चे माता अथवा पिता या माता-पिता दोनों की मृत्यु हो जाने से अनाथ हो गये है। यद्यपि ऐसे बच्चों की वास्तविक संख्या का सही आँकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है, किन्तु यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इनकी संख्या एक हजार से ऊपर ही होगी। उत्तराखण्ड बाल कल्याण परिषद को प्राप्त सूचियों से मालूम पड़ता है कि इनमें 4 माह के बच्चों से लेकर 17-18 साल के किशोर भी हैं। बिना राज्य के सक्रिय सहयोग के इतनी बड़ी संख्या में अनाथ हुए बच्चों की शैक्षिक जरूरतों की पूर्ति किया जाना बहुत ही कठिन है।

इन बच्चों को तीन श्रेणियों में बाँटा जाना चाहिए। (1) 5 वर्ष की आयु से कम आयु के बच्चों के लिए नर्सरी बना कर उन्हें आवास, भोजन, देखभाल, चिकित्सा, शिशुशिक्षा गृह (क्रचेज) आदि सुविधायें उपलब्ध करायी जायें। (2) 6 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शैल्टर होम्स बना कर उन्हें भी आवास, भोजन, देखभाल, चिकित्सा, सुविधा दी जायें और निकटतम जूनियर हाई स्कूल या प्राथमिक विद्यालय से सम्बद्ध कर दिया जाये, जिससे इनकी शिक्षा अवरुद्ध न हो। कक्षा 5 पास करने के बाद इन्हें नवोदय विद्यालयों में समायोजित कर दिया जाना चाहिए। (3) 12 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों, अगर उन्होंने कक्षा 5 पास कर लिया है, को सीधे नवोदय विद्यालयों समायोजित कर दिया जाना चाहिए। हमारे राज्य में दो प्रकार के नवोदय विद्यालय चल रहे हंै, एक केन्द्र सरकार द्वारा संचालित ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ और दूसरे राज्य सरकार द्वारा संचालित 13 नवोदय विद्यालय, जिनमें कुछ के नाम ‘राजीव गांधी नवोदय विद्यालय’ हैं और कुछ के ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी नवोदय विद्यालय’। मेरा सुझाव है कि विशेष परिस्थितियों के मद्देनजर शासनादेश जारी कर 12 से 18 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को राज्य सरकार द्वारा संचालित नवोदय विद्यालयों में समायोजित कर लिया जाये। इससे इन बच्चों को हॉस्टिल, भोजन, शिक्षण, लाईबे्ररी, स्पोर्ट्स आदि सुविधायें स्वतः ही उपलब्ध हो जायेंगी। गम्भीर परिस्थितियों में हमें कुछ विशेष समाधान तो ढूँढने ही होंगे।

यह उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार द्वारा संचालित लगभग प्रत्येक नवोदय विद्यालय में कुल स्वीकृत संख्या से कम ही छात्र संख्या है। प्रत्येक विद्यालय में औसतन 50 सीटें खाली चल रही हैं। अगर ऐसा समायोजन हो जाता है तो 12 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के कुल बच्चों के लगभग तीन चैथाई की शिक्षा की व्यवस्था आसानी से हो जायेगी। बाकी बचे बच्चों के लिए प्रत्येक नवोदय विद्यालय में थोड़ी और सीटों बढ़ाई जानी चाहिये। आपदा राहत के लिये मिलने वाली धनराशि के कारण इससे राज्य सरकार के सामने कोई बड़ी आर्थिक कठिनाई नहीं आने वाली।

उत्तराखण्ड बाल कल्याण परिषद भी इन आपदापीडि़त बच्चों की मदद के लिए अपने स्तर पर कुछ ठोस कार्य करना चाहती है। परिषद की महासचिव होने के नाते मैं परिषद के आजीवन सदस्यों और आम नागरिकों से भी यह विनम्र निवेदन करना चाहती हूँ कि मुक्त हाथ से कुछ धनराशि परिषद को दान देने की कृपा करें। दानदाता महानुभाव यदि अपने सुझाव भी देना चाहें कि इन बच्चों के हितार्थ परिषद द्वारा क्या कार्य किये जाने चाहिए तो उनका स्वागत है। परिषद को दिया गया दान धारा 80 (जी) के तहत आयकर से मुक्त भी है। यदि कोई विवेकशील व्यक्ति किसी अनाथ बच्चे को गोद लेना चाहें तो इसके लिए भी प्रयास किया जा सकता है। इच्छुक व्यक्ति अपना इच्छा पत्र परिषद को दे सकते हैं।

-पुष्पा मानस

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