‘धारा पाँच’ के चक्कर में फँसी श्रीनगर परियोजना

hydro-power-projects-in-uttarakhandवर्षाजनित आपदाओं को क्या प्रकृति के कोप के रूप में ही देखा-समझा जाना चाहिए या मनुष्य द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ का भी इस विभीषिका में कोई हाथ है ? उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद असीगंगा द्वारा मचाई तबाही हो या फिर श्रीनगर और उसके आसपास अलकनंदा के बढ़े जलस्तर से हुआ नुकसान, यहाँ तो नदियों से की गयी छेड़छाड़ ही विनाश का कारण रही।

25 जुलाई की रात को हुई भारी बारिश के बाद अलकनंदा का जलस्तर अचानक बढ़ने से श्रीनगर परियोजना की मशीनें और कुछ निजी वाहन डूब गए। बारह किमी. लंबी झील बन गयी और पानी धारी देवी मंदिर परिसर तक पहुँच गया। नदी ने राष्ट्रीय राजमार्ग-58 को भी अपने आगोश में ले लिया। फिर 4 अगस्त की रात को दुबारा इसका पानी बढ़ने पर धारी गाँव को कलियासौड़ से जोड़ने वाला पुल उफनती नदी की भेंट चढ़ गया। गहराई से देखें तो यही नतीजा निकलता है कि श्रीनगर और आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात अलकनंदा नदी पर जलविद्युत परियोजना बनाने वाली कंपनी जी.वी.के. और उसकी सहायक अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी द्वारा कायदे-कानूनों को ताक में रख किये जा रहे कार्य से पैदा हुए। नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद टिहरी और पौड़ी जिले का प्रशासन 25 जुलाई से लगातार कंपनी के अधिकारियों से बैराज के गेट खोलने की ‘गुहार’ लगाता रहा, लेकिन कंपनी ने पाँच में से तीन गेट नहीं खोले। दो गेट न खोलने के पीछे कंपनी की टावर क्रेन को बहने से बचाने का तर्क दिया गया। यानी, पूरे इलाके के लोगों के जानमाल से जी.वी.के. कंपनी की क्रेन ज्यादा महत्वपूर्ण थी! प्रशासनिक अधिकारियों ने भी स्वीकार किया कि विद्युत उत्पादन से पहले बैराज के गेट बंद करना कानूनन गलत है।

पेयजल व शिक्षा मंत्री और देवप्रयाग क्षेत्र के विधायक मंत्री प्रसाद नैथानी और कंपनी के अंध समर्थकों ने क्षेत्र में मची तबाही को भी कंपनी के पक्ष में भुनाने की कोशिश की। इनका कहना था कि केन्द्र सरकार ने परियोजना पर धारा पाँच लगायी हुई है, जिसके चलते जी.वी.के.कंपनी काम नहीं कर सकी और भारी तबाही हुई। यह ‘धारा पाँच’ आजकल परियोजना समर्थकों से लेकर अखबारों तक का पसंदीदा शब्द बना हुआ है। दरअसल यह पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 की धारा पाँच है, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार को किसी व्यक्ति, अधिकारी या प्राधिकरण को पर्यावरण के संरक्षण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देने का अधिकार है। इसी का प्रयोग करते हुए भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की निदेशक संचिता जिंदल द्वारा श्रीनगर जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रही जी.वी.के. कंपनी की सहायक कंपनी-अलकनंदा हाइड्रो पॉवर कंपनी को 30 जून 2011 को कहा गया कि धारी देवी की धार्मिक पवित्रता को कायम रखने के लिए कंपनी इनटैक, जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया तथा मंदिर समिति के साथ मिल कर एक नया प्लान तैयार करे। विभिन्न स्थानों पर मलबा निस्तारण, जिसके मामले में कंपनी का रिकार्ड बेहद खराब है, की समुचित व्यवस्था करे। आई.आई.टी.रुड़की से तैयार करवाई गयी मलबा प्रबंधन योजना की अनदेखी की जा रही है। 2008 से 2011 के बीच तीन कमेटियों द्वारा मलबा निस्तारण से सम्बंधित खामियों की ओर इशारा करने पर भी कंपनी के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। पत्र में कंपनी को निर्देशित किया गया था कि नदी के किनारे लगे मलबे के ढेर के चारों ओर इतनी ऊँची दीवार बनायी जाए कि पानी का बहाव बढ़ने पर भी मलबा नदी में न जाये। मलबे के 40-45 डिग्री की ऊँचाई वाले ढालों को 35 डिग्री तक समतल करने का निर्देश भी दिया गया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा कुल तेरह बिंदु सुझाये गये थे, जिनके अनुपालन न होने तक प्रोजेक्ट साईट पर निर्माण कार्य पर रोक लगाई गई थी।

मगर नियम-कायदों की धज्जियाँ उड़ाने में जी.वी.के. कंपनी को महारत हासिल है। कंपनी ने 27 जुलाई 2012 को उच्चतम न्यायालय को वचन देने के बाद भी धारा पाँच के अंतर्गत दिए गए इन निर्देशों का अनुपालन नहीं किया। कंपनी ने 30 जून 2011 को दिये गये इन निर्देशों की एक साल तक किसी को कानों-कान खबर नहीं होने दी और सामान्य दिनों की तरह अपना काम निर्बाध रूप से करती रही। एक वर्ष बाद जब ‘अमर उजाला’ में छपा कि श्रीनगर परियोजना को केंद्र सरकार बंद करने जा रही है और परियोजना समर्थकों ने शोरगुल मचाना शुरू किया, तभी यह भाँडा फूटा कि इस परियोजना पर तो पिछले एक वर्ष से रोक लगी है। जैसे ही कंपनी की पोल खुली तो उसने यह कहते हुए तत्काल सारे भुगतान रोक लिए कि उसके काम पर तो रोक लगी हुई है। वेतन देना और प्रभावितों के बच्चों के लिए लगायी गयी स्कूल बसें भी बंद कर दी गईं। इस तरह अपनी चोरी पकड़ी जाने को भी जी.वी.के. कंपनी ने अपने पक्ष में भुनाना शुरू कर दिया और ठेकेदारों और कार्मिकों पर दबाव बना दिया कि वे यह रोक हटाने के लिए मरने-मारने के लिये तैयार हो जायें। छुटभय्ये ठेकेदारों से लेकर मंत्री प्रसाद नैथानी और सांसद सतपाल महाराज तक ने धारा पाँच हटाने के लिए अभियान ही छेड़ दिया। बैराज के गेट बंद होने से आये दिन बाढ़ जैसे हालात बन रहे हैं और विद्वान सांसद और मंत्री महोदय इसका ठीकरा धारा पाँच के सर फोड़ रहे हैं। जबकि धारा पाँच हटाने का अर्थ है कि कंपनी को परियोजना का सारा मलबा नदी में डालने, पर्यावरण को दूषित करने और लोगों का जीवन संकट में डालने की कानूनन छूट दी जाए। हालाँकि इस वक्त भी कंपनी द्वारा मलबा नदी में ही डाला जा रहा है। एक अदना सा परियोजना का ठेकेदार खुलेआम भारत सरकार के निर्देशों की अवहेलना कर रहा है। उक्त पत्र में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा परियोजना पर निगरानी के लिए एक कमेटी बनाने की भी बात थी। क्या ऐसी कोई कमेटी बनी ? अगर हाँ तो उस कमेटी ने काम रोकने की कोशिश क्यों नहीं की ? अगर नहीं बनी तो क्यों नहीं बनी ?

पौड़ी और टिहरी जिले के जिलाधिकारी व प्रशासनिक अधिकारी जी.वी.के. कंपनी से बैराज के गेट खोलने के लिए कभी अनुनय-विनय की मुद्रा में नजर आ रहे हैं तो कभी कड़क भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। पर कंपनी के लिए इसकी अहमियत गीदड़ भभकी से ज्यादा की नहीं है। जो प्रसन्ना रेड्डी भारत सरकार के आदेशों का उल्लंघन कर सकता है, उसके लिए डी.एम., एस.डी.एम. क्या हैं ? इन लोगों की समझ में तो ये सामान्य सी बात भी नहीं आ रही है कि जब निर्माण पर एक वर्ष से रोक थी तो ये बैराज और उसके गेट कहाँ से आ गए ? ये बैराज और गेट तो हैं ही अवैध।

इस परियोजना के कॉफर डैम टूटने के बाद हुई जाँच में पाया गया था कि कंपनी घटिया निर्माण सामग्री का प्रयोग कर रही है। डिजाइन में भी खामी पायी गयी। उसे अवैध खनन से करोड़ों रुपये के उपखनिजों की चोरी का दोषी पाया गया था। लेकिन उस समय भी गुण्डों की फौज और भाजपा-कांग्रेस के मंत्री-सांसदों की करामात के चलते कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई।

श्रीनगर परियोजना के समर्थकों का कहना है कि अब चूँकि इस परियोजना का सत्तर प्रतिशत काम हो चुका है, इसलिए इसे रोका नहीं जाना चाहिए। हालाँकि कितना काम हो चुका है, इसके भी अलग-अलग दावे हैं। सांसद सतपाल महाराज तो नब्बे प्रतिशत काम हो चुकने का दावा करते हैं। 2008, 2009 और 2010 में तीन बार तो परियोजना का कॉफर डैम बहा। 2010 में निशंक सरकार ने परियोजना के काम पर रोक लगायी। 2011 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इसके काम पर प्रतिबन्ध लगा दिया। तो यह सत्तर-अस्सी-नब्बे प्रतिशत काम हुआ कब ? क्या किसी भी परियोजना वाले को इस तर्क पर कि काफी काम हो चुका है, लोगों का जीवन संकट में डालने की छूट दी जानी चाहिए ? ये तो सही बात है कि जिस तरह से इस पूरे इलाके को खोद दिया गया है, ऐसे में इस मुकाम पर काम रुकना भी नए तरह का संकट पैदा करेगा और परियोजना बंद करने का निर्णय लेते समय पहले इस क्षेत्र की सुरक्षा की वैकल्पिक योजना क्रियान्वित होनी चाहिए। परन्तु परियोजना बननी चाहिए और परियोजना प्रसन्ना रेड्डी की ही कंपनी को ही बनानी चाहिए, ये भी दो अलग-अलग बातें हैं। जो श्रीनगर परियोजना को लेकर उत्तराखंड के हितों की दुहाई दे रहे हैं, वे या तो वास्तविक तथ्यों को जानते नहीं हैं या फिर अपने क्षुद्र स्वार्थों के चलते पैदा हुए रेड्डी प्रेम के कारण लोगों को अँधेरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं। 2002 की ऊर्जा नीति के हिसाब से परियोजना निर्माता कंपनी को ही इससे बनने वाली बिजली का 88 प्रतिशत बिजली बेचने का अधिकार अगले पैंतालीस साल तक होगा और बारह प्रतिशत बिजली वो उत्तराखंड सरकार को मुफ्त देगा। 330 मेगावाट की श्रीनगर परियोजना में उत्तराखंड को मिलेगी मात्र 39.60 मेगावाट और चाँदी काटेगा प्रसन्ना रेड्डी। तो क्या यही है वो उत्तराखंड का हित जिसके लिए परियोजना समर्थक मरने-मारने पर उतारू हैं ?

जी.वी.के. कंपनी सरकार को ब्लैकमेल करके अपने काम पर लगी रोक हटवाना चाहती है। इस ब्लैकमेल के पीछे यह धमकी भी है कि भविष्य में उसकी मनमर्जी न चली तो वह इस क्षेत्र में बाढ़ जैसे हालात पैदा करने में नहीं हिचकेगी। श्रीनगर क्षेत्र के मुहाने पर बाँध के रूप में एक ऐसा बम रख दिया गया है, जिसका रिमोट कंट्रोल जी.वी.के.कंपनी के हाथ में होगा!

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