फलों से हुई इस बार देबीधुरा की बग्वाल

Bagwalचम्पावत जिले के देवीधुरा में होने वाली ‘बग्वाल’ (पत्थर युद्ध ) इस बार पत्थर से नहीं बल्कि स्थानीय फलों से खेली गई। युद्ध में भाग लेने वाले योद्धाओं ने पाषाण युद्ध में बहने वाले रक्त की जगह रक्तदान कर केदारनाथ आपदा के घायलों के लिए भेजा। देवीधूरा के माँ बाराही के मंदिर में प्रति वर्ष रक्षा बंधन के पर्व पर बग्वाल होती है। पाँच से बीस मिनट तक चलने वाले इस पाषाण युद्ध को देखने के लिए देश भर से दर्शक और श्रद्धालु यहाँ पहुँचते है। परंपरा के अनुसार मंदिर परिसर में चार खामों और सात थोकों के योद्धा गाजे-बाजे के साथ युद्ध में भाग लेने पहुँचते हैं, जो बाराही माँ की पूजा और परिक्रमा करने के बाद मैदान में उतरते है और एक-दूसरे पर पथराव कर लहूलुहान कर देते हैं। मान्यता के अनुसार ये लड़ाई तब तक चलती है, जब तक एक व्यक्ति के शरीर में होने वाले खून के बराबर खून नहीं निकल जाता। मगर इस पथराव में आज तक किसी योद्धा की जान नहीं गई। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को इस वर्ष न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन की कोशिशों से बदला गया। चम्पावत के जिलाधिकारी दीपेश चौधरी ने मुस्तैदी से आम सहमति बनाई और बग्वाल पत्थर से न होकर स्थानीय नाशपतियों से खेली गई। इस कारण न तो किसी योद्धा को चोट लगी, न रक्तस्राव जैसा नुकसान हुआ। मंदिर प्रशासन के पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने रक्तदान शिविर का आयोजन कर इन रणबाँकुरों का रक्त जमा कर केदारनाथ हादसे में घायलों की मदद के लिए भेजा है। ऐसा नहीं कि यह प्राचीन परम्परा बदलने से सभी संतुष्ट हों। रामनगर निवासी आनंद सिंह नेगी जैसे अनेक लोगों ने मंडल भर से देवीधुरा पहुँच कर इस परंपरा को बदलने का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने योद्धाओं को उकसाने की भी कोशिश की। उनका कहना था कि देवभूमि की परम्पराओं में बदलाव ही केदारनाथ जैसी आपदायें पैदा कर रहा है। मगर भारी पुलिस बल की मौजूदगी से यह नई परम्परा स्थापित करने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई।

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