3 Responses

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    संतोष मिश्र February 11, 2011 at 4:33 PM |

    बहुत ख़ूब ….उप्रेती जी, आपकी शैली —- कार्यशैली का कायल हूँ ….
    लिख रहा हूँ क्योंकि मैं भी घायल हूँ …
    लगातार 14 वर्षों की स्याल्दे – सेवा …..हर वर्ष कागज़ का एक पन्ना -“प्रपत्र” रँगने के बावजूद ….कोई सुनवाई ना होने पर ….थक – हार कर आख़िरकार माननीय उच्च न्यायालय की शरण में हूँ …इस स्थानांतरण “अनीति” के खिलाफ ….वैसे स्याल्दे मेरे बौद्धिक चिंतन के विस्तार में सहयोगी की भूमिका में है ….लेकिन अन्याय – सहन कब तक करूँ …आख़िर मेरे भी बीवी -बच्चे हैं – ????

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    prabhat upreti February 21, 2011 at 7:08 PM |

    बंधू
    लडाई तो लडनी ही पडेगी आप लड रहे है बहुत बढिया… वरना हमारे उच्च शिक्षा के सफेद हाथी हमारे साथी तो आराम की नींद सो रहे है उन्हे पता नही किसका इंतेजार है…

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    संतोष मिश्र August 22, 2011 at 8:32 AM |

    आख़िरकार आपकी मुहिम रंग लायी …..
    दो खम्भों के जर्जर होने पर भी आम आदमी के सपनों की इमारत धराशायी नहीं हुई …..
    क्योंकि तीसरा खम्भे (न्यायपालिका) और चौथे आप …..ने सहारा दिया ….
    स्थानांतरण “अनीति” पर माननीय उच्च न्यायालय की फ़टकार
    आपको – आपके सार्थक प्रयास को सलाम…..
    जय हो ….
    डॉ.सन्तोष मिश्र
    स्याल्दे

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