चुनावों के बाद कहाँ जायें उत्तराखण्ड के स्थानीय दल ?


विनोद पांडे
विधान सभा चुनावों में भाजपा को इकतरफा बहुमत मिल चुका है। आशा से भी अधिक। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों की देश भर में चर्चा है। इसके दूरगामी परिणाम होने की उम्मीदें जतायी जा रही हैं। कइयों ने तो इसे 2019 के लोकसभा चुनावों का मार्ग प्रशस्त होना तक बता दिया है। इससे राज्यसभा में धीरे-धीरे भाजपा के सदस्यों की संख्या बढ़ेगी, जिससे केन्द्र की एन.डी.ए. सरकार के लिए कॉरपोरेट जगत के हित में आर्थिक व श्रम सुधारों को लागू करना आसान हो जायेगा। इसलिए इन चुनावांे से सबसे अधिक खुश उद्योग जगत है, जिसे आजकल कॉरपोरेट कहा जाता है। यही परिलक्षित हुआ चुनाव परिणामों के बाद 14 मार्च को शेयर मार्केट में, जिसमें कई विपरीत संकेत होने के बाद भी 9119 अंकों की ऐतिहासिक ऊँचाई भी छू ली।
चुनाव परिणामों के बाद भाजपा ने नरेन्द्र मोदी का अपने राष्ट्रीय कार्यालय में एक महानायक की तरह स्वागत किया। मोदी ने अपने सम्बोधन में देश के गरीबों के लिए काम करने का वादा किया। इन शब्दों के उपहार से देश के गरीब और सामान्य जन खुश हुए हांेगे। मीडिया चारों ओर की खुशियाँ दिखाने में व्यस्त है। निस्संदेह मोदी सरकार ने उद्योग जगत के लिए बहुत कुछ कर दिया है। पर अब तक, यानी करीब पौने तीन साल में मोदी सरकार ने गरीबों के लिए या जन सामान्य के लिए क्या किया है, इसका उत्तर स्वयं मोदी के पास तक नहीं है। वे अपने भाषणों में जन-धन योजना, शौचालय, डाइरेक्ट बैनिफिट योजना (गैस सिलिंडर) और नोट बंदी का जिक्र करते हैं। पर बैंक में मात्र खाता खुलने से ही कैसे आमदनी बढ़ जाती है, यह रहस्य केवल मोदी ही जानते होंगे। इसी तरह शौचालय बनने की जो प्रक्रिया करीब-करीब 2 साल पहले शुरू हुई थी, उसकी सफलता पर कई प्रश्नचिन्ह भी लगे हैं। अन्य योजनाएँ भी निर्विवाद नहीं हैं। पर मोदी और उनकी पार्टी यह प्रभाव पैदा करने में सफल रही ये योजनाएँ क्रांतिकारी हैं और इनसे गरीबों का लाभ हुआ है।
इन अप्रत्याशित परिणामों के आधार पर यह भी कहा जा रहा है कि उ.प्र., जो कि जातिवादी समीकरणों के लिए बदनाम है, ने इस बार जातीय व धार्मिक समीकरणों को तोड़ दिया है, जिससे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी लहूलुहान है। शायद वे अभी तक यह सोचने की स्थिति में भी नहीं आ पाये होंगे कि अब आगे कैसे करें ? इसीलिए मायावती ने चुनाव परिणामों के तुरंत बाद यह बयान दे दिया कि अगर मुस्लिम बहुल इलाकेां से भी भाजपा जीत गई, तो इस असंभव सफलता के पीछे ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ ही एकमात्र कारण है। इस अंतहीन बहस में न घुसकर केवल इतना तो कहा ही जा सकता है या तो मुस्लिम वोटरों ने भाजपा को अपना लिया है या फिर मायावती की बातों को गंभीरता से लेना चाहिये। दोनों में से एक बात सच व एक बात निराधार है।
इसी तरह जातीय समीकरणों के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि या तो भाजपा ने जातीय समीकरणों को तोड़ दिया है या इन समीकरणों को अपने पक्ष में कर लिया है। फिर एक बार इन दोनों में से एक तथ्य सच है। भाजपा ने उ.प्र. में अपना अध्यक्ष एक ब्राह्मण को हटा कर अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को बनाया। उसने दरअसल ओबीसी के अंदर यादव बनाम गैर यादव के अंतर्विरोध को पहचाना व सींचा, जिसके अंर्तगत प्रदेश में पिछले 2 सालों में 250 से अधिक जातीय सम्मेलन किये। उनके कद्दावर नेताओं को प्रमुखता दी। इसी तरह दलितों के मध्य गैर जाटव और जाटवों के बीच के अंतर्विरोध को भी पहचाना और अपने पक्ष में किया। मुसलमान के लिए ट्रिपल तलाक को उछाला व कहा गया कि इससे मुसलमान महिलाएँ भाजपा के पक्ष में आ रही हैं। पर वास्तव मंे इसका निशाना हिंदुओें पर यह प्रभाव डालना था कि देखो कैसे हम मुसलमानों पर तंज कर रहे हैं। बची-खुची कसर बहुचर्चित श्मशान और कब्रिस्तान वाले भाषण से पूरी हुई, जिसे मोदी ने तो एक बार कहा पर मीडिया ने हजारों बार दुहराया। इसे अब आप जातीय समीकरणों का टूटना कहें या कि बदलना ये निर्णय आप स्वयं कर सकते हैं।
इन चुनावों की सफलता के लिए जमीनी स्तर पर भाजपा ने कड़ी मेहनत की। एक ओर बड़े स्तर पर नेहरू-गांधी परिवार को 70 सालों की बदहाली के लिए कोसना जारी रखा, दूसरी ओर देश के हितों के लिए सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी को तमाम विवादों के बाद सफलतापूर्वक पेश किया। जहाँ सर्जिकल स्ट्राइक ने यह प्रभाव पैदा किया कि मोदी पाकिस्तान के घर में घुसकर उसे बर्बाद कर सकता है, वहीं नोटबंदी से यह प्रभाव पैदा किया गया कि मोदी ने अमीरों की तिजोरियाँ खाली करवा दीं। ये पैसा अब सरकार के पास है और इसका जनता के हितों के लिए उपयोग किया जायेगा। ये तीनों मुद्दे सोशल मीडिया के लिए कभी न खत्म होने वाली खाद साबित हुए और जबर्दस्त ढंग से छा गये। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यदि देश मे हिंदू बहुसंख्यक हैं तो गरीब भी बहुसंख्यक हैं। दोनों को प्रभावित कर बहुसंख्य वोट हासिल किये जा सकते हैं। दोनों वर्गों में सबसे बड़ी समानता यह है कि दोनों वर्ग बहुत हद तक एक ही हैं और उनको भावनाओं से उद्वेलित किया जा सकता है। भाजपा ने इस सत्य को पहचाना और
सफलतापूर्वक अपनाया।
भाजपा ने एक कुशल व्यापारी की तरह अपने लक्षित मतदाताओं को पहचाना। व्यापारी जानता है कि उसे अपना उत्पाद किस वर्ग को किस कीमत पर व कब बेचना है व कौन उसके प्रतिबद्ध ग्राहक हैं। वह अपने प्रतिद्वंद्वियों की कमजोरियांे को भी जानता है और उसी तरह अपने उत्पादों को बाजार में पहुँचाता है। वह जितनी कुशलता से प्रबंधन करता है उतना ही सफल व्यापार कर पाता है। भाजपा ने अपने मतदाताओं को पहचाना, उन पर सारा ध्यान केन्द्रित किया। यह कुशल प्रबंधन का एक शानदार उदाहरण था। नैतिक कितना था, यह दीगर सवाल है। राजनीति में चुनावी सफलता नैतिकता-अनैतिकता को धो डालती है।
पर हमें बात तो उत्तराखण्ड की करनी थी। यहाँ तो कहा जाता है कि जाति और धार्मिक समीकरण काम नहीं करते हैं। आखिर भाजपा को यहाँ कैसे इतनी इतनी बड़ी सफलता मिली ? इसके मूल में यह तथ्य हो सकता है कि उत्तराखण्ड एक सवर्ण बहुल प्रदेश है। सवर्ण विभिन्न वर्गों के तथाकथित तुष्टीकरण से सबसे अधिक त्रस्त हैं। मोदी इस तुष्टीकरण के सबसे बड़े विरोधी के रूप में प्रदर्शित किये गये हैं। भाजपा को उत्तराखण्ड में कहीं न कहीं ताकत मिली है भाजपा के बड़े-बड़े देशभक्ति के भाव प्रदर्शन और 70 साल का भ्रष्टाचार, हिन्दुत्व के प्रति वाक्पटुता और निश्चित रूप से हरीश रावत की सरकार की भ्रष्टाचार की खबरों और सबसे उपर मोदी-उपासना से। मोदी की जिस प्रकार की छवि बनी है और स्वयं मोदी जिसे पूरी तरह अपने भाषणों के माध्यम से प्रकट करते हैं, उससे जनता के बहुत बड़े हिस्से में यह आशा है कि मोदी देश-प्रदेश को सारी कठिनाइयों से पार लगाने की जादुई क्षमता रखते हैं। किसी नेता के प्रति ऐसा विश्वास कोई नयी बात नहीं है, क्योंकि हम ऐसा इंदिरा गांधी को 70 के दशक में, जनता पार्टी को 1977 में, राजीव गांधी को 1984 में और विश्वनाथ प्रताप सिंह को 1989 के दौर में देख चुके हैं। पर इन सबसे भिन्न बात भाजपा के पक्ष में यह जाती है कि वर्तमान भाजपा अत्यधिक पेशेवर तरीके से प्रबंधित राजनीतिक दल है और उसकी हिंदुत्व के हितों की रक्षक के रूप में पहचान है। अतः यह लोकप्रियता कुछ लंबे समय तक चल सकती है। इसे खतरा तब होगा जब कॉरपोरेटों केा लगेगा कि अब मोदी से अधिक नहीं करवाया जा सकता है या मोदी से कोई बड़ा बड़बोला नेता उभर आये। जब यह तिलिस्म टूटेगा तो उसका स्वाभाविक लाभ कांग्रेस को भी मिलेगा। यानी सत्ता इन दो दलों के बीच ही डोलती रहेगी।
तो क्या उत्तराखण्ड इन दो दलों के
बीच में ऐसे ही झूलते रहेगा और हमारे स्थानीय दल हाशिये पर ही पर ही रहेंगे ? हमारे स्थानीय दलों में ऐसे नेताओं की भरमार है, जिन्होंने अपना जीवन उत्तराखण्ड की बेहतरी के आंदोलनों को समर्पित किया है। ये लोग किसी जमाने में चुनावी राजनीति से परहेज करते थे। लेकिन इन्होंने बहुत देर में यह पाया कि बिना राजनीतिक हस्तक्षेप या ताकत के सामाजिक कार्य नहीं किये जा सकते हैं। देर सबेर सभी दल किसी न किसी रूप में चुनाव में हिस्सेदारी करने लगे हैं। पर मुख्य राजनीतिक दलों की बुराइयों से मुक्त रह कर स्वच्छ राजनीति करने के प्रयास में ये दल जीतना बहुत दूर, कुल मतदान का 2-3 प्रतिशत भी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए स्थिति यह बनी है कि इस चुनाव में प्रदेश के सारे स्थानीय दलों के प्रत्याशियों के कुल मत जोड़ भी दिये जायंे तो एक टोटकेबाज निर्दलीय प्रत्याशी द्वारा प्राप्त मतों के बराबर भी नहीं बैठेंगे। तो प्र्श्न यही उठता है कि क्या इन दलों को वोट की राजनीति को अलविदा कह देना चाहिये ? यह प्रश्न शाश्वत रूप में खड़ा है। ये सभी संघर्षशील व्यक्ति हैं, जो आगे भी सामाजिक सरोकारों के लिए आगे भी आंदोलन करते रहंेगे। पर यह भी सत्य है कि बिना राजनीतिक दखल के आंदोलनों की सफलता कठिन होती है। अतः इन सभी दलों के नेताओं के लिए यह एक निर्णायक क्षण है कि वे आगे के लिए व्यावहारिक रणनीति तय करें। उन्हें तय करना ही होगा कि पहले की तरह आगे भी मात्र औपचारिकता के लिए चुनाव लड़ते रहें या अपने कार्यशैली को बदल कर अपने सीमित संसाधनों और आंदोलनों के अनुभव का पूरी तरह उपयोग करते हुए न केवल विधान सभा या लोकसभा के चुनाव लड़ें, बल्कि ग्राम सभा और स्थानीय निकायों के स्तर से जनता से जुड़कर चुनाव जीतना सीखें।
इन दलों को कुछ न कुछ तो करना ही होगा। अन्यथा उत्तराखण्ड में चाहे वनों का प्रश्न हो या जल और जमीन का, पलायन का हो या रोजगार का, खेती का हो या जंगली जानवरों की समस्या का, शिक्षा व स्वास्थ्य के व्यवसायीकरण का हो या शहरों से लेकर दूरदराज तक बन चुकी शिक्षक रहित सरकारी स्कूल कॉलेजों की इमारतों या चिकित्सक रहित सरकारी अस्पतालों का, ये समस्यायें केवल यहाँ के स्थानीय दलों के ऐजंेडे में ही रह जायेंगी। वे सिर्फ इनके लिए आंदोलन ही करते चले जायेंगे। इसलिए यह न केवल इन दलों, बल्कि पूरे उत्तराखण्ड के हित में है कि ये पूर्ण आत्मचिंतन करें, आपसी सहयोग करें ताकि उत्तराखण्ड मंे एक वैकल्पिक राजनीति की शुरूआत हो और राष्ट्रीय दलों के भ्रष्टाचार युक्त अदला-बदली वाली राजनीति से प्रदेश को मुक्ति दिलायी जा सके। जिन सपनों के लिए उत्तराखण्ड का गठन हुआ था उन्हें प्राप्त किया जा सके।

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