चिट्ठी पत्री

चिठ्ठी पत्री
15 मई 2016 के अंक में गजेन्द्र नौटियाल का आलेख (सस्ता जहर, सुस्त जहर, खाने का कहर) मुझे प्रतिक्रिया देने को विवश कर गया। ‘बड़ी नाक, दावानल आग’ हर उस पहाड़वासी के दर्द को बयाँ करता है जो हर साल जेठ में धू-धू कर अपने जंगल को निःसहाय जलता देखता है। जंगल की आग बुझाने के परम्परागत तरीके आज के समय में नाकाफी हैं। बल्कि कभी-कभी तो हास्यास्पद लगते हैं। जंगल की आग हर वर्ष जैवविविधता को कितना भारी नुकसान पहुँचाती है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। पहाड़ में बनने वाले छोटे-बड़े     बाँधों के जलाशय बनने से बाघ अपने मूल स्थान से विस्थापित हुए हैं और भूख ने उन्हें आवादी की ओर जाने पर विवश किया है। पहले पहल बाघ, गुलदार वहाँ बकरी, कुत्तों को अपना निवाला बनाते थे। फिर उन्होंने गाय, बछिया, भैंसों, खच्चर जैसे बड़े जीवों को खाना शुरू कर दिया और आहार श्रृंखला की सबसे समृद्ध कड़ी मनुष्य भी अब जंगली जीवों के निशाने पर आ गया है। जिम्मेदार कौन? सब जानते हैं मगर मनुष्य ऐसी जात है, जो अपना ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ देता है, जिसमें अब उसे महारथ हासिल है।
गंगा सिंह रावत
हल्द्वानी

 

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