चिट्ठी-पत्री

स्वामी विवेकानन्द पर डाॅ. शमशेर सिंह बिष्ट जी के द्वारा लिखा आलेख आप द्वारा नैनीताल समाचार के 1 सितम्बर प्रथम अंक में प्रकाशित किये जाने पर मैं आपको हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। इस माध्यम से आपके पत्र से भी मेरा परिचय हुआ जो मुझे काफी अच्छा लगा। मैं अपनी एक रचना व वार्षिक सहयोग राशि भेज रहा हूँ। आशा करता हूँ आगे भी आपसे निरंतर सहयोग होता रहेगा।
मोहन सिंह मनराल
सुरईखेत, जिला अल्मोड़ा

कुछ दिन पहले मैंने डाक द्वारा ‘नैनीताल समाचार’ का ‘अड़तीसवाँ जनमबार अंक’ प्राप्त किया, उसमें अनेक प्रेरणात्मक लेख थे। मैं कम से कम उस जमाने का पाठक हूँ जिसको आज तक भी असली अखबार को हाथ में लेकर, ध्यानपूर्वक पढ़ने का शौक है। मैं शाम के वक्त बाहर के बरामदे में ठंडी हवा में बैठ कर आराम से एक-एक लेख पढ़ता हूँ। आपने ‘हमारा कालम’ में अनेक महत्वपूर्ण बातें उर्ठाइं। तैंतालीस वर्ष पहले लन्दन में उसी बहस की खूब याद है कि फलाँ चीज में श्रम को कम कर ‘कुछ अतिरिक्त समय उपलब्ध करायेगी।’ तब भी मैंने सवाल उठाया कि उस तथाकथित अतिरिक्त समय का इस्तेमाल कैसे होगा ? आज भी यह सवाल मेरे मन में है। औद्योगिक क्रांति से लेकर आज तक अगणित प्रौद्योगिकी आविष्कार हुए। परन्तु मुझे चिन्ता है कि वह समय दूर नहीं होगा जब मोबाइल रखना कानूनी तौर पर अनिवार्य हो जायेगा। अभी तक मैं मोबाइल से दूर रहा हूँ। अड़सठ वर्ष की आयु तक बिना मोबाइल जीवन ठीक चल रहा है।
कैलाश पपनै ने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये, आधुनिक टैक्नोलाॅजी को अपनाने और इस्तेमाल करने के संदर्भ में। किसी नई टैक्नोलाॅजी के आने पर कभी सामाजिक बहस नहीं होती। हम आँखें बन्द करके हर नये यंत्र को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। परन्तु कभी गहराई से उसके दीर्घ परिणामों पर विचार-विमर्श नहीं करते हैं। यह भी एक गलतफहमी है कि बहुत सारी नई सुविधाएँ मुफ्त हैं, जैसे ईमेल। एक ईमेल भेजने से पहले मुझेे कम्प्यूटर रखने में कितने हजारों रुपए का निवेश करना और थोड़े समय के बाद इसके स्थान पर एक नया कम्प्यूटर खरीदना और इसके अलावा बिजली की भी जरूरत है। परन्मु एक पत्र लिखने के लिए मुझे सिर्फ थोड़ा कागज, लिफाफा और कलम की जरूरत है।
इस आधुनिकता की दौड़ में ग्राम गणराज्य की परिकल्पना का स्थान कहाँ है ? मोबाइल ऐसा साधन बन गया है कि जाने-अनजाने हम सब उसी भूमण्डलीकरण के जाल में फँस जाते हैं। जितने भी आजकल के अति आधुनिक खिलौने हैं, ये सब उसी काॅरपोरेट साम्राज्यवाद एवं बाजारवाद की देन हैं, जिसका जाल गाँव-गाँव के हरेक परिवार तक फैला है।
‘1968-69 के वे दिन’ को पढ़कर उन दिनों की ताजी याद आई जब मैंने पहली बार वर्ष 1969-70 में एक नौजवान विदेशी घुमक्कड़ के रूप में भारत में भ्रमण किया। मैंने एक बार को छोड़ कर कभी रेलगाड़ी का आरक्षण नहीं किया। मैं लाईन में खड़ा होकर तीसरी श्रेणी के जनरल डिब्बे का टिकट खरीदता था। उस जमाने में एक दिन में दस रुपये खर्च करना मुश्किल था। चाय का मूल्य 25 पैसे होता था। कहीं फास्ट फूड नहीं बिकता था, परन्तु फल आसानी से मिलता था। केले का भाव एक रुपया प्रति दर्जन, जबकि संतरे का भाव एक रुपया प्रति संतरे का रस। तब लम्बी रेल यात्रा में दर्जन के हिसाब से केले खाता था। यह सच है कि उस जमाने में ‘ट्रांजिस्टर’ एक फैशन एवं सभ्य होने का प्रतीक था। मुझको ऐसे दृश्यों की ताजी याद है जब मध्यवर्गीय पर्यटक अपने-अपने ट्रांजिस्टर लेकर घूमते थे।
मैं ने बहुत लिखा, परन्तु कलम नीचे रखने में पहले में इतना आश्वासन दूँगा कि मैं लगातार नैनीताल समाचार के ताजा अंक की प्रतीक्षा करता हूँ।
डेविड भाई
कौसानी, अल्मोड़ा

 

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