चिट्ठी -पत्री

प्रिय राजीव,

नैनीताल समाचार का अड़तीसवाँ जनमबार अंक मिला। इसके उनतालीसवें वर्ष में प्रवेश करने पर इसे और नैनीताल समाचार परिवार को ढेर सारी बधाइयाँ। इसके लम्बे, सफल और उद्देश्यपूूर्ण जीवन की कामना करता हूँ। जहाँ यह अंक देख कर हर्ष हुआ वहीं तुम्हारा ’हमारा कालम’ पढ़ कर मुझे अपने ऊपर बडी ग्लानि भी इस कारण हुई कि कितनी छोटी सी अपेक्षा यह समाचार पत्र हमसे करता हैं और इसके प्रथम वर्ष के प्रथम अंक से लेकर वर्तमान अंक तक इसे बराबर मँगाते-पढ़ते और समझते हुए भी इसे कुछ लिख नहीं पाया। मुझे याद आ रहा है कि आरम्भ के कुछ अंकों में एक-दो हल्के फुल्के लेख लिख दिये थे। समाचार पत्र की उपादेयता, उपयोगिता और इसके चलते रहने की आवश्यकता को भली-भाँति समझते हुए भी मैं इसे व्यक्त नहीं कर पाया। समाचार पत्र इसे इतनी गम्भीरता से लेता है, इसका अनुमान मैं अवश्य नही कर पाया। इसे मैं अपना दोष समझता हूूँ। इतने वर्षो तक चुप रहने के अपराध के लिये क्षमा याचना करता हूँ।
यह सही है कि कुछ नयी तकनीकों ने लिखने, समाचारांे और विचारांे के आदान-प्रदान को बहुत कम कर दिया है। मैं स्वतः देखता हूँ कि पहले एक-दो सप्ताह में जितने पत्रादि लिख भेजता था, उतने अब साल भर मैं भी नहीं भेज पाता। मजे की बात यह है कि कोई इसका बुरा भी नहीं मान रहा। अब तो जो लिखता हूँ वह पुरानी आदत के दबाव में कुछ विभागों को कुछ परिस्थितियों के बारे में अवगत करने को लिखता हूूँ, जिनका संज्ञान कोई विभाग लेता भी है या नहीं, नहीं मालूम। जवाब तो कुछ मिलता नहीं है।
कई वर्ष पहले काशीपुर से समाजवादी श्री रामदत्त जोशी ’बिगुल’ नाम से एक साप्ताहिक निकालते थे। यह पत्र समाजवादियों का एक प्रकार से मुखपत्र था। लेकिन कुछ सामयिक समाचारांे का प्रकटन भी इसमें होता था। मैं इस पत्र से समबद्ध था और नैनीताल से इसका प्रतिनिधि भी था। इस कारण मुझे ज्ञात है कि समाचार पत्रांे को चलाना कितना कठिन एवं कष्टसाध्य है। यह भी विशेषकर उन पत्रों के लिये जो किसी वैचारिक आधार पर यथास्थ्तिि को बदलने के लिये संकल्पित हैं। जिन लोगांे के हितों की बात वह पत्र करता था, उनकी हैसियत पत्र की मदद, विशेष रूप से आर्थिक, करने की नहीं होती थी और जिनकी क्षमता मदद करने की होती थी वह दूसरे ध्रुव में होते थे, जिनमें सरकार भी शामिल थी। श्री जोशी की पत्नी ने मुझे एक बार बताया था कि उनकी बची-खुची जमीन से जो फसल वह पैदा करती हैं, उसका भी एक हिस्सा इसी अखबार की शरण में चला जाता है। श्री जोशी पत्र के जुझारूपन के लिये कोई भी कीमत देने को तैयार थे। वे जब तक जीवित रहे, वह अखबार चलता रहा। उनके साथ ही अखबार का भी अवसान हो गया था। काशीपुर की एक गली में ‘जिन्दगी की शाम हो गयी’।
इसी भाँति कई वर्ष पूर्व अपने संघर्षशील जीवन के आरंभ के वर्षो में स्व. बिपिन त्रिपाठी (भू. पू. एम.एल.ए. एवं यूू.के.डी.) अध्यक्ष ने द्वाराहाट से ‘द्रोणांचल प्रहरी’ नामक एक पत्र निकाला। तब वह किसी दल में नहीं थे। इस क्षेत्र के समाचारांे को उजागर करना और क्षेत्रीय हितों के लिये लड़ना यही उनका और उनके पत्र का उद्देश्य था। उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने अल्मोड़ा जिले के चीड़ के पेड़ों को ‘ट्विस्टेड चीड़’ के नाम पर सहारनपुर की एक कागज की फैक्टी को नाममात्र की कीमत पर दे दिया था। टिवस्टेड चीड़ के नाम पर खासे चीड़ के पेड़ मिल और वन विभाग के कर्मचारियांे की मिलीभगत से काटे जा रहे थे और इनका व्यापार भी हो रहा था। मिल के मालिक कांगे्रस के बडे़ नेता श्री चन्द्रभानु गुप्ता के निकट मित्रांे में समझे जाते थे। यह चर्चा का विषय बना हुआ था। बिपिन ने अपने पत्र के माध्यम से इस लूूट के विरुद्ध जिहाद छेड दिया था। इसके जवाब में मिल मालिकों की शिकायत पर समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार ने बिपिन को उसके समाचार पत्र का पंजीकरण खारिज करने के लिये ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर दिया। तब मैं भी सार्वजिनक हितों की रक्षा की चेष्टा अपनी सीमाआंे के अन्दर करता था। बिपिन मेरे पास अपनी समस्या लेकर आया। हमने नोटिस का जवाब बनाया और समर्थन के कागजात इकठ्ठा किये। कानूनी पक्ष की तैयारी की और मिल मालिक तथा सरकार की मिलीभगत और सार्वजनिक नुकसान को उजागर करने की सामग्री भी एकत्रित की। हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि मामले की पैरवी के लिये बार-बार उतनी दूर जाना बड़ी दिक्कततलब बात थी। मेरे लिये तो असम्भव ही था। इस मोर्चे पर यह बिलकुल असमान लड़ाई थी। लेकिन बिपिन के जुझारूपन के कारण रजिस्ट्रार को मिल मालिक की शिकायत को खारिज कर बिपिन के अखबार के रजिस्ट्रेशन को कायम रखना पड़ा।
लेकिन हमें अफसोस इस बात का रहा कि हमारे द्वारा मिल मालिक और सरकार की मिलीभगत तथा सार्वजनिक नुकसान के जिन तथ्यों को निर्विवाद रूप से पूूर्णरूपेण प्रस्तुत कर दिया गया था, उनके बारे में रजिस्ट्रार ने कोई रियायत नहीं की। अपने निर्णय को रजिस्ट्रेशन बहाल रखने तक ही सीमित रखा। इन ट्टष्टान्तांे को उद्धृत करने का मेरा केवल यही मकसद है कि अलख जगाने वाली ऐसी उद्देश्यपरक पत्रकारिता इस और अनेक भाँति की कठिनाइयों को झेलने के लिये अभिशप्त होती है। लेकिन सामाजिक जागरूकता ऐसे ही पत्रांे से आती है, उनसे नहीं जो 20 पेज में से 12 पेज एडवर्टाइजमेन्टस् में और बाकी 6 पेज सरकार एवं उससे सम्बद्ध लोगांे की स्तुति में रंगते है।
जहाँ तक ‘नैनीताल समाचार’ का प्रश्न है, मैं तो इसे आरंभ से पढ़ता तथा समझता भी रहा हूँं। यह तो आवश्यक नहीं कि पत्र की हर बात से सहमत हुआ जाये। लेकिन इतना मैं कह सकता हूँ कि अपने प्रदेश को पहचानने का अवसर इसी पत्र ने दिया है, यहाँ की बुनियादी समस्याओं को इसी ने उकेरा है। क्षेत्रीय रूप में ही नहीं, अपितु राष्ट्रीय स्तर पर भी देश की समस्याओं और इनके निराकरण के नाम पर किये जा रहे षड़यंत्रो का जैसा प्रकटीकरण एवं विश्लेषण इस छोटी सी पत्रिका ने किया है, ऐसा तो राष्ट्रीय कहे जाने वाले पत्रो ने भी नहीं किया है। इस पत्र में निहित धारा सम्मान की चीज है, जिसका मंै सदैव आदर करता हूूँ और करता रहूँगा। एक उदाहारण मैं बी.बी.सी. का देना चाहता हूँ। इसे मैं अनगिनत वर्षों से सुनते आ रहा हूँ। उस युग में पश्चिमी राष्ट्रांे का हमारे प्रति दुराग्रह बहुत अधिक था और इसकी झलक बी.बी.सी. के समाचारों में भी परिलक्षित होती थी, लेकिन फिर भी उसका प्रातःकालीन एक घंटे का हिन्दी बुलेटिन सुनने पर ऐसा लगता था, मानो उसने हमंे हेलीकाॅप्टर में बैठा कर पूरी दुनिया का एक चक्कर लगा दिया है और हमने ऊपर से नीचे घटने वाली सभी घटनाओं को समग्रता में देख लिया है। मुझे यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता था कि बहुत सारे लोग, जिनके बारे में मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था, वह भी बी.बी.सी. को बराबर सुनते थे। हमारे पड़ोस के पुन्यागिरी मन्दिर में एक बार रात को एक दुर्घटना हुई और कुछ लोग हताहत हो गये थे। दूसरे दिन सुबह के हिन्दी बुलेटिन में बी.बी.सी. ने यह समाचार सुना दिया हमारे रेडियो में शाम तक एक लाईन की खबर इस पर नहीं आई थी। कुछ चीजें थीं, जिनकी वजह से लोग बी.बी.सी. के मरीज थे और अभी भी हैं।
अतः मै तो आश्वस्त हूँ कि ‘नैनीताल समाचार’ ने लोगांे के दिलांे मे जो जगह बनाई है, वह बनी रहेगी। इस पत्र के कन्ट्रीब्यूटर बड़े सुलझे और परिपक्व लोग हंै, ‘अमर उजाला’ की तवलीन सिह जैसे नहीं। उनकी वजह से और तुम्हारे सम्पादन की वजह से पत्र में सन्तुलन बना हुआ है। बिजनेस चमक-दमक से चलती है मिशन चुपचाप चलता है। अतएव जब तक चलेगा और इसे चलाना चाहिये। कष्ट अवश्य तुमने झेले होंगे और आगे भी झेलने पड़ंेगे, लेकिन शायद सन्तुष्टि के साथ। जब मिशन उठाया है तो उसे अंजाम तक पहुँचाने का प्रयास चलता रहना चाहिये।
एक चीज और मुझेे लगती है। व्यावसायिक पत्रकारिता और इलैक्ट्राॅनिक मीडिया द्वारा जो ढंग अपनाया गया है, उससे लोगों को जल्दी ही उकताहट हो जायेगी और पुनः उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की ओर मुड़ेंगे। अखबार पढ़ना शायद मनुष्य स्वभाव का स्थायी भाव है। बाकी चमक-दमक वाली पत्रकारिता तो ‘चाट’ खाने जैसी चीज है। इसलिये मैं मानता हूँ कि अखबारों का भविष्य खतरे में नहीं है। कवि रवीन्द्र के ‘एकला चलो रे’ के आह्वान को अपने हृदय में रख कर आगे बढ़ते रहो, चाहे अकेले ही क्यों न रहो। नै.स. तो एक तरह से इस क्षेत्र के तमाम सारे नौजवानों का ट्रेनिंग, शिक्षण संस्थान रहा है। यह योगदान कम नहीं है। जब मिशन उठाया है तो उसे यथाशक्ति अंतिम अंजाम तक पहुँचाने का प्रयास होना चाहिये। मेरा पूरा विश्वास है कि इसमें तुम्हें और तुम्हारी टीम को अवश्य सफलता मिलेगी। झेले हुए कष्ट तुम्हें हताशा और निराशा नहीं, बल्कि नया उत्साह एवं उमंग प्रदान करेंगे।
नैनीताल समसचार एवं नैनीताल समाचार परिवार के एक लम्बे, सुखी व सफलतम भविष्य की शुभकामना के साथ।
देवीदत्त सांगुड़ी, एडवोकेट
नैनीताल

Leave a Reply

%d bloggers like this: