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    चकबन्दी प्रक्रियायें आम काश्तकार को कितनी सहूलियत देती हैं और असुविधा इसका अंदाजा लगाने के लिये चकबंदी के संबंध में इस बहुप्रचारित उक्ति की याद दिलाना ही पर्याप्त होगा कि ‘‘जिस गांव में चकबन्दी हो रही होती है वहां चोरी और डकैती नहीं होती क्योंकि चकबन्दी करने वाले समूचे गांव को पहले ही इतना लूट चुके होते हैं कि उस गांव के आम आदमी के पास ऐसा कुछ बचता ही नहीं जिसे लूटा जा सके।’’
    चकबन्दी के संबंध में इसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों के चलते ही अनेक अवसरों पर देश के अनेक मा0 उच्च न्यायालय द्वारा भी प्रतिकूल टिप्पणियां तो की ही जाती हैं अब तो उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों में भी चकबन्दी विभाग को समाप्त करने की दिशा में निर्णयात्मक विचार किया जा रहा है।
    वर्ष 1997-98 में राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश के मा0 सदस्य श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती द्वारा तहसील नरेन्द्रनगर के निरीक्षण के समय पर्वतीय जनपदों में चकबन्दी प्रकियायें लागू किये जाने संबंधी पायलेट प्रोजेक्ट के अंतरगत चाका क्षेत्र के ग्रामों को चिन्हित किया गया था। इसके तहत की गयी कार्यवाही में उत्साहजनक परिणाम नहीं प्राप्त हुये थे।
    वैसे भी बढती हुयी आबादी के साथ प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में आने वाली जोतों के आकार घटे हैं जिससे इन्हें एकीकृत करने की स्थिति में सडक मार्ग के नजदीक एवं इससे दूर चक निर्माण के लिये भ्रष्टाचार की जो दुकानें खुलेंगी उससे आम जन को कितना नुकसान होगा इसका अंदाजा लगाना सहज है।
    मेरे विचार से पर्वतीय श्रेत्रों में चकबन्दी लागू किये जाने के स्थान पर सामुदायिक खेती को बढावा देने संबंधी प्राविधानों को लागू किया जाना अधिक सार्थक और औचित्यपूर्ण हो सकता है ।
    मध्य प्रदेश राज्य में भी बहुत बडा हिस्सा पठारी और पर्वतीय क्षेत्रों जैसा है और इस राज्य में सामुदायिक खेती केा प्रोत्साहित करने संबंधी प्राविधान सफलतापूर्वक कार्य भी कर रहे है।
    अशोक कुमार शुक्ला

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