आला हाकिम नैनीताल के हैं तो बड़े काबिल मगर….

Bureaucracy
हमारे दोस्त प्रो. अजय रावत को प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिल कर किताबें लिखने का बहुत शौक है। स्मारिकायें संपादित करने के मौके तो वे मानो झपट कर छीन लेते हैं। इस बार भी उसका फोन आया, ‘‘यार शरदोत्सव स्मारिका के लिये फटाफट एक आर्टिकल लिख कर दे दे तो!’’ ‘‘अभी तो श्रीनगर जा रहा हूँ, लौट कर सोचूँगा,’’ मैंने कहा तो अजय मायूस हो गया। वह कहता तो है, मगर वास्तव में मेरे और उसके, दोनों के लिये दिक्कत हो ही जाती है। एक बार डी.एम. एक बंगाली दादा थे। अजय के कहने पर मैंने पर्यटन पर एक लेख लिख डाला तो उसे पढ़ कर अजय परेशान हो गया, ‘‘यार, सरकारी पत्रिका में यह लेख कैसे छप सकता है ?’’ जब लिखा ही जा चुका था तो वीरेन डंगवाल से कह कर उसे ‘अमर उजाला’ में धारावाहिक रूप से छपवाया गया।

फिर भी श्रीनगर जाते हुए अजय की डिमांड याद आती रही। उत्तराखंड परिवहन की बस की पिछली सीट पर बैठे-बैठे लोनिवि की सड़कों के प्रसादस्वरूप सिर के इधर-उधर टकराने से उचटती हुई नींद के बीच नैनीताल की कुछ हालिया घटनाओं की यादें तैरती रहीं। सोचा न सही स्मारिका, कहीं तो इन पर कुछ छपना चाहिये। दरअसल अब लोग उत्तराखंड की विकराल होती हुई समस्याओं के बारे में ही इतना सारा सुना देते हैं कि उनके सामने नैनीताल की घटनायें बौनी लगने लगती हैं और फिर स्मृति से ही बाहर हो जाती हैं।

कहाँ से शुरू करूँ…..

बरेली-अल्मोड़ा राजमार्ग पर भवाली से आगे सड़क से सटा एक गाँव है ‘निगलाट’। कई वर्ष पूर्व विक्रम सिंह नामक व्यक्ति ने यहाँ जमीन खरीदकर मोटर रोड के ऊपर ‘धामपुर एस्टेट’ नाम से अपना बंगला बनाया। कुछ अपनी और कुछ ग्रामीणों की जमीन लेकर उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से एक सड़क बनाई। उनके जीते जी ग्रामीण इस सड़क का निर्बाध रूप से उपयोग करते रहे। यह कच्चा रास्ता छोटे वाहनों, पिक अप आदि के लिये उपयुक्त होने के कारण काश्तकारों को अपने फल-सब्जियाँ बाजार तक ले जाना आसान हो गया। किन्तु वर्ष 2006 में विक्रम सिंह के देहान्त के बाद उनके पुत्र अजित विक्रम सिंह और पुत्रवधू रति सिंह ने राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर एक गेट बना कर उसमें ताला लगा दिया। कुछ वर्षों तक जरूरत पड़ने पर, जब किसी को गाड़ी लानी हो, यह रास्ता आग्रह करने पर खोल दिया जाता था। अकेले व्यक्ति के निकलने के लिये गेट में जगह भी थी। मगर चार-पाँच वर्ष पूर्व सिंह दम्पत्ति द्वारा ‘धामपुर एस्टेट’ को अवैध रूप से एक रिजॉर्ट बना दिया गया और ग्रामीणों के लिये यह रास्ता पूरी तरह बन्द हो गया। अब स्थानीय लोगों को अपने रोजमर्रा के काम के लिये भी बेहद चढ़ाई-उतार वाले लगभग चार किमी. लम्बे रास्ते का प्रयोग करना पड़ता है, जो रात्रि को अथवा इमर्जेंसी के समय जोखिम भरा हो सकता है। अपने खेत व उद्यानों तक पहुँचना कठिन हो जाने से 35 काश्तकारों की लगभग 52 नाली जमीन बंजर पड़ गई है। ग्रामीणों को अपने इष्टदेव के मंदिर तक जाने में दिक्कत हो रही है। जब सिंह दम्पत्ति से बातचीत में कोई हल नहीं निकला तो स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से पत्राचार शुरू किया और दिसम्बर 2012 तक इस कोशिश ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। तत्कालीन जिलाधिकारी निधिमणि त्रिपाठी ने इस मामले में रिपोर्ट तलब की तो उप जिलाधिकारी (कोश्याँ कुटौली) ने अपनी रिपोर्ट में ग्रामीणों को पूरी तरह गलत ठहरा दिया। ग्रामीणों ने हार नहीं मानी और जिलाधिकारी से आग्रह किया कि इलाके के कुछ निष्पक्ष और समझदार लोगों से मामले की जाँच करवाई जाये। उनके और जिलाधिकारी के आग्रह पर 15 अप्रेल 2013 को तहसीलदार कोश्याँ कुटौली, कानूनगो तथा अमीन हंसादत्त उपाध्याय के साथ प्रो. अजय रावत, प्रो. उमा भट्ट, डॉ. बसन्ती पाठक और मैंने इलाके का मौका मुआयना किया और जमीन के अभिलेख देखे। हमने पाया कि ग्रामीणों के सारे आरोप सही हैं। सड़क में आने वाली ज्यादातर जमीन ग्रामीणों की है और अवैध रूप से चल रहा ‘धामपुर एस्टेट’ का रिसौर्ट आतंकवाद और व्यापक अपराधों के इस दौर में कभी भी खतरनाक हो सकता है। हमने अपनी रिपोर्ट दी, मगर उप जिलाधिकारी (कोश्याँ कुटौली) ने जानबूझकर हफ्तों तक उसे अटकाये रखा, जिलाधिकारी तक पहुँचने ही नहीं दिया। अन्ततः वह निधिमणि त्रिपाठी तक पहुँची और संयोग से उसी दौरान थोड़े दिन के लिये संजय गुंज्याल डी.आई.जी. बन कर आये। इन दोनों के रुचि लेने पर उस सड़क का गेट खोल दिया गया।

मगर यह स्थिति महज दो दिन रही। तीसरे दिन वह गेट उसी तरह बन्द मिला। इस बीच निधिमणि त्रिपाठी स्थानान्तरित हो गई थीं। संजय गुंज्याल भी खनन माफिया की नाराजी के कारण बदल दिये गये थे। ग्रामीण भागे-भागे नये डी.एम. अरविन्द सिंह ह्यांकी के पास गये तो उन्होंने टका सा जवाब दे दिया, पुराने डी.एम. की ग्रामीण जानें। गेट खुलना ही नहीं चाहिये था। ग्रामीण अब नये सिरे से आन्दोलन में लग गये हैं। सितम्बर शुरू में उन्होंने कुछ दिन तक कलक्ट्रेट नैनीताल पर धरना भी दिया। मगर फिलहाल उन्हें न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि दूसरी ओर से रति सिंह का पलड़ा बहुत भारी है। कानाफूसियों में जो खबरें छन-छन कर आ रही हैं, उनके अनुसार रति सिंह ने एक पद्मश्री पर्यावरणविद के माध्यम से हिज एक्सलेंसी को पटा लिया है और लाट साहब के आदेश हैं कि रति सिंह और उनके पति को किसी तरह न छेड़ा जाये। हताश ग्रामीण जब आयुक्त कुमाऊँ अवनीन्द्र सिंह नयाल के पास गये तो उन्होंने भी कह दिया कि यदि उन्हें लगता है कि जिला प्रशासन किसी तरह के दबाव में है तो उन्हें कोर्ट में चला जाना चाहिये!

क्या करें ग्रामीण ? उनके पक्ष में प्रो. अजय रावत, प्रो. उमा भट्ट, डॉ. बसन्ती पाठक और मैं तो हैं, मगर हम चारों की तो क्या बिसात, चार लाख लोगों की सम्मिलित ताकत भी क्या लाट साहब का हुक्म पलट सकती है ?

दूसरी घटना चेतराम साह ठुलघरिया इंटर कॉलेज नैनीताल की है। 27 जुलाई को यहाँ के एक छात्र का कॉलेज के रास्ते पर एक्सीडेंट हो गया। नैनीताल की तमाम पुरानी घोडि़या सड़कों की तरह यह सड़क भी सीमेंटेड हो कर अब बाकायदा मोटर सड़क हो गई है। हालाँकि अन्य सड़कों की तरह लोनिवि ने इसके लिये भी कोई नोटिफिकेशन नहीं किया है। अन्य सड़कों की तरह ही यह भी अतिक्रमण का शिकार है, बल्कि अन्य सड़कों से कहीं ज्यादा, क्योंकि इसके दोनों ओर कबाड़ के कारोबारी भी जुटे हुए हैं। तो नगरपालिका नैनीताल में बेलदार के रूप में कार्य करने वाले, गैरीखेत निवासी विनोद कुमार के कक्षा 9 में पढ़ने वाले पुत्र अजय कुमार को जब एक कार ने कुचला तो विद्यालय प्रबन्धन ने उसे तत्काल बी.डी. पांडे अस्पताल पहुँचाने के साथ मल्लीताल कोतवाली में तहरीर दे दी। बिल्डरों और होटेलियरों के वर्चस्व वाले पर्यटन के इस स्वर्ग में एक गरीब दलित के बेटे को किसने पूछना था ? 29 जुलाई तक पुलिस ने तहरीर पर नजर ही नहीं डाली।

इस बीच अजय के पाँव में हल्द्वानी के कृष्णा अस्पताल में रॉड डाली गई। सत्तर हजार रुपये का खर्च हुआ, जिसमें पच्चीस हजार सी.आर.एस.टी. कॉलेज ने दिये, दस हजार रुपये नगरपालिका कर्मचारियों ने चन्दा कर एकत्र किये और बाकी विनोद कुमार ने जैसे-तैसे जुटाये। 30 तारीख की प्रातः जब विद्यार्थियों की प्रार्थना सभा चल रही थी, अजय कुमार की माँ ने वहाँ पहुँच कर रोना-धोना शुरू कर दिया। छात्रों को गुस्सा आया, उन्होंने दौड़ लगाई और मल्लीताल रिक्शा स्टैण्ड पर चक्का-जाम कर डाला। उनके पीछे-पीछे कालेज के प्रधानाचार्य मनोज कुमार पाण्डे भी उन्हें रोकने, समझाने की नीयत से भागे। बहरहाल चक्का-जाम करना या पुतले फूँकना तो भाजपा और कांग्र्रेस का विशेषाधिकार है, जो देश के प्रति निष्ठा और अपने दायित्व के चलते आये दिन ऐसा करते हैं और प्रशासनिक अधिकारी भी उनके साथ हँस-हँस कर फोटो खिंचवाने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। अभी हल्द्वानी में कहीं भाकपा (माले) ने पुतला फूँका था तो उसके कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज हो गया था। तो पुलिस सीआरएसटी के बच्चों को क्यों छोड़ती ? उन पर ‘राजमार्ग बाधित करने’ का मामला दर्ज किया गया और इसकी जिम्मेदारी विद्यालय के प्रधानाचार्य पर डाली गई। जिलाधिकारी ने प्रधानाचार्य को बुला कर बाकायदा हड़काया, ‘‘जानते हैं आप ? सरकारी कर्मचारी होने के नाते बच्चों को उकसाने के आरोप में आपकी नौकरी जा सकती है ?’’

फिलहाल उप जिलाधिकारी नैनीताल मामले की जाँच कर रहे हैं। यह पूछने की बेवकूफी मेहरबानी कर न करें कि अजय कुमार का पाँव कुचलने वाले कार ड्राइवर का क्या हुआ या अजय कुमार की आगे की जिन्दगी कैसे चलेगी ? ड्राइवर कोतवाल जगदीश चन्द्र से अपने घनिष्ठ सम्बन्धों के चलते आराम से है और अजय कुमार ? छोडि़ये…. अखबारों में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी की यशोगाथा पढि़ये, गरीब आदमी की चिन्ता क्यों करते हैं ?

अजय कुमार दलित है तो मनोज पाठक ब्राह्मण है। मगर गरीब है। पचास वर्ष पहले उसके दादा की दो गाडि़याँ के.एम.ओ.यू. में चलती थीं। मगर मनोज तो खानदान के पूरी तरह उजड़ जाने के बाद ही पैदा हुआ। तब पैदा भी नहीं हुआ था। वह एक प्रेस में आफसेट मशीन चलाता है। कुछ साल पहले तक नैनीताल समाचार की प्रेस राजहंस प्रेस में भी मशीनमैन रहा। कुछ और कमा सकने की जद्दोजहद में सुबह-सुबह अखबार भी बाँटता है। 10 सितम्बर को तीसरे पहर मनोज पाठक का इकलौता, 8 वर्षीय बेटा रवि खेल रहा था कि बन्दरों का एक झुंड धड़धड़ाते हुए छत पर कूदा। घबराया हुआ रवि बन्दरों से बचने के लिये भागा तो लेंटर की कोर से नीचे सड़क पर गिर पड़ा। गरीब ब्राह्मण की छत पर रेलिंग्स भी नहीं थी। तत्काल बच्चे की मृत्यु हो गई। इस घटना ने भी न शहर की संवेदना को झकझोरा और न प्रशासन को। गाँवों में तो जंगली जानवर प्रायः ही लोगों की जान लेते रहते हैं, एक बच्चे के प्राण शहर में भी हर लिये तो कौन सा केदारनाथ हो गया ? चारधाम में भी तो मीडिया को सबसे पहले क्रिकेटर हरभजन सिंह के कष्ट ही दिखाई दिये थे, बाकी हजारों लोगों के मरने की खबरों का नम्बर तो बाद में आया। तो भ्राता, कुत्ते या बन्दर काटें अथवा बाघ उठा ले जायें, इसमें सरकार-प्रशासन की जिम्मेदारी कहाँ बनती है ?

ऐसी घटनायें और भी होंगी। मगर हमें तो लोग अब उत्तराखंड का ठेकेदार मानते हैं और उसी की चर्चा करते हैं। यहाँ इस वक्त आपदा का अरबों रुपये का कारोबार भी चल रहा है। तब चिराग के नीचे के अंधेरे को हम क्योंकर देखें ?

वैसे नैनीताल जनपद का प्रशासन है बहुत शिष्ट और सक्षम। एकाध मझोले स्तर के अधिकारियों को छोड़ दें तो भ्रष्टाचार के कोई बड़े चर्चे भी इधर के सालों में नहीं सुनाई दिये। फिर भी ऐसी घटनायें हो ही जायें तो किसी को क्या दोष दिया जा सकता है ?

…..ऐसा ही कुछ मैं शरदोत्सव स्मारिका के लिये लिखना चाहता था। मगर इससे अजय रावत की उलझन कितनी बढ़ जाती ?

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