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    JAY SINGH RAWAT May 20, 2012 at 9:45 PM |

    राजीव दा, सादर नमस्कार.
    मैं आपके लेखन और ख़ास का नैनीताल समाचार की जनपक्षीय पत्रकारिता का हमेशा से कायल रहा हूँ. यह अखबार नहीं बल्कि अपने आप में एक जनादोलन है. जब भी मौका आया तो नैनीताल समाचार न केवल जनसंघर्षों के साथ खड़ा हुवा बल्कि इसने जनसंघर्षों को दिशा भी दी. लेकिन जल विद्यु परियोजनावों के बारे में मुझे लगता है नैनीताल समाचार एकपक्षीय रुख ले रहा है. जबकि उसे सिक्के के दोनों पहलूवों पर रोशनी डालनी थी. बिजली का मुद्दा बांध विरोध और समर्थन पर आ कर सिमट गया है. कहते हैं की अधूरी जानकारी खतरनाक होती है. ऐसे खतरनाक खेल तो उत्तराखंड का मीडिया अक्सर खेलता रहता है मगर ऐसा ही राग हमारे बुद्धिजीवी भी अलापने लगें तो वह राज्य के लिए खतरनाक ही होगा. हर परियोजना को बाँध बताया जा रहा है. जबकि टिहरी बाँध उत्तराखंड का अंतिम बांध है और राज्य सरकार पहले ही घोषित कर चुकी है की अब कोई बाँध नहीं बनेगा. प्रदेश का मीडिया बांध और बैराज में फर्क न समझे तो बड़ी बात नहीं है, क्योंकि हमारा मीडिया अक्सर ग़लतफ़हमी में रहता है और चंडूखाने की उडाने से मतलब रखता है. लेकिन बुद्धिजीवियों से तो उम्मीद की ही जानी चाहिए कि बैराज और बाँध में फर्क समझें . जो लोग जल विद्युत् परियोजनावों के बारे में बयान दे रहे हैं या अन्य तरह से विरोध कर रहे हैं उन्हें खुद पता नहीं है कि बांध क्या होता है और बैराज क्या होता है. वे लगातार बांध विरोध किये जा रहे है. जब उन्हें जानकारी ही नहीं है तो विरोध किस बात का?
    मई आपसे शतप्रतिशत सहमत हूँ कि परियोजना बनाते समय स्थानीय परितंत्र का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए. मैं इस बात पर भी आपसे सहमत हूँ कि परियोजनावों के लिए स्थानीय समुदाय को उजड़ा नहीं जाना चाहिए और उनके हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहए. फलिन्दा आदि के जो मुद्दे आपने उठए थे, वे न्यायसंगत थे. लेकिन हर बिजली परियोजना का आँख मूँद कर विरोध करना मेरी समझ से परे है. चलो माना कि बिजली परियोजनाए देश के लिए बहुत घातक हैं . ये भी मान लिया कि जो भी लोग बिजली उत्पादन बढाने के लिए परियोजनावों का समर्थन कर रहे है वे सबके सब बिक चुके हैं तो अब आप ही बतावो कि देश में बिजली कहाँ से आएगी? केवल विरोध के लिए विरोध करना उचित नहीं. आपको विकल्प भी देना चाहिए. आप जानते है कि जल विदयुत के विकल्पों में से एक थर्मल के लिए कोयला चाहिए. ओग बहुत ही प्रदुशंकारी होतो है और कोयला के भंडार एक दिन समाप्त हो जायेंगे. तब क्या होगा. परमणु बिजली कितनी जोखिम भरी है वह आप भली भाँति जानते हैं. पिछले साल जापान का जैसा हादस भरा में होतो तो आप महाविनाश की कल्पना कर सकते थे. सौर उर्जा कितनी मांगी है आप जानते ही हैं. उसकी एक यूनिट २० रूपये से महंगी पड़ती है. टेहरी बांध विरोध के बावजूद बन कर ही रहा मगर मात्र ३०० करोड़ की लगत से बन्ने वाला बांध विलम्ब के कारण ९००० करोड़ में बन सका. मनेरी भाली-२ की अनुमानित लगर १२०० करोड़ थे मात्र ३ साल के विलम्ब से उसकी कीमत २२०० करोड़ तक चली गयी. एक दिन एक-एक- परियोजना बननी है. लेकिन तब मुकी लगत कई गुना अधिक होगी. उस नुकशान को कौन भुगतेगा ?
    मई ये नहीं कह रहा की आप विरोध मत करो. मेरा निवेदन है की इस मामले की पूरी तस्बीर सामने रखो और फैसला जनातापर छोडो. एकपक्षीय बात अधूरी होती है.

    धन्यवाद

    आपका
    जय सिंह रावत

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