घोषणाओं से नहीं, चुस्त प्रशासन से पूरी होंगी अपेक्षायें

केन्द्र और उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार है फिर भी राज्य सरकार को शिकायत है कि उत्तरकाशी को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घोषित करने के मामले में उससे परामर्श नहीं किया गया। मुख्य मंत्री ने प्रधान मंत्री से भेंट कर इस फैसले पर पुनर्विंचार का आग्रह भी किया है। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय जनता के हितों के नाम पर न केवल सत्तारूढ़ कांग्रेस केन्द्र सरकार की घोषणा का विरोध कर रही है बल्कि विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी भी इसका विरोध कर रही है।

वास्तव में पर्यावरण के मुद्दे उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़े हुए असाधारण मुद्दे हैं। राज्य का 65 प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है। खेती, आवासीय जरूरतों, उद्योगों और अन्य सामाजिक गतिविधियों के लिए भूमि की कमी रहती है। हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर देश की नदियों और भूजल संपदा को कायम रखने में अहम भूमिका अदा करते हैं। पारिस्थतिकी पर प्रतिकूल प्रभाव से जल संसाधनों का संकुचन होता है और खेती पर आश्रित देश की 58 प्रतिशत जनता पर सीधा असर पड़ता है। देश में तथाकथित आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों की निर्मम लूट पर आश्रित रहा है। इससे परस्थितिकीय संतुलन और जलवायु में बदलाव देखा जा रहा है। पहाड़ों में संसाधनों की लूट और भी ज्यादा निरंकुशता से चलती रही है। इस लूट का लाभ बाहर के लोग ले गए और राज्य न केवल अपने संसाधनों की लूट को बर्दाश्त करता रहा वरन् स्वयं भी विकास की दौ़ड़ में पीछे छूट गया। धीरे-धीरे पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ी और नए कानून बने तथा अन्तर्राष्ट्रीय करार भी हुए हैं। ज्यों-ज्यों राज्य में विकास की माँग बढ़ती गई यह सुनने को मिला कि वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों को देखते हुए नए निर्माण कार्यों की अनुमति नहीं मिल सकती है। पर्यावरण संरक्षण के उपायों को ज्यों-ज्यों सरकारी एजेंडे का हिस्सा बनाया गया उत्तराखंड के विकास में बाधा आती गई। सड़क, स्कूल, सरकारी भवनों का निर्माण हो या बड़े बाँधों का निर्माण हर परियोजना को लागू करना टेढ़ी खीर बनता गया। सैंकड़ों छोटी-बड़ी परियोजनाएँ वन व पर्यावरण मंत्रालय में अटकी रहती हैं। वन संरक्षण अधिनियम विकास के मार्ग में अड़चन बना हुआ है। स्थानीय लोगों को दैनिक जीवन की सुविधाएँ सुलभ नहीं हो पाती हैं और उनका जीवन कठिनाई में बीतता है। वन संरक्षण व पर्यावरण संरक्षण की कीमत वे अदा कर रहे हैं परन्तु उन्हें इसकी एवज में कोई लाभ नहीं दिया जाता है। कथित विकास की कीमत भी पहाड़ों में ज्यादा ही है। अकेले वनों व पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के कारण भी सड़क निर्माण की लागत में 27 प्रतिशत की वृद्धि होती है। विभिन्न कारणों के चलते पहाड़ों में सड़क निर्माण की लागत 46 लाख रु. प्रति किलोमीटर होती है जबकि मैदानी हिस्सों में यह 28 लाख रु. प्रति किलोमीटर होती है। बढ़ी हुई लागत का मुद्दा अलग रहा, सड़क बनाने की अनुमति भी न मिल पाने से पहाड़ों के अनेक इलाकों में लोगों के लिए सम्पर्क सड़क एक सपना बनी हुई है।

राज्य में पर्यावरण संरक्षण का लाभ पूरे देश को मिलता है। पर्यावरण की बदौलत राज्य द्वारा देश को दी जा रही सेवाओं का मूल्य 25,000 करोड़ रु. व 40,000 रु. के बीच आँका जाता रहा है। राज्य सरकार भी यह मानती है कि वह पर्यावरण सेवाओं की एवज में राजस्व जुटा सकती है। तेरहवें वित्त आयोग ने भी राज्य की क्षतिपूर्ति करने की सिफारिश की थी हालाँकि यह बहुत कम थी। वित्त आयोग ने पाँच सालों तक कुल 41 करोड़ रु. सालाना की दर से अनुदान दिये जाने की सिफारिश की थी। आयोग ने पूरे देश के लिए पाँच सालों में 5000 करोड़ रु. देने की सिफारिश की थी। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि बहुमूल्य पर्यावरण सेवाओं का ठीक से मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही विश्व भर में प्रचलित इस सिद्धांत को लागू करने की भी आवश्यकता है कि प्रदूषण पैदा करने वालों को उसका खामियाजा भुगतना चाहिए और प्रकृति का संरक्षण करने वालों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसी आधार पर राज्य सरकार ग्रीन बोनस की माँग उठाती रही है। परन्तु ग्रीन बोनस के बारे में सेवाओं के सही मूल्यांकन का कोई ठोस फार्मूला निर्घारित के की आवश्यकता बनी हुई है।

एक तरफ संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन हुआ दूसरी तरफ इसका नतीजा हुआ कि जल, जंगल व जमीन जैसे संसाधन सिकुड़ते गए हैं। स्थानीय लोगों के लिए इनका उपयोग सिमटता गया है। उत्तराखंड में पेय जल, बिजली, रसोई गैस, सिंचाई के साधनों व यातायात संसाधनों की कमी बनी रहती है। सम्पर्क सड़कों की माँग सालों-साल तक पूरी नहीं हो पाती है। संचार व्यवस्था में व्यवधान पैदा हुआ तो फिर लम्बे समय तक उसकी सुध कोई नहीं लेता है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय व भारत सरकार को राज्यों व वहाँ के निवासियों की चिंता कम है और पर्यावरण से जुड़े अन्तरराष्ट्रीय करारों के पालन की चिन्ंता अधिक रहती है। हाल के सालों में ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर अन्तरराष्ट्रªीय समुदाय ने काफी चिंता जताई है और अनेक सम्मेलनों व बैठकों का आयोजन भी किया गया है। पर समस्या इससे जुड़ी प्रतिबद्धताओं को निभाने के लिए धन के पर्याप्त प्रवाह की है। विश्व पर्यावरण को आज की बदहाली तक पहुँचाने वाले विकसित देश अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए वांछित प्रतिपूर्ति करने के मामले में बहुत पीछे हैं परन्तु विकासशील देशों पर अधिकाधिक जिम्मेदारी थोपने का प्रयास करते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में भी इसी तर्ज पर पर्यावरण सेवाओं में योगदान करने वाले उत्तराखंड जैसे राज्यों को सेवाओं के अनुरूप मदद नहीं मिलती है और प्रकारान्तर से उन पर पिछड़ापन थोपा जाता रहा है।

विकास बनाम पर्यावरण की पहेली का कोई सर्वमान्य हल खोजा नहीं जा सका है। विकास की अवधारणा को बदलना है तो नई अवधारणाओं को अपनाने और उसे लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों और टेक्नोलाॅजी की भी दरकार रहती है।

पछवादून के छरबा में कोकाकोला प्लांट की स्थापना के प्रस्ताव पर ग्रामीणों का विरोध भी विकास व पर्यावरण के बीच टकराव की जमीनी हकीकत को बयान करता है। मुख्य मंत्री कह चुके हैं कि देश के अनेक हिस्सों में कोकाकोला के प्लांट लगे हुए हैं वहाँ तो कोई विरोध नहीं हुआ है तो फिर उत्तराखंड में क्यों विरोध हो रहा है जबकि कम्पनी ने स्थानीय लोगों को रोजगार देने का करार किया हुआ है। दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को प्लांट लगने से होने वाले प्रभावों के चलते बासमती पैदा करने वाले इस क्षेत्र की जमीन के बरबाद होने के आसार नजर आ रहे हैं।

जहाँ तक गौमुख से लेकर उत्तरकाशी तक के नदी के 100 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में पड़ने वाले 4179.59 वर्ग किलोमीटर के सम्पूर्ण जलसंभरण क्षेत्र का सवाल है उसे भागीरथी नदी के पर्यावरणीय प्रवाह और पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। मंत्रालय का कहना है कि इस सिलसिले में जुलाई 2011 में जारी राजपत्र अधिसूचना पर जनता से प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर भली भाँति विचार कर लिया गया है। मंत्रालय ने निष्कर्ष निकाला है कि भागीरथी नदी पर जल विद्युत योजनाओं के निर्माण के कारण उत्पन्न होने वाली बाधाओं के कारण जलीय वनस्पति व जीव-जंतुओं की बहुमूल्य सम्पदा को क्षति पहुँच सकती है।

पर्यावरण संबंधी सरोकारों के कारण ही कुल 1461 मेगावाट की तीन जल बिजली परियोजनाएं- लोहारीनागपाला, पाला मनेरी और भैरोंघाटी ठप हो चुकी हैं और 400 के.वी. की लोहारीनागपाला कोटेश्वर पारेषण लाइन परियोजना भी समाप्त हो चुकी है।

केन्द्र सरकार की घोषणा में राज्य सरकार पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वह दो सालों के भीतर स्थानीय जनता, विशेष रूप से महिलाओं के सहयोग से एक आंचलिक महायोजना (जोनल मास्टर प्लान) तैयार करेगी और इस पर केन्द्र सरकार का अनुमोदन भी प्राप्त करेगी। इस महायोजना में उजाड़े गए वन क्षेत्र की बहाली, मौजूदा जल स्रोतों के संरक्षण, जल संभरण क्षेत्र तथा जल संग्रहण के प्रबंधन, मृदा संरक्षण व भूमि की नमी को बनाए रखने स्थानीय समुदायों की जरूरतों पर ध्यान देने के साथ ही पर्यावरण व पारिस्थितिकी से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी ध्यान केन्द्रित करने की अपेक्षा की गई है। इसके साथ ही महायोजना की मदद से इस संवेदनशील इलाके के विकास को इस तरह से विनियमित करने की उम्मीद की गई है जिससे वहाँ के स्थायी निवासियों के अधिकारों व विशेषाधिकारों को प्रभावित किये बिना सभी निवासियों की जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसके साथ ही ऐसे पर्यावरण अनुकूल विकास को सुनिश्चित किया जाएगा जिससे उन्हें रोजगार की सुरक्षा भी मिल सके। इस क्षेत्रीय मास्टर प्लान में अनेक प्रकार के प्रतिबंध शामिल होंगे जो विकास के नाम पर बर्बादी को रोकने पर केन्द्रित होंगे।

केन्द्र सरकार की अधिसूचना में दी गई तमाम बातें पढ़ने में तर्कसंगत लग सकती हैं, परन्तु इसके अमल में होने वाले विलम्ब, कानूनी उलझनों और लालफीताशाही की झंझटों के चलते स्थानीय लोंगों के लिए यंत्रणा की नई भूमिका भी तैयार हो गई है। पर्यावरण संरक्षण पूरी तरह से वाजिब है परन्तु स्थानीय निवासियों को पर्यावरण का लाभ मिलने के साथ ही उनकी आजीविका, सुरक्षा तथा बुनियादी सेवाओं से जोड़ने के दायित्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। समग्र दृष्टिकोण अपना कर रणनीति तैयार करने का दायित्व सरकारों का है। स्थानीय लोगों को आश्वस्त करने के साथ ही कल्याणकारी कार्यक्रमों पर अमल सुनिश्चित किया जाए तो उहापोह और विरोध प्रदर्शनों से बचा जा सकता है। अगर सरकारें चुस्ती से काम नहीं कर सकती हैं तो महत्वाकांक्षी योजनाएं लोगों के कष्ट बढ़ाने में ही अधिक योगदान करती हैं।

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