बहुत बड़े घोटाले का एन. एच.-74

रूपेश कुमार सिंह
‘‘तुम्हारे खेत के बीच से होकर गुजर रहा है नेशनल हाइवे-74। रोड़ मैप बन गया है। बस मुआवजा देकर काम शुरू हो जाएगा। तुम्हारे खेत की सीध से जितनी भी जमीन है, यह सब भी ली जाएगी। खेती वाली जमीन पर मुआवजा ज्यादा नहीं मिलेगा। तुम कहो तो मैं 100 के 1000 करा सकता हूं। तहसील में मेरी अच्छी बात है। एसडीएम साहब तो खुद मुझे बोले हैं, खेत की जमीन को कॉमर्शियल करा लो तो 10 गुना मुआवजा बढ़ जाएगा। बस 143 की कार्यवाही तो करनी है। कॉमर्शियल के बाद बढ़ी हुई रकम का 40 फीसदी अधिकारियों को देना होगा।’’ नेशनल हाइवे के चौड़ीकरण और बाईपास की जद में आने वाले छोटे किसानों को इस तरह से दलालों के जरिए धाँधली के लिए तैयार किया गया। ब्रोकर, एजेंट, मीडिएटर……हिन्दी में कहें तो दलाल!
औद्योगिक विकास के साथ-साथ तराई में दलाल और दलाली काफी प्रभावी हो गये हैं। कमीशनखोरी की संस्कृति ने हर चीज में मध्यस्थता करो और अपने लिए चार पैसे निकाल लो, की तर्ज पर एक जबर्दस्त बाजार बना लिया है। यह बाजार कुछ भी बेचने, खरीदने की ताकत रखता है। फैक्ट्री में हड़ताल तुड़वानी हो तो दलाल, प्लाट खरीदना हो तो दलाल, लाईसेंस लेना हो तो दलाल, आर.टी.ओ., अस्पताल, तहसील, कलेक्ट्रेट, कोर्ट में जहाँ जो काम हो, हर मर्ज के दलाल मौजूद हैं। नेता, अफसर और दलालों के इस गठजोड़ ने ही एन एच-74 के इर्द-गिर्द रहने वाले सैकड़ों किसानों को भ्रष्ट और बेईमान बना दिया है। एक अनुमान के मुताबिक इसमें लगभग 500 करोड़ का घोटाला मिलीभगत से हुआ।
एन-एच 74 में लैंड यूज परिवर्तित करने में हुई धाँधली का मामला विधानसभा चुनाव से पहले ही काफी गरमाया था। भाजपा ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री हरीश रावत को इस मसले में घेरने की कोशिश की थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। तब भाजपा के निशाने पर एक कैबिनेट मंत्री भी थे। यह बात अलग है कि वह अब भाजपा का दामन थाम चुके हैं। धरना-प्रदर्शन, प्रेस वार्ता के साथ ही भाजपा नेताओं ने खूब हो हल्ला किया। करोड़ों का यह घोटाला चुनाव में मुद्दा भी बना। जनता से कहा गया कि कंाग्रेस सरकार में हुए तमाम घोटालों का पर्दाफाश किया जाएगा। दोषी नेता, अधिकारी और कर्मचारी जरूर सजा पाएँगे। उस समय भाजपा नेताओं ने एन एच-74 के घोटाले की जाँच सी.बी.आई. से कराने की माँग की थी। लेकिन चुनाव के दौर की बातें और वायदे आज हवा-हवाई साबित होते नजर आ रहे हैं।
सवाल उठता है कि क्या जमीन का यूज बदलवाकर करोड़ों डकारने के खेल में सिर्फ कांग्रेस के मंत्री, मंुख्यमंत्री, नेता ही शामिल हैं ? खटीमा से लेकर जसपुर तक मौजूद भाजपा विधायकों का इस बंदरबाँट में कोई रोल नहीं है ? क्या एसडीएम से लेकर पटवारी तक खुद इस साजिश के कर्ता धर्ता बन गये ? अधिकारियों पर झूठी रिपोर्ट लगाने का दबाव नेताओं ने नहीं बनाया होगा ? सबसे बड़ा सवाल यह कि 2011, जब से इस घोटाले की पटकथा लिखी जानी शुरू हुई, उस समय की भाजपा सरकार का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया ? 2012 से धाँधलेबाजी तेज हुई और इस समय जनपद की अधिकांश विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक ही विराजमान थे, तब क्यों पाँच साल तक शान्त रहे ? इससे साफ है कि हमाम में सबके सब नंगे हैं, क्या भाजपा और क्या कांग्रेस!
इस मामले को लेकर
हाईकोर्ट में तीन याचिकाएँ दायर हैं।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जाँच के आदेश दिये हैं। कुमाऊँ कमिश्नर डी. सेंथिल पांडियन की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी का गठन हुआ। जिसमें सचिव राजस्व परिषद एस.एम. पाण्डेय, एस.डी.एम. जगदीश कांडपाल और चीफ इंजीनियर पी.डब्ल्यू.डी. को शामिल किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक सितारगंज, किच्छा, रुद्रपुर, गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर और जसपुर तहसील के सैकड़ों किसानों को कृषि भूमि का वर्ग बदलकर सरकारी राजस्व की जमकर बंदरबाँट की गयी। रिपोर्ट के आधार पर 4 एस.डी.एम., 4 तहसीलदार, 18 पटवारी और 8 कानूनगो पर गाज गिर चुकी है। इसके अलावा 18 और कर्मचारी भी कार्यवाही की जद में हैं। इसमें रजिस्ट्रार, राजस्व निरीक्षक, पेशकार, डाटा इंट्री ऑपरेटर और तीन सेवानिवृत्त राजस्व निरीक्षक शामिल हैं। इस पूरे मामले में पी.सी.एस. अफसर डी. पी. सिंह को मास्टरमाइंड माना जा रहा है। अनिल शुक्ला, सुरेन्द्र जंगपांगी, जगदीश लाल, भगत सिंह फोनियाल व एन.एस. नगन्याल पी.सी.एस. अफसर निलंबित किए जा चुके हैं। दो नायब तहसीलदारों पर कार्यवाही की संस्तुति भी जिलाधिकारी ने दी है। साफ है कि बड़े पैमाने पर अफसरों के शातिर दिमाक और साँठगाँठ की उपज है, एनएच-74 का घोटाला।
बता दें कि 29 सितंबर 2012 को एक ही दिन में 120 कृषि भूखंडों को कॉमर्शियल किया गया। इसी तरह 2015 में भी बड़े पैमाने पर खेती की जमीन का 143 किया गया। ऐसे सैकड़ों मामले जगजाहिर हुए हैं जिनमें नियम कानूनों को ताक पर रखकर गैरकानूनी काम किया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि जसपुर में इस मामले से संबंधित 14 और काशीपुर से पाँच फाइलें गायब हो चुकी हैं। परतें अभी खुलनी बाकी हैं। लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते मामले में लीपापोती की जा रही है। मुख्यमंत्री बनते ही त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सीबीआई से जांच की संस्तुति की थी। लेकिन सीबीआई ने जाँच लेने से इंकार कर दिया। जिस मामले की जाँच सीबीआई से कराने की माँग मुख्यमंत्री और मंत्रिमण्डल कर रहे हों, उसे लेने से भला सीबीआई कैसे मना कर सकती है ? दरअसल इस मामले में भाजपा के विधायक, मंत्री और नेताओं की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। इसलिए उच्च स्तर पर प्रयास हो रहे हैं कि किसी भी तरह हो इस मामले को दफन होना ही चाहिए।

One Response

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    Bhupesh May 24, 2017 at 10:10 AM |

    Their is a an effort is on to scuttle the lip service inquiry going on this case. Hope there shall be more stories on that as well.

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