शिरीष कुमार मौर्य

दीपावली

कविता: शिरीष मौर्य रंगीन रोशनियों की झालरें परग्रही लगती हैं उनमें मनुष्यता का अनिवार्य उजाला नहीं है शिवाकाशी के मुर्गा छाप पटाखे सस्ते चीनी पटाखों से हार गए लगते हैं गांवों में बारूद सुलगने से लगी आग से मरे कारीगरों की आत्माएं यहां आकर कलपती हैं यह पटाखों का नहीं अर्थशास्त्र का झगड़ा है जो […]